Suspense Story: पंखे से झुलती भाभी की शिथिल देह, ऐंठा हुआ शरीर और वे आंखें… उफ, आरती की आंखों के सामने वो मंजर एक बार फिर घूम गया. जाड़े की इस सर्द रात में भी उस के चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक गईं. कितना प्यार करते थे भैया भाभी से. भाभी भी तो कम प्यार नहीं करती थी लेकिन भाभी का गुस्सा कभीकभी उन के प्यार पर हावी हो जाता. आरती को अपनी गृहस्थी से फुरसत ही नहीं मिलती, कहने को एक ही शहर में थी पर बड़ी मुश्किल से एक रात ही रुक पाती थी.

मां के मुंह से अकसर सुना था, ‘सबकुछ तो ठीक है पर प्रभा का गुस्सा राम बचाए, आगेपीछे कुछ भी नहीं सोचती. अब तो बालबच्चे भी हो गए हैं. ऐसी भी क्या जिद, मुंह से कुछ निकला नहीं, बस, पूरा कर दो. अरे, ऐसे थोड़े ही होता है. कितना समझाया था बड़े घर की इकलौती लड़की है, हमारे घर में कैसे खपेगी लेकिन तेरे भाई पर तो प्यार का भूत सवार था.’

किस ने सोचा था, भाभी की यही जिद न जाने कितनों की जिंदगी बरबाद कर देगी. सुबह से घर में कुहराम मचा हुआ था. आरती भाई से मिलने आई थी. घर में अब शोर मचना बंद हो चुका था. रात का घना अंधेरा पसरा हुआ था. घर में अजीब सा सन्नाटा था, ऐसा सन्नाटा जिसे वर्षों से कोई तोड़ न पाया. न जाने कितने मौसम आए और गए पर भाभी के जाने के बाद इस घर की खुशियों का मौसम कभी लौट कर नहीं आया. भाभी के कमरे का दरवाजा उड़का हुआ था. दरवाजे की दरारों से ?ांकती रोशनी भी उतनी ही बेचैन लग रही थी जितनी उस दरवाजे के पीछे रहने वाले वे मासूम चेहरे.

आरती पानी पीने के लिए रसोईघर की तरफ बढ़ी. न जाने कमरे की वे रोशनी उसे बारबार खींच रही थी. जब से वो मायके आई थी तब से उस ने देररात तक उस कमरे में उस रोशनी को महसूस किया था. जानती थी वह रोशनी से नहाए उस कमरे में रहने वालों के दिल का कोनाकोना कहीं न कहीं गले तक अंधेरे में डूबा हुआ था. भाभी के जाने के बाद घर में कबाड़ रखने वाले कमरे में भैया अपना सारा सामान समेट कर सिमट गए थे.

आरती ने कई बार कहा था, ‘मां, भैया अपने कमरे में क्यों नहीं सोते?’

मां की बात सुन आरती अंदर तक हिल गई थी. भैया अकसर रात में भाभी का नाम ले कर चिल्लाने लगते थे. उन्हें लगता कि रात के अंधेरे में कोई चुपके से उन की छाती पर सवार हो गया हो और पूछ रहा हो, ‘खुश हो न, अब?’

भाभी ने भाई से जिद की थी जब वे जिंदा थीं और मजे से जिंदगी चल रही  थी. ‘राजीव, भाई की शादी है, इकलौती बहन हूं मैं. बहुतकुछ सोचना पड़ता है. ये सब मैं अपने लिए थोड़ी कर रही हूं. तुम तो जानते हो, पापा हमारे रिश्ते से कभी खुश नहीं थे. तुम्हारी इज्जत के लिए कर रही हूं. शादी में एक सैट खरीद कर दे देते हैं. पापा को लगना चाहिए कि बेटी ने भले अपने मन से शादी की पर उस की पसंद गलत नहीं थी.’

‘प्रभा, समझने की कोशिश करो, नईनई नौकरी है. बौस पैसे नहीं देगा. वैसे भी, नईनई गृहस्थी है, कितनाकुछ जोड़ना है.’

भैया ने एक भरपूर नजर अपने घर पर डाली. घर एक छोटे शहर के पुराने से महल्ले में था. उखड़ा प्लास्टर. उड़ता रंग. उन की आवाज में याचना थी. प्यार कल्पना के खुले आकाश में विचरता है पर गृहस्थी यथार्थ के कठोर धरातल पर. हनीमून का समय बीत चुका था. अब जिंदगी से दोदो हाथ करना था. एक खेल ही तो है जिंदगी, जिस में एक तरफ आप अकेले होते हैं, दूसरी तरफ जिंदगी. हर बार यही लगता कि अगले मोड़ पर चैन होगा, सुकून होगा लेकिन यह सोचतेसोचते उम्र बीत जाती है. बस, थोड़ी दूर और. इंसान जिंदगी का हाथ पकड़ेपकड़े कितना आगे निकल आता है. एक ऐसे सफर पर जो कभी खत्म नहीं होता. वैसे भी, जिंदगी अकेले कहां होती है, मैदान उस का, पांसे उस के, समय उस का, चालें भी उस की और हम सिर्फ हाथपैर मारते हैं या सच पूछो तो हाथपैर मारने का ढोंग भर ही करते हैं. अब तो उन के 2 बच्चे भी हो चुके थे. भैया एकएक पैसा संभल कर खर्च करते थे.

‘तंग आ गई हूं तुम से. हर बार एक ही बात. कुछ भी हो जाए, मुझे शादी के लिए सैट चाहिए तो चाहिए. राजीव, कौन सा मैं अपने लिए मांग रही हूं?’

कहतेकहते भाभी का गला रुंध गया था. लड़कियों के लिए कितना मुश्किल होता है. पीहर में ससुराल की और ससुराल में पीहर की इज्जत रखतेरखते पूरा जीवन बीत जाता है.

‘समझने की कोशिश करो, प्रभा. बहुत सारे मौके आएंगे. अभी मेरा हाथ तंग है. गौरी का एडमिशन कराया है. उस की ड्रैस, कौपीकिताब, फीस कितना कुछ करना है. तुम से क्या छिपा है.’ भैया ने लगभग गिड़गड़ाते हुए भाभी से कहा था. मां चुपचाप सुन रही थी.

मियांबीवी के बीच कौन बोले, रोज की ही बात थी. चिड़ाचिडि़या की तरह लड़ेंगे, फिर एक हो जाएंगे. काश, मां का यह भ्रम बना रह जाता. काश, मां ने भाभी को मना लिया होता. काश, भैया ने भाभी की बात मान ली होती. काश, काश, काश. उफ, दिमाग सोचतेसोचते भन्नाने लगा. घंटों तक बहस होती रही. पता नहीं उस दिन भाभी ने क्यों जिद पाल ली थी. शायद मायके के सामने अपने फैसले को सही दिखाना उन की जिद नहीं, मजबूरी थी. भैया से शादी के बाद भाभी के मायके वालों ने रिश्ता लगभग तोड़ लिया था. वह तो भाभी ही थी जो मायके का मोह नहीं छोड़ पाई.

याद है आज भी 8 साल पहले का वह दिन जब भैया ने भाभी से चुपचाप कोर्ट मैरिज कर ली थी. मैं दौड़ीदौड़ी चली आई थी. मेरे ही सामने भाभी के भाई और पिता ने भैया को कितना भलाबुरा कहा था. भैया चुपचाप सिर ?ाकाए उन की बातें सुनते रहे लेकिन भाभी चट्टान की तरह भैया के आगे खड़ी रही.

भाभी के मातापिता बेहद दकियानूसी थे जो कुंडली मिलान के बिना शादी करने को तैयार न थे. वे अपने साथ पंडित को ले कर भी आए थे जो अनर्गल बक रहा था. भाभी शायद उन अंधविश्वासों से हमेशा के लिए नहीं निकल पाईं और उन की जिद ने अंधविश्वासों की जगह ले ली. मां ने बताया था कि वही भाभी बच्चों की तरह जिद करती रही. भैया सम?ातेसम?ाते थक चुके थे लेकिन भाभी उस दिन कुछ भी सुनने को तैयार न थी. भैया ने गुस्से में कहा था, ‘मैं अब और नहीं कर सकता. जो तुम्हारी इच्छा पूरी करे, चली जाओ उस के पास. कब से एक ही बात की जिद कर के बैठी हो.’

भैया को क्या पता था कि यही एक वाक्य उन के जीवनभर का दर्द बन जाएगा.

‘ठीक कहते हो तुम, यही सुनने के लिए तो तुम से शादी की थी. चली जाऊंगी तुम्हारी जिंदगी से, भूल जाना मु?ो.’

यही तो कहा था भाभी ने आखिरी बार. क्या पता था भैया को कि भाभी का

कहा यह अंतिम वाक्य उन के जीवन का काला सच बन जाएगा. वह चली गई थी इतनी दूर जहां से वापस कोई लौट कर

नहीं आता.

‘आरती, जल्दी से आ, तेरी भाभी.’

‘भाभी, क्या?’

खट्ट फोन कट चुका था. आरती हैलोहैलो करती रह गई. घर के बाहर लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था. भैया भाभी के शव के पास बेतहाशा रो रहे थे.

‘पैसे के लालच में बड़े घर की लड़की फांस ली, बेचारी मायके वालों से पैसे नहीं ला पाई तो मार कर लटका दिया.’ और न जाने क्याक्या. भाभी मर कर लाश बन चुकी थी और भैया जीवित रहते लाश बन गए थे. भाभी की ऐंठी हुई गरदन पंखे के कुंडे से लटक रही थी, आंखें पलकों की मर्यादा को तोड़ बाहर निकल आई थीं. जीभ मुंह से बाहर लटक रही थी.

भाभी के घर वाले वैसे भी भैया को पसंद नहीं करते थे, अपनी इकलौती बेटी की मृत्यु ने उन्हें पागल सा कर दिया. उन्होंने भैया का जीना हराम कर दिया. थाने और कचहरी के चक्कर काटतेकाटते भैया अचानक से बूढ़े लगने लगे थे. मां भैया के बच्चों को पालतेपालते न जाने कब दादी से मां बन गई. बेटे की जिंदगी को यों बरबाद होता देख मां का दिल फटने लगता. एक दिन गुस्से में उन्होंने भाभी के सारे कपड़े और उन की तसवीरें जला दीं. मासूम गौरी और नन्हे चीकू के सामने भाभी की कोई बात नहीं की जाती. भैया घंटों आसमान में न जाने क्या देखते रहते.

अब जी तो सभी रहे थे पर एक जिंदा लाश की तरह. पर मां तो आखिर मां ही थी. भैया के उदास चेहरे को देख उन का प्रलाप शुरू हो जाता और मरी हुई भाभी हर बार बीच में आ ही जाती. इंसान स्वभाव से संकोची होता है. नफरत तो वह आसानी से दिखा लेता है पर प्रेम अभिव्यक्त करने में अकसर संकोच कर जाता है. कहते हैं अकाल मृत्यु से मरे व्यक्ति का साया भटकता रहता है, भाभी मर कर भी नहीं मरी थी. लोगों के तानों, रिश्तेदारों की नफरत के रूप में वह आज तक जिंदा थी. मरने वाला तो मर कर चला गया पर बाकी लोग जिंदा लाश बन कर रह गए थे.

हरदम खिलखिलाने वाले भैया की हंसी कहीं खो सी गई थी. पुरुष भी कितने लाचार होते हैं, उन्हें भी तो ऐसा कंधा चाहिए होता है जिस पर सिर रख वे रो सकें, कह सकें कि वे भी पीड़ा से गुजरते हैं. किसी के तो सामने वे पुरुष होने के दंभ को छोड़ कर जारजार रो सकें. लेकिन अफसोस, भैया ने अपनेआप को एक कमरे तक समेट लिया था.

आरती का मन नहीं माना और वो उस रोशनी का पीछा करते हुए कमरे तक पहुंच गई. मासूम चीकू गहरी नींद में सो रहा था. आरती ने चीकू के उघड़े शरीर को रजाई से ढक दिया. पता नहीं यह आरती का भ्रम था या फिर कुछ और, चीकू के चेहरे पर मुसकराहट आ गई. शायद वह कोई सपना देख रहा था. न जाने क्यों उस की मुसकराहट को देख आरती को ऐसा लगा, उस का यह सपना कभी न टूटे. सपने में ही सही, उस मासूम के चेहरे पर मुसकान तो खिली वरना उस के चेहरे पर तो सिर्फ एक डर, संकोच और बिन मां का बच्चा होने का भाव ही देखा था. गौरी आड़ीतिरछी रेखाओं को खींचने में मग्न थी. आरती के पैरों की आहट से शायद उस की तंद्रा टूट गई.

‘‘बूआ, आप? क्या हुआ?’’

‘‘कुछ भी तो नहीं. तुम अभी तक सोई नहीं. इतनी देर तक जागना अच्छी बात नहीं. कल स्कूल भी जाना है न.’’

‘‘जी.’’

गौरी बचपन में बहुत ही चंचल थी. मां अकसर कहती थी, ‘आरती, तेरी ही छवि है, दिनभर इधरउधर डोलती रहती है.’ पर भाभी के जाने के बाद उस का वह बचपना न जाने कहां खो गया था. आखिर कितनी बड़ी ही थी वह, अपनी मां, एक धुंधली सी याद भर ही थी उस के जेहन में. बिस्तर पर कई कागज बिखरे हुए थे. उन कागजों पर पैंसिल से खींची आड़ीतिरछी रेखाओं को देख आरती का मन एक अजीब सी कशमकश में डूब गया. सभी तसवीरों में औरतों के ही चित्र थे. किसी में बाल कटे, किसी में लंबी चोटी तो किसी में जूड़ा.

‘‘अरे वाह, तुम्हारी ड्राइंग तो बहुत अच्छी है.’’ आरती की बात सुन गौरी के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ आई. वह दौड़ कर अलमारी से और भी चित्र ले आई. हर चित्र लगभग एकजैसे थे. किसी में औरत ने साड़ी तो किसी में सलवारसूट तो किसी में स्कर्ट पहन रखी थी. आरती सम?ाने की कोशिश कर रही थी पर न जाने क्यों उन सवालों के जवाब आरती के पास नहीं थे.

‘‘गौरी, ये किस के चित्र हैं. तुम्हारे हर चित्र में सिर्फ औरत है, ऐसा क्यों?’’

गौरी चुपचाप बैठी रही. उस की गहरी सांसों से उस का शरीर हिल रहा था. आरती चुपचाप उस के जवाब का इंतजार करती रही. इंतजार, कुछ इंतजार काफी भारी होते हैं. कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था. कहीं दूर ?ांगुर की आवाज उस सन्नाटे को तोड़ रही थी.

‘‘बूआ, मैं ने अपनी मां को नहीं देखा. एक धुंधली सी यादभर है. पापा और दादी के पास भी उन की कोई तसवीर नहीं है. शायद मेरी मां कुछकुछ ऐसी ही लगती होगी.’’

उस की बात को सुन आरती जमीन में धंस गई. गौरी बहुत देर तक आरती के चेहरे पर कुछ टटोलती रही. शायद वह उस के चेहरे पर अपने सवालों के जवाब ढूंढ़ रही थी. लेकिन अफसोस उसे वहां कुछ भी न मिला.

‘‘एक बात कहूं, बूआ?’’

‘‘हां, बोल न.’’

‘‘मेरी मां कैसी लगती थी?’’ आरती गौरी के मासूम चेहरे को देखती रह गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो गौरी की बात का क्या जवाब दे.

गौरी ने एक गहरी सांस ली, ‘‘बूआ, इस घर में मां के बारे में कोई बात नहीं करता और न ही करना चाहता है. जब भी सुना तो बुरा ही सुना. खैर, एक बात बताइए, मेरी मां ने अपने जीवन के जितने भी साल इस घर में बिताए, आप लोगों के साथ जिए, उन में से एक भी अच्छी, एक भी मीठी याद आप के दिलों में है? मैं नहीं जानती उस दिन क्या हुआ, मां ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया और न ही जानना चाहती हूं कि कौन सही था कौन गलत लेकिन एक बार हमारे बारे में तो सोचिए, कोई इंसान कितना भी बुरा क्यों न हो मगर कुछ तो अच्छा होगा ही.’’ आरती चुप थी, गौरी की बात का उस के पास कोई जवाब न था.

‘‘बूआ, इंसान एक कुत्ता भी पालता है तो उस के मरने के बाद भी उस की पसंदनापसंद को जीवनभर याद करता है. ऐसा तो नहीं कि उस कुत्ते ने अपने मालिक पर कभी भूंका न हो. फिर मेरी मां का अपराध इतना बड़ा कैसे हो गया कि कोई उन्हें भूले से भी याद नहीं करना चाहता?’’ आरती के पास गौरी के किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था. वो चुपचाप कमरे से बाहर निकल आई. गौरी के भीतर एक नदी बह रही थी, विचारों की नदी, भ्रम की नदी, कुंठाओं की नदी. उसे अपने उस सागर की तलाश थी जहां समाहित हो कर उसे अपने सारे सवालों के जवाब मिल सकें. आसमान में सूरज निकलने को बेचैन था. आरती सोच रही थी कि कुछ ही पल में सूरज सारे संसार को रोशनी से भर देगा पर क्या वह चीकू और गौरी के जीवन के अंधकार को भी दूर कर सकेगा?

काश, आरती ने अपनी नौकरी न छोड़ी होती और खुद को पता रहता कि पैसा कमाना और फिर संभाल कर रखना कितना कठिन है. भाई आज दोहरी दुविधा में हैं. कोर्टकचहरी का चक्कर है, रिश्तेदारों ने कन्नी काट ली है. बच्चों को अकसर स्कूल में चिढ़ाया जाता है कि उन की मां को तो पिता ने दहेज के लिए मार डाला था. भैयाभाभी का वह प्यार जिस की वजह से भैया ने हजार मुश्किलें झेली थीं आज भाभी के जाने के बाद कहीं किसी मोबाइल के प्रेम संदेशों में खो गया. पुराना जमाना होता तो आरती भांजेभांजी के प्रेमपत्र तो दिखा सकती थी कि दोनों में कितना प्रेम था. बच्चे कभी न पिता को माफ कर सकेंगे न हम सब को. हम जीवनभर बच्चों की निगाहों में भी गुनाहगार बने रहेंगे और कथित रिश्तेदारों की भी. Suspense Story

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