Hindi Story: रजिस्ट्रार के सामने एप्लीकेशनों पर साइन करते समय मां, दोनों भाई, दोनों की पत्नियां, देव के पेरैंट्स, बहन और बाहर कुछ नजदीकी रिश्तेदार थे. भाइयों ने इस शादी पर कुछ आपत्ति की थी पर यह देख कर कि दीदी अब एक पूरी समझदार रोबदार बोर्डिंग स्कूल की प्रोक्टर हैं और अपने अधिकारों से पूरी तरह वाकिफ हैं, चुप से थे. उन्होंने कहना चाहा था कि आप वैसे अपने से नीची जाति के लड़के से विवाह कर सकती हैं पर देव की पर्सनैलिटी और उस के ठाटबाट देख कर चुप रह गए पर चेहरों पर उस हताशा की झलक थी जो किसी सोने की चिडि़या हाथ से निकल जाने पर होती है.

यह 3 साल पहले की बात थी जब स्कूल की कैंटीन में चाय पीते हुए देवयानी ने कहा था, ‘कृष्णा, आज का अखबार देखा? देहरादून के प्रसिद्ध बोर्डिंग स्कूल में जौब के लिए इश्तिहार है. तुम्हारे लिए परफैक्ट रहेगा. तुम्हें अप्लाई करना चाहिए,’

कृष्णा और देवयानी पिछले कई सालों से एक ही स्कूल में काम करती थीं. सहकर्मी होने के साथसाथ दोनों अच्छी सहेलियां भी थीं. एकदूसरे से सुखदुख साझ करतीं और जरूरत पड़ने पर एकदूसरे को सलाह भी दिया करतीं. दोनों वैसे संभ्रांत पढ़ेलिखे घरों से थीं और इस स्कूल में भी नौकरी सिर्फ अच्छे पढ़ेलिखों को दी जाती थी. वे स्मार्ट और चतुर थीं.

‘देवयानी, तुम क्यों मु?ो कहीं और भेजने के लिए इतनी उतावली हो रही हो, अपने घर से दूर जा कर मु?ो क्या खुशी मिलेगी?’

‘कृष्णा, तुम जानती हो कि तुम्हारे जाने से सब से ज्यादा उदास मैं ही होऊंगी. एक तुम ही तो मेरी सब से करीबी दोस्त हो, लेकिन बात यह भी है कि मैं तुम्हारी खुशी चाहती हूं और किस घर की बात कर रही हो? उसी टौक्सिक माहौल से

तो तुम्हें दूर भेजना है. मैं क्या देख नहीं रही हूं कि तू दिनोंदिन ढल रही है,’

देवयानी बोली.

कृष्णा जानती थी कि देवयानी उस की स्थिति को देख कर व्यावहारिक सलाह दे रही थी, लेकिन वह ही किसी निर्णय पर नहीं आ पा रही थी. उस वक्त तो वह देवयानी की बातों को टाल गई लेकिन उस के शब्द कृष्णा के जेहन में रह ही गए. घर पर भी वह कमरे में बैठी देवयानी की बात पर सोच ही रही थी कि उस की नजर सामने की दीवार पर लगी अपने पिता की तसवीर पर गई. पिता को देखते ही उस का गला रुंध सा गया. लाड़ली थी वह उन की. बहुत गर्व था उन्हें उस पर. वे कहते, ‘कृष्णा, तू मेरा गरूर है. बहुत बड़े काम करेगी तू.’

गीली आंखों से तसवीर की तरफ देखते हुए कृष्णा सोचने लगी, ‘क्यों मुझे अकेला छोड़ गए, पापा? आप जानते हैं न कि हर पलआप की कमी कितनी खलती है. मेरा साथ देने के लिए कोई नहीं है. आप के सिवा मुझे  रास्ता दिखाने वाला था ही कौन? अब मैं क्या करूं, पापा?’ उसे लगा जैसे तसवीर से पापा का मुसकराता चेहरा कह रहा हो, ‘ऐसे दिल छोटा नहीं करते, बेटे. मैं गया कहां हूं, हमेशा तुम्हारे साथ ही तो हूं.’

वैसे, यह सच ही था. 10 साल हो चुके थे पापा की मृत्यु को. एक रात अच्छेभले सोए और फिर सुबह उठे ही नहीं. अकस्मात आए इस ?ाटके के लिए कोई तैयार नहीं था. उस ने तब बस ग्रेजुएशन ही पूरी की थी. दोनों भाई अभी स्कूल में ही थे. किसी के बिना कुछ कहे ही उस ने घर की जिम्मेदारी खुद पर ले ली. मां और भाइयों को उसे ही संभालना था. एक अच्छे स्कूल में उसे नौकरी मिल भी गई. नौकरी के साथसाथ उस ने बीएड की पढ़ाई भी कर ली. फिर एमए भी कर लिया. शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती और मां की मदद करती. बस, इसी तरह रोज उस के दिनरात कटते. हां, वह किताबें बहुत पढ़ती थी. हिंदी, इंग्लिश की नौवल, जीवनियां, यात्रा वृत्तांत. इसीलिए उस के छात्र उस पर मोहित थे.

कभीकभी उस की हिम्मत टूट सी जाती. मगर फिर पापा की कही बातें याद कर वह खुद को संभाल लेती. उस के पापा कहा करते थे, ‘कृष्णा, तुम इतनी बुद्धिमान, इतनी बहादुर हो कि कभी कोई मुश्किल घड़ी आन पड़ी तो तुम ही सब को संभाल पाओगी. कभी हार मत मानना, बेटा. खुद पर कभी विश्वास डगमगाने मत देना. याद रखना, तुम सबकुछ कर सकती हो.’

बस, पापा का प्यार इसी तरह साया बन कर उसे हौसला देता, उसे सुरक्षित महसूस कराता. उन की कही बातों से वह उन की उपस्थिति अपने आसपास महसूस करती. कुछ इसी तरह जिंदगी आगे सरकती रही. कृष्णा के कमाए पैसों से घर किसी तरह चलता रहा. कुछ समय बाद दोनों भाई अमन और आकाश भी पढ़ाई पूरी कर साधारण सी नौकरियों में लग गए. दोनों भाइयों ने पिता के न होने का काफी लाभ उठाया और उन की जिंदगियां मोबाइलों के इर्दगिर्द या फालतू के दोस्तों के साथ गप्पों में बीतीं.

फिर एक दिन दोनों ने उस के समक्ष अपनीअपनी पसंद की लड़की से शादी करने की इच्छा जाहिर की. अचानक आए इन प्रस्तावों से वह हैरानी में जरूर पड़ गई कि दोनों ने इतनी बड़ी जानकारी इतने दिन उस से गुप्त रखी थी, मगर फिर सोचा कि आखिर इस में हर्ज ही क्या है. दोनों अपनी पसंद की लड़कियों के साथ अपनी गृहस्थी में खुश रहें, यही तो वह भी चाहती थी.

मां ने जरूर दबी आवाज में पहले कृष्णा की शादी के लिए कहा था मगर उस ने यह कह कर बात खत्म कर दी कि उस के लिए दोनों भाइयों को इंतजार कराना ठीक नहीं होगा. जल्दी ही दोनों भाइयों का विवाह संपन्न हो गया. भाइयों को बहन से खास लगाव न था क्योंकि उन के दिमाग में बहन की छवि एक पिता समान है, हैडमास्टर की सी थी जिस के साथ हंसना, खेलना नहीं होता, जिस के आदेशों का इंतजार किया जाता है. कृष्णा ने बहुत बार नोट किया था कि उस के घर में घुसते ही दोनों भाइयों के हंसी के ठहाके बंद हो जाते थे. उस ने निर्णय किया कि भाइयों को अपने अनुशासन से आजाद करे.

सबकुछ हो जाने पर कृष्णा अपने कमरे में बैठी हाल के सारे घटनाक्रमों के बारे में सोच रही थी. तभी उसे एहसास हुआ जैसे पापा पास बैठ कर उस से कह रहे हों, ‘कृष्णा, मेरी बच्ची, तू ने हमेशा सब के बारे में सोचा लेकिन तेरे बारे में जब सोचने की उन की बारी आई, तब किसी ने नहीं सोचा. लेकिन कुछ भी हो, तू खुद अपने बारे में जरूर सोचना. अपनी खुशियों को भी उतनी ही अहमियत देना जितनी औरों की खुशियों को दी है.’ ऐसे एहसास उसे महसूस कराते कि पापा सिर्फ शरीर से ही उस के साथ नहीं थे. अपने मन, भावनाओं और सोच से पूरी तरह उस के आसपास सुरक्षाकवच बन कर खड़े थे. ऐसा सोच कर उस के मन को बड़ा संबल मिलता और वह अनवरत आगे बढ़ती रहती.

भाइयों की शादी के बाद कुछ समय तक तो ठीक चला लेकिन फिर समस्याएं आने लगीं. कारण वही थे जो हमेशा से चलते आए हैं. एकदूसरे से एडजस्ट न करना. दोनों भाभियां नौकरियां करती थीं. वह सुबह निकल जाती और फिर शाम में आती थी. दोनों को लगने लगा कि घर की जिम्मेदारी जैसे उन पर आन पड़ी है. हालांकि कृष्णा ने पहले ही पार्टटाइम हाउसहैल्प की व्यवस्था कर रखी थी मगर उन की सोच का वह क्या करती? छोटी नित नई चीजों की शौपिंग करती क्योंकि उस का वेतन कुछ ज्यादा था पर वह बड़ी को असहनीय होता. उस की देखादेखी वह भी अपने पति से उन्हीं चीजों की मांग करती. घर अब घर सा न रह कर किसी प्रतियोगिता का अखाड़ा बन गया था. दोनों के बीच लड़ाई तो नहीं होती थी लेकिन कटाक्षों का आदानप्रदान शुरू हो गया था.

हैरानी की बात यह थी कि दोनों भाई आंखें और मुंह दोनों बंद कर एक तरह से अपनीअपनी पत्नियों का मौन समर्थन कर रहे थे. किसी ने भी उन को सम?ाइश देने की जरूरत ही नहीं सम?ा. पूरे घर का वातावरण बेहद बो?िल हो चला था. आखिर कृष्णा से जब रहा न गया तो उस ने दोनों को पास बैठाया, ‘आप दोनों ही समझदार हैं. क्या ऐसा व्यव्हार आप को शोभा देता है? आखिर हम सब एक ही परिवार हैं. किसी की किसी से कोई होड़ नहीं है. जरूरत और मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए पैसे खर्च करना आवश्यक है, मगर पैसों की बचत भी उतनी ही जरूरी है. वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता. यह हम ने खुद देखा है. आप दोनों से निवेदन है कि जो भी करें, उस में अपने विवेक का इस्तेमाल अवश्य करें.’

उसी रात को कृष्णा को एक सीख मिल गई कि इंसान की नीयत भी साफ हो सकती है, उस की बात भी सही हो सकती है मगर यदि सामने वाला व्यक्ति दिल के दरवाजे बंद कर के बैठा हो, तब आप किसी भी तरह उस तक नहीं पहुंच सकते. खासतौर पर तब जब कुछ के मन में ‘भाग्य में लिखा है’ जैसी बातें बचपन से भरी हों. दोनों ही लड़कियां पूजापाठी, दकियानूसी परिवारों से थीं जहां हर चीज को भाग्य और पूजा से तोला जाता था. ये अंधविश्वास उन दोनों की जिंदगियों को घुन की तरह खा रहे थे. रात में कृष्णा जब सोने लगी थी तो देखा उस की पानी की बोतल खाली हो गई थी. पानी भरने के लिए जब वह किचन की ओर बढ़ी, तब छोटी भाभी के कमरे से आती आवाज सुन कर उस के पैर ठिठक गए.

‘अपनी ही कमाई खर्च करती हूं न तो तुम्हारी बहन को क्यों मिर्ची लगती है? बड़ा ज्ञान दे रही थी आज. पहले ही बड़ी भाभी क्या कम थी, जो अब ये भी शुरू हो गईं. दरअसल जलती हैं वो, शादी नहीं हुई है न, उसी का फ्रस्ट्रेशन है उन को.’

उलटे पांव अपने कमरे में लौट आई कृष्णा. बीते कुछ वर्षों ने उसे मजबूत बना दिया था, मगर आज उस का हृदय इस आघात को न सह पाया. पिता की तसवीर को देखते हुए उस की पीड़ा आंखों से बह निकली.

‘कृष्णा, समाज की सोच हमेशा से ओछी ही तो रहती आई है. तू क्यों आंसू बहा रही है? न तू इस गिरी हुई मानसिकता का आज हिस्सा है और न कल ही होगी. अगर कोई तुझे देख कर भी अपना उत्थान नहीं कर सकता तो यह सम?ा उस का समय ही खराब है.’ पिता की नर्म आंखों ने बेटी के संतप्त हृदय को सहलाया.

देवयानी कृष्णा के घरेलू हालात से वाकिफ थी. उन्हीं दिनों उस ने कृष्णा से बोर्डिंग स्कूल के इश्तिहार के बारे में बात की थी. उस का खयाल था कि कृष्णा मां के साथ स्कूल के क्वार्टर में रह कर अपनी नौकरी कर सकती है और इस तरह भाइयों के परिवारों के साथ वैमनस्य की स्थिति भी नहीं आएगी. मगर कृष्णा का मन नहीं मान रहा था. आखिर यह उस का परिवार था. ऐसे कैसे वह सबकुछ छोड़ कर चली जाए. इसी असमंजस में वह कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी. उसे लग रहा था कि दोनों आधेअधूरे भाई घर को संभाल नहीं पाएंगे.

फिर एक सुबह अमन जातेजाते उस से कह गया, ‘दीदी, आज शाम मेरे बौस आएंगे. कुछ ढंग का पहन लेना.’ कृष्णा को बात सम?ा नहीं आई. फिर वह भी स्कूल में व्यस्त हो गई और उसे ज्यादा सोचने का मौका ही नहीं मिला. शाम को अमन के बौस की बड़ी आवभगत की गई. अमन ने बड़ी गर्मजोशी से उन्हें कृष्णा से मिलवाया और कृष्णा से उन के साथ बैठ कर बात करने का आग्रह किया. अमन का यह व्यवहार कृष्णा की समझ के परे था, मगर औपचारिकतावश उसे बैठना ही पड़ा. उस ने गौर किया कि बौस सब को छोड़ कर केवल उसी से बात करने में अत्यधिक रुचि ले रहे थे.

अधेड़ उम्र के बौस का बारबार उस की ओर देख कर खीसें निपोर कर हंसना कृष्णा को असहज कर रहा था. एक घंटे बाद जब अमन उन्हें बाहर तक छोड़ने गया, तब उसे जैसे राहत मिली. मगर फिर जैसे ही अमन वापस अंदर आया, तब उस की बात सुन कर कृष्णा जड़ रह गई. ‘दीदी, उन्होंने तुम्हें पसंद कर लिया है. उन की पहली पत्नी का देहांत हो चुका है. हां, उम्र में तुम से थोड़े बड़े हैं, पर वह कोई बड़ी बात नहीं है. बहुत पैसे वाले हैं. दोनों बच्चों को भी होस्टल में रखेंगे.’

ओह, तो यह तरीका निकाला गया था उस से छुटकारा पाने का. न कुछ पूछा गया और न ही कुछ बताया गया. सीधा उसे शादी के लिए सामने ला कर खड़ा कर दिया गया. उसे लगता था कि भाई उस के संघर्षों के गवाह रहे हैं, वे जरूर उसे सम?ोंगे. आज उस का यह भ्रम भी दूर हो गया. दोनों भाइयों ने पौराणिक सोच, कि स्त्री को पिता, भाई, पति या बेटों के अधीन ही रहना चाहिए, को उस के सामने कारपेट की तरह बिछा दिया. इस तरह की सोच तो पिता में भी नहीं थी. उन के रहते वह स्वच्छंद तितली थी. कई लड़के दोस्त थे. घूमतीफिरती, पढ़ती.

‘दीदी, आप को खुश होना चाहिए जो इस उम्र में भी इतना अच्छा रिश्ता मिल रहा है आप को,’ अमन अपनी रौ में बोलता जा रहा था.

उसे बीच में ही रोकते हुए कृष्णा ने कहा, ‘अमन, थैंक यू. आज तुम ने मेरे लिए निर्णय लेना आसान कर दिया. दरअसल, मैं एक बोर्डिंग स्कूल में नौकरी करने की सोच रही हूं. मां मेरे साथ ही रहेगी. जैसे ही नौकरी का बंदोबस्त हो जाएगा, हम यहां से चले जाएंगे.’

अपनी बात कह कर वह सीधे उठ कर अपने कमरे की तरफ चल पड़ी. पीछे मुड़ कर देखने की उसे जरूरत ही नहीं महसूस हुई. एक क्षण को उस के दिमाग में खयाल आया कि अगर बोर्डिंग स्कूल में नौकरी न मिली तो. फिर सोचा कि पहले के हालात तो और कठिन थे. उन्हें भी तो पार कर ही लिया था. अब तो उस के पास काम का अनुभव भी था. उस की डिग्रियां अच्छी थीं. अगर एक बार वह पार्लर हो आती थी तो निखर उठती थी पर आमतौर पर वह पिता की सी छवि में सादगी बनाए रखती थी जिस का भाइयों ने गलत अर्थ समझा. कहीं न कहीं उसे नौकरी मिल ही जानी थी.

बस, पहला कदम ही मुश्किल लगता है. मगर निर्णय ले कर अगर राह पर चलना शुरू करो तो रास्ता अपनेआप सम?ा आने लगता है. कृष्णा ने समय न गंवाते हुए देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में आवेदन भर दिया. इंटरव्यू से पहले उस ने खुद पर थोड़ा काम किया. देवयानी के साथ जिम जौइन किया, पार्लर गई. जैसी उसे उम्मीद थी, उस के अनुभव और आकर्षक व्यक्तित्व के चलते उसे अच्छे वेतन और फ्लैट के साथ जौब मिल गई.

फिर भी घर से निकलते वक्त उस का मन जैसे 2 भागों में बंटा हुआ था. एक भाग भाइयों के मोह में डगमगा रहा था तो दूसरा भाग उसे सच्चाई को स्वीकार कर आगे बढ़ने के लिए कह रहा था. भाइयों ने भी उसे रोकने का कोई विशेष आग्रह नहीं किया था. उस ने अपनी सब से कीमती पूंजी पिता की तसवीर को उठाया और मन को दृढ़ कर मां के साथ देहरादून आ गई. शुरू के कुछ दिन कृष्णा का मन बड़ा उदास रहा, मगर फिर जल्दी ही उसे और मां को देहरादून की आबोहवा रास आने लगी. स्कूल बहुत ही अच्छा था. उस के सहकर्मी भी अत्यंत नम्र व उदार थे. स्कूल का फ्लैट भी सुविधाजनक था. सारे टीचर्स के परिवार एक बड़े परिवार की तरह मिलजुल कर रहते. इस से मां का भी मन लगा रहता.

सुबह कृष्णा अपनी क्लासेज लेती और शाम को होस्टल में बच्चों को होमवर्क कराने या अन्य गतिविधियों में मदद करती. उस का पूरा दिन व्यस्तताओं में कब निकल जाता, उसे पता ही नहीं चलता. यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि दोनों मांबेटी जीवन के इस नए दौर से संतुष्ट थीं. देहरादून की साफ हवा के कारण उस का शरीर निखर उठा था. वह घर की मरम्मत के लिए यदाकदा पैसे भेजती रहती थी. उस का अपना बैंक बैलेंस बढ़ रहा था.

एक दिन वह स्टाफरूम में बैठी थी कि चपरासी उसे ढूंढ़ता हुआ आया, ‘आप को प्रिंसिपल मैम ने क्लिनिक में बुलाया है, आप की मां को चोट लगी है.’

जब कृष्णा बदहवास ही वहां पहुंची तो देखा स्कूल की डाक्टर मां को फर्स्टऐड दे रही थीं और प्रिंसिपल पास ही खड़ी थीं. मां यों तो ठीक ही लग रही थीं, बस, थोड़ा घबरा सी गई थीं.

कृष्णा के चेहरे के भाव भांपते हुए प्रिंसिपल बोलीं, ‘अरे कृष्णा, घबराओ मत. मामूली खरोंच ही आई है. कैंपस में वाक कर रही थीं कि अचानक चक्कर खा कर गिर पड़ीं. कैप्टन देव ने देख लिया तो वे यहां ले आए. तुम्हें इसलिए बुलवाया है कि आज चाहो तो टाइम औफ ले कर मां का ध्यान रखो.’

तब जा कर कृष्णा को एहसास हुआ कि एक युवक प्रिंसिपल मैम के साथ खड़ा था.

‘ये हैं कैप्टन देव, एक्स आर्मी औफिसर. हमारे स्कूल की सिक्योरिटी इन्हीं के जिम्मे है. बीचबीच में सीसीटीवीज का मुआयना करने और अपने गार्ड्स से मिलने आते हैं. हमारी रिक्वैस्ट पर शाम को बच्चों की सैल्फडिफैन्स की क्लासेज भी लेते हैं,’ प्रिंसिपल मैम कह रही थीं, ‘और ये हैं कृष्णा, इन्होंने हाल ही में स्कूल जौइन किया है.’

दोनों की जब नजरें मिलीं, तब कैप्टन देव ने बड़ी शालीनता से हलका सा सिर ?ाका कर उस का अभिवादन किया. सांवली रंगत, मजबूत कदकाठी, एकदम छोटे कटे हुए बाल, यकीनन उन की पर्सनैलिटी एक आर्मी अफसर जैसी ही थी.

एक जेंटलमैन की तरह देव मां और उसे क्वार्टर तक छोड़ने आए. उन के शिष्टा व्यवहार ने मांबेटी दोनों को अत्यंत प्रभावित किया.

चूंकि देव का स्कूल में आनाजाना था ही तो कभी न कभी वे कृष्णा से टकरा ही जाते. धीरेधीरे उन के बीच बातचीत और सहजता बढ़ने लगी. कभीकभी वे शाम की सैल्फडिफैंस क्लासेस लेने के बाद क्वार्टर पर आ कर मां से भी मिलते. मां तो जैसे उन के आने भर से ही निहाल हो जातीं. कृष्णा को अपनी जिंदगी में देव की उपस्थिति बहुत सुखद लगने लगी थी. जब भी देव के बारे में सोचती, उस के गाल सुर्ख हो जाते और धड़कनें तेज हो जातीं. इस रिश्ते को क्या बुलाए, यह तो उसे नहीं पता था, मगर देव का सिर्फ होना भर भी उस के लिए बहुत मायने रखता था. वह इन एहसासों को कुछकुछ सम?ा तो रही थी मगर जीवन के पुराने कड़वे अनुभवों के चलते उस ने खुशियों पर यकीन करना बंद कर दिया था. फिर देव ने उस से कुछ कहा भी तो नहीं था.

इसी असमंजस के दौरान देव ने उसे एक दिन कौफी पर आमंत्रित किया. ‘मैं आप को पसंद करता हूं.’ उन्होंने सीधे शब्दों में कहना शुरू किया, ‘पहली मुलाकात से ही. मेरे बारे में आप ज्यादा कुछ नहीं जानतीं, इसलिए पहले अपने बारे में बताता हूं. आर्मी में शौर्ट कमीशंड अफसर रहा हूं. आर्मी से रिटायरमैंट के बाद अपनी सिक्योरिटी एजेंसी खोली जो कई संस्थाओं को सिक्योरिटी सर्विसेज देती है.

‘आप के बारे में प्रिंसिपल मैम से सब जान चुका हूं. जानने के बाद आप के लिए इज्जत और बढ़ गई है. मैं ने अब तक शादी नहीं की. सोचा यह था कि समाज के लिए नहीं, खुद के लिए विवाह करूंगा. जब तक कोई लड़की इतना पसंद नहीं आती कि उस के साथ जीवन बिताने का मन करे, तब तक अविवाहित ही रहूंगा. आप के साथ यह इंतजार खत्म हुआ.

‘मेरे घर में मां, पापा और मेरे प्यारे 2 कुत्ते हैं, जैक और जिल. मां व पापा को आप के बारे में पता है और वे इस बात की उम्मीद कर रहे हैं कि आप हां कह दें और हमारे परिवार का अटूट हिस्सा बन सकें. आप आराम से सोचिएगा. कोई जल्दी नहीं है. यदि आप हां कहती हैं तो मैं बहुत खुशी महसूस करूंगा. मगर यदि किसी कारणवश आप न भी कहती हैं तो हमारे बीच कुछ नहीं बदलेगा. आप के लिए मेरे मन में इज्जत हमेशा रहेगी.’ देव ने यह भी कह दिया कि वह ओबीसी जाति का है और उसे मालूम है कि कृष्णा कायस्थ परिवार से है.

कृष्णा के कानों में पापा की आवाज गूंजी, ‘कृष्णा, अपनी खुशियों के बारे में भी सोचना.’ आज खुशी खुद चल कर उस के पास आई थी. त्वरित ही कृष्णा ने फैसला ले लिया.

‘आप जैसा दोस्त अगर हमसफर बन जाए तो यह मेरे लिए बहुत ही खुशी की बात होगी. अपने नए परिवार से मिलने के लिए मैं भी उत्सुक हूं. हां, लेकिन पहले मां को बताना होगा.’

देव के चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित खुशी की मुसकान दौड़ गई. ‘औफकोर्स, उन्हें तो बताना ही होगा. वैसे, आप कंफर्टेबल तो हैं न? कहीं आप को ऐसा तो नहीं लग रहा कि सब बहुत जल्दी हो रहा है?’

‘नहीं, दिल कह रहा है कि यह ठीक है और मैं उसी की सुन रही हूं.’

कैंपस में लौट कर वह क्वार्टर नहीं गई, बल्कि पार्क की बैंच पर बैठ गई. वह कुछ देर अकेली रहना चाहती थी. आज लंबे समय बाद वह खुश थी, सपने संजो रही थी. वह इस एहसास को अपने भीतर समेटना चाहती थी, खुद को यकीन दिलाना चाहती थी कि इस खुशी पर उस का पूरा हक था. तभी उस के फोन पर ईमेल का नोटिफिकेशन आया. देखा तो अमन का था. आखिर, अमन उसे ईमेल क्यों कर रहा था? वह उसे खोल कर पढ़ने लगी.

‘दीदी, कैसी हो? मां कैसी है? तुम सोच रही होगी कि इतने दिनों बाद पूछ रहा है. सच कहूं तो बड़ी हिम्मत कर के आप को मेल कर रहा हूं. आप के जाने के बाद हमें लगा जैसे हमारा भार हट गया हो और हम अपनी जिंदगी जीने के लिए आजाद हो गए. मगर जल्दी ही खुद की असलियत पता चल गई. भार आप नहीं, हम आप पर थे. आप ने तो सब सलीके से संभाल रखा था. हम भाइयों से और हमारी पत्नियों से न घर का बजट संभाला गया और न गृहस्थी. सबकुछ बिखर सा गया है. घर की औरतें आपस में लड़ती हैं और हम भाइयों ने तो एकदूसरे से बात करना ही बंद कर दिया है. चारों को नौकरियों पर तनाव में जाना पड़ता है.

‘दीदी, जो हम ने आप के साथ किया, उस के बाद आप से किस मुंह से बात करें? हो सके तो हमें माफ दो और मां और तुम आ कर वापस अपना घर संभालो. हम सभी अपने किए पर बहुत लज्जित हैं.’

कृष्णा ने एक गहरी सांस छोड़ी. कुछ सोच कर उस ने अमन को फोन मिला दिया. ‘क्यों रे, अब क्या अपनी दीदी से बात करने में भी इतना सोचेगा कि इतना लंबा मैसेज भेजा. मेरे मन में तुम सब के लिए कोई गलत भावना नहीं है और तुम गृहस्थी का बोझ पड़ते ही इतनी जल्दी घबरा गए? इस सिचुएशन को एक मौका समझ और चीजों को खुद संभालना सीखो. रही मेरी बात, तो मु?ो यहां काम करना बहुत पसंद है, लेकिन छुट्टियों में कभी मैं और मां वहां आ जाएंगे, कभी तुम लोग यहां देहरादून आ जाना मेरे पास. बल्कि अभी तो तुम लोग ही आ जाना. तुम्हें किसी से मिलवाना भी है.’

कुछ देर बाद जब कृष्णा ने फोन रखा, तब वह बहुत हलका महसूस कर रही थी. आज उस के दिल का यह बोझ भी उतर गया था. उस ने आसमान की ओर देखा, ‘पापा, यह सब आप ही कर रहे हैं न.’

लगा, जैसे पापा मुसकरा रहे हों. उसे विश्वास हो गया था, पापा के प्यार का साया हमेशा उस के सिर पर था. उस साए के संरक्षण में वह हमेशा महफूज थी. आज देव का साथ पा कर वह और भी महफूज हो गई थी. Hindi Story

 

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