Relationship Struggle: लखनऊ के त्रिवेणीनगर की रहने वाली पूजा मिश्रा की शादी 22 साल की उम्र में हुई थी. वह उस समय प्राइवेट कंपनी में एमबीए करने के बाद जौब कर रही थी. उस का पति निखिल बरेली में रहता था. उस का अपना बिजनेस था. शादी के बाद पूजा ने अपनी नौकरी छोड़ दी और ससुराल में रहने लगी. शादी के 2 साल तक दोनों में अच्छी निभ रही थी. इस बीच पूजा के बेटी हो गई. पूजा के अनुसार बेटी होने के बाद से ही पति और उस के परिवार के लोगों ने मारपीट और झगड़ा शुरू कर दिया. यह बात पूजा ने अपने मातापिता को बताई. पूजा की एक छोटी बहन भी थी. वह भी शादी योग्य थी.

पूजा के मातापिता चाहते थे कि जब तक पूजा की छोटी बहन की शादी न हो जाए वह अपनी सुसराल में कोई अनबन न करे. पूजा ने बहन की शादी तक सहन किया इस के कुछ ही माह के बाद अपनी एक साल की बेटी को ले कर लखनऊ चली आई. पूजा 2-3 माह अपने मातापिता के साथ रही. वह कहती है मेरे मातापिता इस से खुश नहीं थे. मातापिता के घर रह कर पूजा ने अपने लिए नौकरी तलाश करनी शुरू की. एक सौफ्टवेयर कंपनी में 30 हजार माह की उस की नौकरी लग गई.

पूजा ने उसी कालोनी में किराए पर मकान लिया जिस में उस के मातापिता रहते थे. इस की वजह यह थी कि पूजा अपनी बेटी को अपनी मां के पास छोड़ जाती थी. जब नौकरी से वापस आए तो बेटी को अपने पास ले लेती थी. पूजा बताती है ‘हम ने किराए का मकान लिया पर उस में जरूरत के सामान जुटाने में कई माह का वक्त लगा. कमरे में एक सोफा था उसी पर मांबेटी सो लेते थे. अपने मातापिता पर बोझ मैं नहीं बनाना चाहती थी’. पति के साथ पूजा ने आपसी सहमति के आधार पर तलाक ले लिया था.

30 साल की उम्र तक पूजा की शादी, बच्चा, तलाक और घर से बाहर रहने की हालत झेल चुकी थी. एक ही कालोनी में रहने के फायदे और नुकसान दोनों थे. पूजा ने कुछ माह तो उस कालोनी में गुजारे पर जैसे ही बेटी का एडमिशन प्ले स्कूल में हुआ उस ने मातापिता की कालोनी छोड़ कर अपने औफिस के पास अपार्टमेंट में रहने लगी. पूजा कम उम्र थी अकेली तलाकशुदा थी तो हर कोई उसे पटाने के चक्कर में रहता था. ऐसे में पूजा अपने किसी पुरूष मित्र से मिलने से कतराती थी. अगर मजबूरन किसी को बुलाना पड़े तो वह क्लब हाउस में बुलाती थी.

उसे लगता था कि जैसे ही आसपास के लोगों को यह पता चलेगा कि कोई मुझ से मिलने आते है वह तमाम तरह की बातें बनाने लगेंगे. ऐसे में उसे यह कालोनी भी छोड़नी पड़ सकती है. इस से बचने के लिए उस ने एतिहात बरतना शुरू कर दिया. पूजा कहती है ‘छद्म नैतिकता वाले लोगों के चलते मैं उन को ही अपने घर लाती हूं जो मेरी तरह सिंगल न हो. मैं खुद कहीं जाती हूं तो अपनी बेटी को ले कर जाती हूं.’

समाज में अकेले रहने वालों की संख्या बढ़ रही है. इस में तलाकशुदा लड़केलड़कियां तो हैं ही जिन्होंने अपनी शादी नहीं की है वह भी हैं. अकेले रहने वाली लड़कियां खासतौर पर निशाने पर रहती हैं. इस के अलावा जो लड़के अकेले रहते हैं वह अपनी महिला मित्र को लगातार अपने फ्लैट पर बुलाना चाहे तो दिक्कत होती है. आमतौर पर ऐसे लड़केलड़कियां अपने आसपास रहने वालों से अधिक घुलतेमिलते नहीं हैं. छद्म नैतिकता का असर यह है कि चाहे किसी महल्ले के छोटे से कमरे में किराए का मकान ले कर रहना हो या फिर किसी बड़ी कालोनी या अपार्टमेंट में अड़ोसपड़ोस में रहने वाले लोग आंखे गढाए रहते हैं. इन की निगाहों के आगे सीसीटीवी भी फेल होता है. सोशल मीडिया पर इस तरह की समस्या को ले कर तरहतरह के मीम्स भी बनते रहते हैं. जिस से यह साफ पता चलता है कि अकेले रहने वाले लोग किसकिस तरह से छद्म नैतिकता वाले लोगों से परेशान हैं.

बैचलर है तो ‘नो इंट्री’:

कई अपार्टमेंट ऐसे हैं जहां अकेले और खासकर कुंवारे यानि बैचलर्स को रहने के लिए घर नहीं दिए जाते हैं. भारत में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां बैचलर्स, छात्र, कामकाजी पेशेवर, या यहां तक कि अकेली महिलाओं को भी किराए पर घर देने में मना कर दिया जाता है. सामान्यतौर पर हाउसिंग सोसायटी के नियम लिखित रूप से यह नहीं कहते हैं. व्यवहारिक रूप से छद्म नैतिकता को बढ़ावा देने वाले लोग इस तरह के कानून बना लेते हैं.

किसी भी फ्लैट या मकान को किराए पर देने का अधिकार उस के मालिक के पास होता है, न कि सोसायटी के पास होता है. इस के बाद भी रेजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन में बैठे छद्म नैतिकता वाले लोग मकान मालिक पर भी मनमानी करने वाला काम करते हैं. उन का तर्क होता है कि कुंवारे लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. वह अपनी महिला मित्रों को बुला सकते हैं जिस से आसपास का माहौल खराब होता है.

लखनऊ के यमुना अपार्टमैंट में रहने वाला नरेश यादव अपनी महिला मित्र प्रिया को बुलाता था. एक दिन एक दूसरी महिला रानी प्रकाश वहां आई जिस ने यह दावा किया कि नरेश उस का पति है उसे छोड़ कर प्रिया के साथ रह रहा है. अपार्टमैंट में हंगामा होने लगा. पुलिस आई नरेश और प्रिया को थाने ले गई. बाद में दोनों को निजी मुचलके पर इस शर्त के साथ छोड़ कि अब वह यमुना अपार्टमैंट में रहने नहीं जाएंगे.

कुंवारे लोगों को किराए पर घर या फ्लैट न दिए जाने के पीछे सब से बड़ी वजह छद्म नैतिकता वाले विचार है. मकान मालिक अकसर मानते हैं कि कुंवारे लड़केलड़कियां देर रात तक पार्टियां करते हैं, शोर मचाते हैं और उन के पड़ोसियों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं. इस के अलावा कुंवारे घर को गंदा रखेंगे, सफाई का ध्यान नहीं रखेंगे और संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं. कई रिहायशी सोसायटियों में नियम होते हैं कि वे कुंवारों को घर नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस से सुरक्षा संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. किसी सोसाइटी का कुंवारे लोगों को घर किराए पर देने से रोकना अनैतिक है, लेकिन भारत में कुंवारों के अधिकारों के लिए कोई विशेष कानून नहीं है. मकान मालिक को अंतिम निर्णय लेने का अधिकार है.

सीसीटीवी की निगरानी युवाओं पर पड़ती है भारी:

ज्यादातर जगहों पर कैमरे से निगरानी होती है. जिस से लड़केलड़कियों का आना मुश्किल होता है. जो उन की सैक्स लाइफ को प्रभावित करते हैं. लड़केलड़कियां भले ही अकेले रह रहे हों पर उन की सैक्स करने की इच्छा खत्म नहीं हो जाती है. जब उन के साथियों को आने नहीं दिया जाता या उन की निगरानी और जांच पड़ताल होती है तो वह मिलने से डरते हैं. क्योंकि उन की गोपनियता नहीं रहती. गेट पर उन का नाम नंबर और गाड़ी का नंबर नोट किया जाता है. मोबाइल से उन की फोटो ली जाती है. यह उन को अपनी निजता का हनन लगता है. ऐेसे में वह ऐसी जगह जाने से बचते हैं.

महल्ले और सड़क ही नहीं अब गांव घर, अस्पताल, स्कूल कालेज, कारखाने सब सीसीटीवी की निगरानी में होते हैं. ऐसे में किसी के पास प्राइवेसी नामक चीज नहीं रह गई है. जगहजगह बिना किसी नियम कानून को समझे लोग कैमरा लगवा ले रहे हैं. सीसीटीवी कैमरे लगवाने के लिए हाउसिंग एंड डेवलपमैंट बोर्ड ने 2023 में यह नीतिगत फैसला लिया कि मकान मालिक बिना पूर्व अनुमति लिए गलियारों की ओर कैमरे लगा सकते हैं, इस के जरिए किसी की निजता में दखल नहीं दे सकते हैं.

जस्टिस केएस पुट्टास्वामी बनाम भारत सरकार में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राइट टू प्राइवेसी यानि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार में आता है. आप कैमरा लगा सकते हैं लेकिन इस के जरिए किसी की जिंदगी में ताकाझांकी गलत होता है. नियमों का पालन न करने पर भारी आर्थिक दंड और सजा दोनों हो सकती है.

यही नहीं अगर रिकार्ड किए गए फुटेज को सार्वजनिक रूप से वितरित किया जाएगा तो उस के खिलाफ आईटी एक्ट और डेटा संरक्षण अधिनियम गोपनीयता कानून के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. यह कानून बताता है कि कैमरे का उपयोग पूरी जिम्मेदारी से करना होगा. कानून के तहत पड़ोसी का मतलब 100 मीटर के दायरे में रहना वाला कोई भी व्यक्ति हो सकता है. पड़ोसियों की खिड़कियों या निजी स्थानों की ओर सीधे कैमरे लगाना कानून अपराध होता है.

अपार्टमैंट में अब मकान मालिक साझा गलियारे की ओर मुख कर के एक सीसीटीवी यूनिट लगा सकते हैं. कैमरे का लैंस केवल उन के अपने दरवाजे के सामने के क्षेत्र पर ही केंद्रित होना चाहिए. यह पड़ोसियों के दरवाजों को कैप्चर नहीं करना चाहिए. आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु स्टेट मुकदमे में कोर्ट ने कहा कि किसी को भी अकेले रहने का अधिकार है. बिना अनुमति किसी की निजी गतिविधियों को रिकार्ड करना गलत है. 2022 में हुए सर्वेक्षण के अनुसार कैमरा रिकार्डिंग के चलते पड़ोसियों के साथ विवादों में 33 फीसदी की वृद्धि हुई है. घर मालिकों को रिकार्ड की गई सामग्री को संभालने के लिए नियम बनाने चाहिए. कई बार किसी अपराधिक घटना के होने के बाद पुलिस कैमरे से वीडियो फुटेज देखना चाहती है. यहां भी कोर्ट खडक सिंह बनाम उत्तर प्रदेश के मुकदमें में फैसला देते कहती है कि किसी की भी बिना उचित कारण के लगातार निगरानी करना गलत है.

कैमरे से भी खतरनाक है अपार्टमैंट में बने कानून:

12 अगस्त 2017 की बात है एस्सेल टावर्स के एक ब्लौक पायलट कोर्ट के लगभग 15-20 युवा किराएदारों ने पुलिस आयुक्त संदीप खिरवार से मुलाकात की. इन युवाओं को शिकायत थी कि उन के घर आने वाले मेहमानों के ऊपर प्रतिबंध न लगाया जाए. कई अपार्टमैंट में काम करने वाले आरडब्ल्यूए यानि रेजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन मेहमानों के आने पर कई तरह के प्रतिबंध लगाती है. जैसे उन के वाहनों को अपार्टमैंट में आने से रोका जाता है. कई जगहों पर विजिटर्स पार्किंग नहीं होती है.

एसीपी अनिल कुमार ने किराएदारों और आरडब्ल्यूए के साथ बैठक बुलाई. आपसी बातचीत के बाद यह तय हुआ कि मेहमानों के आने पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा. सोसायटी में आने वाले हर व्यक्ति को पहचान पत्र दिखाना होगा और किराएदारों को भी अपने आईडी कार्ड बनवाने होंगे. पुलिस ने एसोसिएशन को सोसायटी में सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दिए. पुलिस ने कहा कि सुरक्षा के लिए सोसाइटी में नियम बनाए जा सकते हैं लेकिन उन को जबरन लागू नहीं किया जा सकता है. किराएदारों को आईकार्ड बनवाने और मेहमानों को पहचान पत्र दिखाने के लिए कह कर आपसी विवाद को हल किया गया.

असल में तो यह कानून सुरक्षा के नाम पर छद्म नैतिकता को दिखाते हैं. जब तक किसी तरह के अपराध की जानकारी न हो किसी कि पहचान को इस तरह से उजागर करना ठीक नहीं होता है. अपार्टमेंट में सुरक्षा के अपने काम किए जाते हैं. हर गेट पर आने जाने वाले को फोन नंबर, उस की गाड़ी का नंबर उस का पता लिखा जाता है. जब अपार्टमैंट के अंदर रहने वाला किसी को अंदर आने की परमीशन देता है तभी वह आता है. इस के बाद भी उस की फोटो गेट पर खींच ली जाती है. ऐसे में युवाओं से मिलने आने वाली लड़कीलड़का वहां आने से परहेज करता है.

अपार्टमैंट में सुरक्षा और प्रवेश को ले कर विवाद बढ़ते जा रहे हैं. यह एक आम समस्या हो गई है. इस की सब से बड़ी वजह आरडब्ल्यूए में बैठे दकियानूसी विचारों वाले लोग हैं. इस के चलते सुरक्षाकर्मियों और डिलीवरी बौय के बीच मारपीट की घटनाएं वायरल होती रहती हैं. अभी नोएडा में डिलिवरी बौय और गार्ड्स के बीच गलत फ्लैट में घंटी बजाने को ले कर लाठीडंडे चल गए थे. प्रवेश से इनकार करने या कड़ी जांच के दौरान सुरक्षा गार्डों और अपार्टमैंट में रहने वालों और मेहमानों के बीच मारपीट के मामले बढ़ रहे हैं. नोएडा में ऐसे ही एक विवाद में एक व्यक्ति ने एक महिला की लातघूंसों से पिटाई कर दी.

मकान मालिक का बिना पूर्व सूचना के किराएदार के घर में प्रवेश करना या रेंट एग्रीमैंट की शर्तों के उल्लंघन में जबरन प्रवेश करना भी एक गंभीर विवाद का विषय है. मकान मालिक अकसर सुरक्षा कारणों से या रैंट एग्रीमैंट खत्म होने के बाद किराएदारों को घर खाली करने से पहले परिसर में प्रवेश करने से रोक देते हैं. गार्ड को सुरक्षा बनाए रखने के लिए नियम बनाने का अधिकार है. कई बार मेहमान इस बात को नहीं समझते. गार्ड तो आरडब्ल्यूए के बनाए नियम से काम करता है. आरडब्ल्यूए के लोग कानून तोड़ते हैं तो कोई दिक्कत नहीं होती है. ज्यादातर पुलिस भी आरडब्ल्यूए का ही पक्ष लेती है.

किसकिस तरह के हैं कैमरे:

सीसीटीवी के लिए अच्छे किस्म के कैमरे आने लगे हैं. इन में स्मार्ट, वायरलैस और एआई वाले कैमरे बहुत प्रयोग किए जा रहे हैं. कई कैमरे ऐसे हैं जिन को लगाने के बाद कहीं से भी मोबाइल पर देख सकते हैं. वाईफाई पीटीजेड में पैन-टिल्ट-जूम, वीडियो डोरबेल, बुलेट, डोम और वायरलैस बैटरी कैमरे शामिल है. यह 360 डिग्री कवरेज, नाइट विजन, टू-वे औडियो और मोशन डिटैक्शन जैसे स्मार्ट फीचर्स के साथ आते हैं. जो घर के हर कोने पर नजर रखने के लिए बेहतरीन हैं.

वीडियो डोरबेल कैमरा दरवाजे पर आने वाले व्यक्ति को देखने और बात करने के लिए होता है. बुलेट और डोम कैमरे में बुलेट बाहर के लिए और डोम अंदर के लिए आने वाले कैमरे बढ़िया रिजौल्यूशन के साथ साफ तस्वीर देते हैं. इन कैमरों में बैटरी अंदर लगी होती है. बिजली से इन का कनैक्शन होता है. फोन का एक सिम लगा होता है. कई कैमरा युनिट सोलर से चलने वाली होती है. वीडियो स्टोरेज कैपेसिटी के हिसाब से इन की कीमत होती है. साथ ही साथ इस को देखने के लिए मौनीटर भी लेना होता है.

एक सप्ताह वीडियो स्टोरेज वाले कैमरे 8 हजार से 10 हजार के आते हैं. इस के साथ मौनीटर और रिकार्डर सहित पूरी युनिट 18 से 20 हजार में लग जाती है. एक युनिट में 4 कैमरे से 8 कैमरे लगाने तक की सुविधा होती है. एआईै के जरीए चलने वाले स्मार्ट फीचर्स वाले कैमरे इंसान या किसी की भी हलचल को पकड़ कर संदेश दे देते हैं. इन में टू-वे औडियो से बात करने की सुविधा भी होती है. यह अंधेरे में भी क्लियर रिकार्डिंग करते हैं. कैमरे को एंगल को दूर बैठ कर एप के जरिए घुमाया जा सकता है.

सीसीटीवी सुरक्षा के नियम बने:

कैमरों का प्रयोग सुरक्षा के लिए हो किसी की निजता को भंग करने के लिए न हो. जब तक कोई अपराध न हो कोई भी कैमरो में रिकार्डिग को देख न सके. खासकर अपार्टमैंट में बनी आरडब्ल्यूए के लोग वहां तक पहुंच न सके. इस से किसी को यह डर नहीं होगा कि रिकार्डिग से उन को ब्लैकमेल किया जा सकता है. जहां भी सीसीटीवी निगरानी करने वाले कैमरे लगे हैं वहां बहुत गोपनीयता बरती जाए. जिस से कोई भी रिकार्ड हुए सीन देख न सके और न ही किसी और को दिखा सके. अगर ऐसे किया जाता है तो उस के लिए कठोर सजा का प्रावधान हो.

आज के दौर में जब लोग अकेले रह रहे हैं उन की जरूरतें बदल रही है. उन को सैक्स पार्टनर की जरूरत होती है. तमाम तरह के सुरक्षा उपायों के कारण उन को मन मार कर रहना पड़ता है. ऐसे में अकेले रह रहे लड़केलड़कियों की इच्छा का सम्मान करते हुए कानून बने. केवल छद्म नैतिकता के कारण अकेले रह रही लड़कियों और लड़कों की निजता का हनन न किया जाए. उन की सुरक्षा के साथ ही साथ निजता का ध्यान रखा जाए. ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने के साथ ही साथ उन की जरूरतों का ध्यान समाज को देना चाहिए. तभी एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण हो सकता है. Relationship Struggle

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