Muslim World Alliance: पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने सोचा था कि इस्लामिक ब्रदरहुड के नाम पर सऊदी अरब, तुर्की और कुछ दूसरे मुस्लिम देशों को एक छत के नीचे खींच लाएंगे. नाम रखा था इस्लामिक नाटो. धार्मिक वर्जन ऑफ नाटो जहां अल्लाह की मेहरबानी से सब एक हो जाएंगे और भारत और इरान जैसे दुश्मनों को सबक सिखा देंगे लेकिन मुनीर के हसीन ख्वाबों पर तुर्की ने लात मार दी. तुर्की ने कहा हम सऊदी-पाकिस्तान के साथ कोई डिफेंस पैक्ट नहीं करेंगे.
तुर्की के इस रवैया से मुनीर का धर्म के नाम पर गठबंधन बनाने का भ्रम टूट गया. दरअसल मुसलमान देशों में भी उम्मा यानि भाईचारा सिर्फ भाषणों और जुमलों तक सीमित है. यहाँ सबकी अपनी नेशनल पॉलिसी, इकोनॉमिकल इंटरेस्ट, पेट्रोल-डॉलर, हथियारों का बाजार और जियो-पॉलिटिक्स चलती है. पाकिस्तान के साथ गठबंधन करने से तुर्की की इकोनॉमी और रूस-चाइना बैलेंस बिगड़ सकता है इसलिए बिजनेस पहले और धर्म बाद में. जब बात पावर, पैसे और सर्वाइवल की आती है तो धर्म को बगल में रखना पड़ता है.
मुनीर साहब ने पाकिस्तान को मुस्लिम दुनिया का चैंपियन बताने की कोशिश की. न्यूक्लियर पावर के साथ इस्लाम वाला फॉर्मूला अपनाने का भ्रम पाल लिया लेकिन यह फॉर्मूला फेल हो गया क्योंकि दुनिया धर्म से नहीं, हितों से चलती है. धर्म तो यूनिटी चाहता ही नहीं. पाकिस्तान के अंदर ही शिया-सुन्नी टेंशन “इस्लामिक यूनिटी” के सपने को चीर देता है फिर भी मुनीर जैसे नेता धर्म को हथियार बनाकर पावर कंसोलिडेट करना चाहते हैं. नतीजा यह हुआ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी क्रेडिबिलिटी जीरो हो गई.
धर्म कभी भी गठबंधन नहीं बना सकता. नाटो काम करता है क्योंकि वो सेकुलर हितों पर टिका है. कॉमन थ्रेट, कॉमन वैल्यूज, डेमोक्रेसी, मार्केट और कॉमन मनी के मामले में धर्म कहीं नहीं है इसलिए नाटो जिन्दा है लेकिन इस्लामिक नाटो में अल्लाहु अकबर के नारे के अलावा कॉमन क्या है? कोई कॉमन इकोनॉमी नहीं और कोई कॉमन स्ट्रैटेजी नहीं सिर्फ इस्लाम का झुनझुना? उसमें भी शिया, सुन्नी अहले सुन्नत, अहले हदीस, बरेलवी, देवबन्दी और अहमदिया जैसे 72 फिरके? मुनीर का सपना टूटना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि लॉजिक का नतीजा है. जब आप फैंटसी पर पॉलिसी बनाते हो तो रियलिटी आपको अलग-थलग छोड़ देती है. गठबंधन हितों पर बनते हैं. किताबों या कल्पनाओं के नाम पर तो सिर्फ अलगाव पैदा होता है. Muslim World Alliance





