Religious Conspiracy: कोई भी दावे से यह नहीं कह सकता कि ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बटुकों का यौनशोषण किया है या नहीं. हकीकत हर कोई समझ रहा है कि इस के पीछे ब्राह्मणों की अपनी वर्णगत श्रेष्ठता की शाश्वत लड़ाई है. मुद्दत बात एक बार फिर शैव और वैष्णव मतों के मतभेद उजागर हुए हैं. कानूनी फैसला जो भी आए लेकिन इस विवाद ने सनातनी साधुसंतों के अहं और स्वार्थ फिर उधेड़ कर रख दिए हैं.

अविमुक्तेश्वरानंद अभिमन्यु की तरह घिर गए हैं. यह खेल कहां जा कर और कैसे खत्म होगा, इस का अंदाजा लगाना मुश्किल है. यह ड्रामा या कहानी, कुछ भी कह लें, शुरू से ही किसी मसालेदार हिंदी फिल्म से कम नहीं जिस में धार्मिक और राजनीतिक षड्यंत्रों सहित रहस्य, रोमांच, हिंसा, मारधाड़, खेमेबाजी, पुलिस, अदालत, कानून और सैक्स वगैरह सब ठुंसे हुए हैं. इस दिलचस्प कहानी को सिरे से समझने से पहले राजनीति को छोड़ उस से जुड़े एक प्रमुख किरदार, जिस के चलते कहानी में जान आई, की नाटकीय एंट्री और उस का रोल देखना मौजूं होगा.

यह पात्र आशुतोष ब्रह्मचारी उर्फ अश्विनी पांडेय है जो भगवा खेमे के चहेते वैष्णव संत रामभद्राचार्य का वैष्णव शिष्य है. उस पर बीते 8 मार्च को चलती ट्रेन में जानलेवा हमला हुआ था. उस दिन आशुतोष रीवा एक्सप्रेस ट्रेन से गाजियाबाद से प्रयागराज जा रहा था. सुबह कोई 5 बजे ट्रेन सिराथू रेलवे स्टेशन पहुंची तो एकाएक एक आदमी ने एसी कोच में आ कर उस पर उस्तरे से हमला कर दिया. हमले में आशुतोष की नाक पर चोट लगी. उस ने टौयलेट में जा कर अपनी जान बचाई.

बकौल आशुतोष पांडेय, हमलावर ने उसे जान से मारने की धमकी देते हुए यह भी कहा था कि नाक काट कर अपने गुरु के चरणों में चढ़ाऊंगा. घायल आशुतोष को प्रयागराज के काल्विन अस्पताल में भरती कराया गया जहां मरहमपट्टी के बाद उसे छुट्टी दे दी गई.

वह गुरु जिन के चरणों पर नाक चढ़ानी थी प्रसिद्द शंकराचार्य 56 वर्षीय अविमुक्तेश्वरानंद हैं जिन का असली नाम उमाशंकर उपाध्याय है. वे उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के गांव ब्राह्मणपुर के रहने वाले हैं. साल 1977 से ले कर 1982 तक गुजरात की सयाजीराव यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के बाद इधरउधर जहां से भी मिला, वे `ज्ञान` प्राप्त करते रहे. 1982 में वे काशी में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद के संपर्क में आए और 2006 में उन से दीक्षा ले ली. स्वरूपानंद ने उन का संन्यासी नाम अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती रख दिया. देखते ही देखते ही वे स्वरूपानंद के इतने चहेते हो गए कि 11 सितंबर, 2022 को स्वरूपानंद की मौत के बाद उन्हें ज्योतिर्मय पीठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया गया जिस का आधार स्वरूपानंद की कथित वसीयत थी.

हमलावर के बारे में आशुतोष ने मीडिया को बताया, “जिस किसी ने भी मुझ पर हमला किया है वह अविमुक्तेश्वरानंद के कहने पर किया है और 21 लाख रुपए के इनाम के चक्कर में किया है जिस की घोषणा अविमुक्तेश्वरानंद ने कर रखी है. इन लोगों की योजना मेरी नाक काटने की है ताकि मैं गवाही देने कोर्ट तक न पहुंच पाऊं.” बातबात में वह आदतन अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ जहर उगलते उन्हें समाजवादी पार्टी का बताता रहा.

यौनशोषण है असल मामला

इधर अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य का खेमा यह आरोप लगाता रहा कि आशुतोष ने खुद पर ही हमला कराया है. साल 2024 में आशुतोष ब्रह्मचारी एक नामालूम, गुमनाम सा पात्र था. उस के पिता राजेंद्र पांडेय शामली जिले के कांधला के थे जो बस कंडक्टर थे. उस ने साल 2022 में रामभद्राचार्य से दीक्षा ली थी और महंत आशुतोष पांडेय बन गया.

इसी आशुतोष पांडेय की रिपोर्ट पर उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ यानी जोशी मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर 21 फरवरी को पौक्सो अदालत के न्यायाधीश विनोद कुमार चौरसिया ने प्रयागराज के झूंसी पुलिस स्टेशन को आदेश दिया था कि अविमुक्तेश्वरानंद और उस के एक शिष्य मुकुंदानंद गिरी सहित 3 अज्ञात लोगों पर 2 नाबालिगों के यौनशोषण के आरोप में पौक्सो एक्ट की धाराओं 5, 6, 3, 4 (2), 16 व 17 सहित बीएनएस की धारा 351 (3) के तहत एफआईआर दर्ज की जाए. जिस का फैसला अब स्वर्ग की नहीं, बल्कि जमीन की अदालत को करना है जिस ने बीती 27 फरवरी को अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तारी से 3 सप्ताह की छूट देते सस्पैंस और गहरा दिया.

न्यायाधीश ने अपने आदेश में लिखा था कि आरोपों से गंभीर और विशिष्ट यौन उत्पीड़न का पता चलता है. बच्चों पर यौन हमलों के अपराधों, की जांच करना राज्य का वैधानिक दायित्व है. इसलिए यह अदालत इस से संतुष्ट है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173 (4) के तहत पेश आवेदन स्वीकार किए जाने योग्य है.

आशुतोष पांडेय के अनुसार, प्रयागराज में हुए माघ मेले के दौरान दोनों पीड़ित बटुक उस के पास आए और अपने यौनशोषण की कहानी सुनाई, जिस में उन्होंने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर यौनशोषण का आरोप लगाया था. इस कहानी से आशुतोष `व्यथित‘ हो गया और प्रयागराज पुलिस से संपर्क किया लेकिन कोई रिस्पौंस उसे नहीं मिला.

जब पुलिस न सुने तो सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा कर सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत भी इंसाफ मांगा जा सकता है. आशुतोष ने पुलिस कार्रवाई के लिए पौक्सो अदालत का रुख किया. अदालत ने 21 फरवरी को फैसला सुनाया. इस से पहले अदालत ने अविमुक्तेश्वरानंद से भी जवाब मांगा था जो उन्होंने दे दिया था.

यह मामला मीडिया से लोगों तक पहुंचा तो लोग दोफाड़ हो गए. उन में से एक पक्ष कह रहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खासतौर से उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पंगा नहीं लेना चाहिए था. अपने बड़बोलेपन के चलते उन्होंने मुसीबत मोल ले ली, निकल गई सारी हेकड़ी एक झटके में. 27 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सुरेंद्र कुमार सिन्हा की बैंच ने अविमुक्तेश्वरानंद की अग्रिम जमानत की याचिका पर उन्हें अंतरिम राहत दे दी, यानी, अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा.

शंकराचार्य हैं भी और नहीं भी

इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि संत समाज को 2022 की ज्योतिर्मठ पीठ की गददी  अविमुक्तेश्वरानंद को देने की बात रास नहीं आई थी. सब से पहले संन्यासी अखाड़े ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया. 21 सितंबर, 2022 को स्वामी वासुदेवानंद ने अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक रोकने के लिए याचिका दायर कर 16 अक्तूबर, 2022 को स्टे ले लिया. गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने भी सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे कर कहा था कि वे अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति से असहमत हैं. तब से यह कोई नहीं समझ पा रहा या तय कर पा रहा कि वे दरअसल शंकराचार्य हैं भी या नहीं. उसी समय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने भी इस नियुक्ति का विरोध करते कहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य के पद पर नियुक्ति में प्रक्रिया और नियमों का पालन नहीं हुआ.

शंकराचार्य की नियुक्ति असल में काल्पनिक स्वर्ग के काल्पनिक कैलाश पर्वत पर बैठे कोई शिव शंकर नहीं करते बल्कि उन से डायरैक्ट कनैक्ट होने का दावा करने वाले नीचे चारों मठों के चांदी के सिंहासनों पर बैठे हाड़मांस के जीवित मानव शंकराचार्य करते हैं. किसी भी एक मठ का शंकराचार्य बनने के लिए बाकी 3 मठों के शंकराचार्यों की सहमति जरूरी होती है. गुरुशिष्य परंपरा के तहत गुरु जिस को नौमिनेट कर जाए, गद्दी उस के ही हिस्से में आती है.

एक बात जो हर कोई बेहतर जानता है कि किसी भी पीठ का शंकराचार्य बनने के लिए सब से बड़ी और अहम योग्यता उम्मीदवार का ब्राह्मण होना है. किसी गैरब्राह्मण को शंकराचार्य बनने का हक नहीं. इस के बाद की योग्यताएं हैं- उम्मीदवार का दंडधारी संन्यासी होना, आजीवन ब्रह्मचारी और वैरागी होना, सभी प्रमुख हिंदू धर्मग्रंथों मसलन वेद, पुराण, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद भागवदगीता सहित अद्वैत वेदांत और शास्त्रार्थ में महारथ हासिल होना. ये व्यवस्थाएं 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य अपने रचे ग्रंथ महानुशासनम में कर गए हैं.

उत्तराखंड में ज्योतिर्मठ पीठ बद्रीधाम के निकट है. इस के पास करोड़ों की जमीन है और जमीन के मुक़दमे मानवनिर्मित अदालतों में चल रहे हैं. एक मुकदमा मंदसौर जिले की कृषिभूमि का है जो भानपुरा अदालत में चल रहा है. 1953 से ही इस पीठ का शंकराचार्य कौन हो, इस पर विवाद चल रहा है भारतीय संविधान द्वारा नियुक्त जजों की अदालत में.

शंकराचार्य बनने की मारामारी के कई मुकदमे अदालतों में चले हैं जिन में से ज्योतिर्मठ की तो माया ही अलग है. 1953 में इस पीठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती की मौत के बाद उन की वसीयत पर 2 गुट बन गए थे जिन में से एक खुद स्वरूपानंद का गुट था तो दूसरा शांतानंद का था. यह कानूनी विवाद अभी भी लंबित है और अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद उसी का विस्तार है. एतराज जताने वाले धर्मगुरुओं की एक दलील यह भी है कि स्वरूपानंद ने अपने जिंदा रहते कभी सार्वजनिक रूप से अपना कोई वारिस घोषित नहीं किया था और अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक एकतरफा था. यह विवाद लोग भूल चले थे या यों कहें कि किसी की दिलचस्पी इस में नहीं रह गई थी लेकिन बाल यौनशोषण कांड में जो गड़े मुर्दे उखड़े उन में से एक यह भी था.

वर्ण और गाय हैं फसाद की जड़

अब कहने को ही सही, अविमुक्तेश्वरानंद ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य हैं और अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाते हैं जो अकसर भगवा गैंग के खिलाफ होती है. चूंकि वे खुद भी भगवाधारी हैं इसलिए इस बात पर हर किसी को स्वाभाविक हैरानी होती है कि आखिर इस धर्मयुद्ध, जो अब अदालत में है, की वजह क्या है. जब सभी का मकसद हिंदू राष्ट्र और मनु स्मृति वाली वर्णव्यवस्था थोपना ही है तो मुद्ददत से खेमेबाजी और जूतमपैजार क्यों. ऐसा इसलिए क्योंकि धार्मिक लीडरी भी उतनी ही महत्त्व की होती है जितनी राजनीतिक, बिजनैस की और माफिया गैंगों की. त्रेता युग में भी विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच मतभेद थे. यह पौराणिक ग्रंथों में भी बारबार दोहराया गया है. फौरीतौर पर विश्वामित्र ही वह ऋषि थे जिन्होंने बूढ़े दशरथ से राक्षसों के खात्मे के लिए उन के टीनएजर बेटों राम और लक्ष्मण को मांगा था और फिर उन का विवाह भी करा डाला था.

विश्वामित्र-वशिष्ठ विवाद की असल वजह उन के अपने अहंकार और स्वार्थ हुआ करते थे. विश्वामित्र और वशिष्ठ का मनमुटाव और दुश्मनी की पहली वजह वर्ण थी. हिंदू वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण का कर्तव्य वेद ज्ञान, यज्ञ, तंत्रमंत्र और तपस्या वगैरह कर राजा को निर्देश और आदेश देना होता था कि वे कैसे राजकाज चलाएं. क्षत्रियों के जिम्मे शासन करना, अपने राज्य सहित तथाकथित प्रजा की रक्षा करना और सजा देना वगैरह के काम हुआ करते थे. उत्पादन और निर्माण दोनों में इन दोनों महान जातियों का कोई लेनादेना था तो पौराणिक ग्रंथों में जिक्र नहीं है. वह काम तो वैश्य और शूद्र का था.

इन दोनों वर्णों की घोषित जिम्मेदारी यह थी कि वे इन दोनों ऊपर के श्रेष्ठ वर्णों की गुलामी ढोते रहें और कभी धर्म आधारित शासन के लिए चुनौती पेश न करें. तब भी आज की तरह ग्रंथों की कहानियों के अनुसार, अकसर यह सवाल सिर उठाता रहता था कि श्रेष्ठ कौन- ब्राह्मण या क्षत्रिय. लड़ाई या विवाद इस बात को ले कर भी होते थे कि श्रेष्ठता तपस्या वगैरह से मानी जाए या ताकत और हथियार चलाने की काबिलीयत से मानी जाए और इस से भी अहम मुद्दे की बात यह कि राजा धर्म के अधीन होता है या धर्म राजा के अधीन होता है. यानी, राजा को अपने मुताबिक नचाए कौन- ब्राह्मण या क्षत्रिय.

आज भी लोचा यही है. कहानी को सहूलियत से समझने से पहले यह समझ लें कि योगी आदित्यनाथ क्षत्रिय हैं जिन की तरफ से मोरचा रामभद्राचार्य ने संभाल रखा है. यानी, यह विवाद ब्राह्मण बनाम ब्राह्मण है क्योंकि अविमुक्तेश्वरानंद भी ब्राह्मण हैं. असल लड़ाई मतभेद और मनमुटाव इन्हीं दोनों के बीच है. बाकी सब तो आशुतोष ब्रह्मचारी सरीखे सहायक पात्र भर हैं लेकिन उन की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता.

विश्वामित्र क्षत्रिय थे और वशिष्ठ ब्राह्मण थे. अव्वल तो यह एक वाक्य ही मौजूदा कहानी को समझने के लिए काफी है लेकिन इतने भर से दिलचस्पी खत्म नहीं होती बल्कि और बढ़ती है. विश्वामित्र तो मूलतया राजा थे जैसे कि आमतौर पर क्षत्रिय हुआ करते थे. कान्यकुब्ज के विश्वामित्र के पिता गाधि वहां के राजा थे, उन के बाद परिवारवाद के तहत कौशिक को गद्दी मिली. एक दिन विश्वामित्र अपने राज्य से कुछ किलोमीटर दूर शिकार करने का अपना शौक पूरा करने अयोध्या की तरफ निकल पड़े. वहां उन्हें वशिष्ठ का आश्रम दिखा. वशिष्ठ तब के पहुंचे हुए ऋषि थे जो सीधे ब्रह्मा के मन से पैदा हुए माने जाते थे. यानी, `नौनबायोलौजिकल` थे. वे सप्त ऋषियों में से एक थे.

वशिष्ठ ने विश्वामित्र सहित उन के लावलश्कर की खूब आवाभगत की. उन्हें तरहतरह के जायकेदार व्यंजन खिलाए जिसे देख कर विश्वामित्र हैरान रह गए कि एक साधारण से आश्रम के ऋषि ने चंद घंटों में हजारों सैनिकों के खानेपीने का इंतजाम कैसे कर दिया. इस का राज पूछने पर वशिष्ठ ने बताया कि उन के पास एक चमत्कारीदिव्य किस्म की अनूठी गाय नंदिनी है जिस का एक नाम कामधेनु भी है. यह गाय मांगने पर सोना, चांदी, धन, दौलत अनाज कपड़े वगैरह सब मिनटों में दे देती है. इस तरह के चमत्कार की कहानियां हर धर्म की जड़ में हैं जिन से आम लोगों को भरमाया जाता है कि हमारे कहने पर भगवान तुम्हारे लिए चमत्कार कर देंगे.

अब भला कौन राजा होता जो अपने राज्य में ऐसी अदभुद और चमत्कारी गाय को नहीं ले जाना चाहता. यही इच्छा या लालच विश्वामित्र के मन भी आया. सो, उन्होंने वशिष्ठ से वह गाय मांगी. वशिष्ठ ने कौशिक से कहा कि यह गाय आश्रम और धर्म की संपत्ति है और किसी रस्सी और खूंटे से नहीं बल्कि मेरे तपोबल से बंधी है. आप इसे नहीं ले जा सकते. हुआ वही जिस का डर था. कौशिक ने अपनी और अपनी सेना की ताकत के दम पर गाय हथियाने की कोशिश की. लेकिन उन्हें मुंह की खानी पड़ी क्योंकि खुद कामधेनु ने, कहानी के अनुसार, अपनी तपस्या के दम पर लाखों सैनिक पैदा कर दिए थे जिन्होंने क्षत्रिय कौशिक की सेना को खदेड़ दिया.

इस तरह ब्राह्मण जीत गया और क्षत्रिय हार गया. इस हार से बेइज्ज्त और व्यथित हुए कौशिक ने ब्राह्मणत्व को बतौर चुनौती लेते हुए विश्वामित्र बनने के लिए, ब्रह्मतेज हासिल करने के लिए बेसिरपैर की पौराणिक कहानी के अनुसार हजारोंलाखों वर्षों तक तपस्या की और बाद में ब्रह्मऋषि कहलाए. उन की घनघोर तपस्या से इंद्र का सिंहासन, जो हर कभी डोलने के लिए कुख्यात था, एक बार फिर डोल उठा था. इसलिए उस ने तपस्या भंग करने को स्वर्ग की मेनका नाम की अप्सरा पृथ्वी पर भेजी थी जिस ने विश्वामित्र  की तपस्या भंग कर भी दी थी और दोनों से शकुंतला नाम की एक बेटी हुई.

कौशिक फिर तपस्या करने लगे. तपस्या के दम यानी तपोबल से विश्वामित्र इतने सिद्ध हो गए थे कि उन्होंने राम और दशरथ के एक पूर्वज त्रिशंकु के लिए एक नया स्वर्ग ही बना कर उस के सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा पूरी कर दी थी. जबकि वशिष्ठ इस के खिलाफ थे कि कोई शरीर सहित स्वर्ग जाए. इन वजहों के चलते देवताओं, जो अधिकतर ब्राह्मण ही होते थे, ने उन्हें ब्रह्मर्षि की पदवी दे दी थी लेकिन वशिष्ठ ने इसे बहुत बाद में मान्यता दी थी.

इस कहानी को गढ़ने का मकसद भले ही नएपुराने लेखक, जिन्हें टीकाकार कहा जाता है, कहानी को सत्ता, धर्म और सामाजिक संतुलन का प्रतीक बताते रहें, लेकिन हकीकत में यह ब्राह्मण को क्षत्रिय से श्रेष्ठ साबित करने लिखी गई थी. लिखने वालों ने विश्वामित्र को ब्रह्मऋषि की उपाधि दे कर यह भी जता दिया कि क्षत्रिय भी कम नहीं जो अपनी पर उतारू हो आएं तो तपस्या कर, वेदपुराण पढ़ कर ब्राह्मणत्व को हासिल कर सकते हैं. साथ ही, राजा भी बने रह सकते हैं, जैसे कि योगी आदित्यनाथ हैं.

क्या यह उसी का दोहराव है

इस पौराणिक कहानी का अविमुक्तेश्वरानंद की मौजूदा हालत से मेल देखा जाए तो कहीं न कहीं फसाद में कामधेनु गाय और वर्ण दोनों हैं. अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे यौनशोषण के आरोपों का सच जब सामने आएगा तब आएगा लेकिन इन आरोपों के चलते घरघर यह चर्चा भी रही कि वे हिंदुत्व के मद्देनजर मुद्दे तो तुक के उठा रहे थे लेकिन अब फंसे हुए हैं और निरर्थक मुकदमों में उलझे हैं. अविमुक्तेश्वरानंद ने एक नहीं, बल्कि दर्जनों बार सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि नरेंद्र मोदी और भाजपा गौरक्षा के अपने वादे और दावे से मुकरते सनातन धर्म और सनातनियों से विश्वासघात व उन की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं.

इस से कटटर सनातनियों में अच्छा मैसेज नहीं जा रहा था और भगवा गैंग खुद को असहज भी महसूस कर रहा था. क्योंकि आरोप एक शंकराचार्य लगा रहा था. अविमुक्तेश्वरानंद की इन बातों का सार यह है कि जो नेता वोट के लिए गाय की पूजा करते हैं वही सरकार चलाने के दौरान डौलर के लालच में बीफ निर्यात को बढ़ावा देने का लाइसैंस देते हैं.

घुसपैठियों के भाजपा के प्रिय मुद्दे पर उन्होंने दोटूक कहा था कि सरकार इस पर नाकाम साबित हुई है. यह उस की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता है. ऐसा कोई मुद्दा या सरकार का फैसला नहीं है जिस पर अविमुक्तेश्वरानंद ने मोदी सरकार को बख्शा हो. वक्फ संशोधन बिल को शिगूफा बताते इसे उन्होंने मुसलिमों के लिए `सौगात ए मोदी` बताया था  जिस से हिंदू समाज को कोई लाभ नहीं है.

भगवा गैंग की इमेज बिगड़ रही थी लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद को रोका कैसे जाए, यह किसी हिंदूवादी को समझ नहीं आ रहा था. हालांकि, इस से भाजपा के वोटों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा था.

मोदी ने किया मैनेज

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपनी बातों और बयानों का कोई असर न होते देख भाजपा की तरफ झुकने लगे थे जो पहले से झुकेझुकाए रामभद्राचार्य जैसे वैष्णव संतों को रास नहीं आ रहा था. क्योंकि राममंदिर की प्रतिष्ठा के मद्देनजर शैव संप्रदाय के मानने वाले शंकराचार्य भी सक्रिय हो उठे थे. 22 जनवरी, 2024 की प्राणप्रतिष्ठा के ठीक एक दिन पहले 21 जनवरी, 2024 को अविमुक्तेश्वरानंद ने मीडिया के सामने जम कर नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी तो हर कोई हैरान रह गया था कि अब यह क्या नया नाटक है जो शंकराचार्य कल तक मोदी की छीछालेदार करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे वे उन की शान में कसीदे क्यों गढ़ रहे हैं.

इस दिन अविमुक्तेश्वरानंद का कहना था कि सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से हिंदुओं का स्वाभिमान जाग गया है. यह छोटी बात नहीं है. हम ने कई बार कहा है कि हम मोदीविरोधी नहीं बल्कि मोदी के प्रशंसक हैं.

असल में इस विरोधाभास की वजह शैव और वैष्णवों की सदियों पुरानी लड़ाई और मतभेद भी थे जो सदियों पहले ही खत्म भी हो चुके थे, लेकिन कहने को ही हुए थे, राममंदिर प्राणप्रतिष्ठा के दौरान दोनों ही संप्रदायों के मठाधीश चाह रहे थे कि राजा उन्हें पूछे और पूजे, दूसरे को नहीं. जो सनातनी यह प्रचार करते फिरते हैं कि इन दोनों संप्रदायों के बीच अब कोई मतभेद नहीं हैं उन्हें अविमुक्तेश्वरानंद के इस बयान पर गौर जरूर करना चाहिए, `अगर राममंदिर रामानंद संप्रदाय का है तो इसे उन्हें सौंप देना चाहिए. चारों पीठों के शंकराचार्यों को इस से कोई रागद्वेष नहीं है. लेकिन शास्त्रसम्मत विधि का पालन किए बिना मूर्ति स्थापित किया जाना सनातनी जनता के लिए उचित नहीं है.`

दोफाड़ संत समाज

चारों पीठों के शंकराचार्यों का `राग द्वेष` खुल कर 22 जनवरी, 2024 को ही सामने आ गया था जब शादी के नाराज फूफाओं की तरह इन में से एक भी प्राणप्रतिष्ठा समारोह में उपस्थित नहीं हुआ था. इस पर जम कर वादविवाद और आरोपप्रत्यारोप संतों के बीच हुए थे. शास्त्र विधि और धर्म सम्मत न होने के शंकराचार्यों के आरोपों पर श्री रामजन्म भूमि तीर्थ ट्रस्ट ने दोटूक कह दिया था कि सबकुछ धर्मसम्मत है. यानी, ये शंकराचार्य सनातन धर्म के विधिविधान वगैरह नहीं जानते.

इस फूट और बैर का अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे ताजे गंभीर आरोपों से बड़ा और अहम कनैक्शन यह है कि आशुतोष ब्रह्मचारी वैष्णव संप्रदाय के संत रामभद्राचार्य का शिष्य है और इस मसले पर संत समाज ही दोफाड़ हो गया है. एक खेमा अविमुक्तेश्वरानंद को साजिश का शिकार मानता है तो दूसरा उन्हें नसीहत, जो असल में धौंस है. इन में रामभद्राचार्य का नाम अहम है जो राममंदिर की प्राणप्रतिष्ठा के बाद से ही अविमुक्तेश्वरानंद पर हमलावर रहे हैं.

विवाद माघ मेले का

इस साल का प्रयागराज का माघ मेला बेहद विवादित रहा था क्योंकि मोनी अमावस्या पर अविमुक्तेश्वरानंद की रथयात्रा को प्रशासन ने इजाजत नहीं दी थी जिस पर वे इतना भड़के थे कि 11 दिन के अनशन पर ही बैठ गए थे. उन का आरोप था कि पालकी शोभायात्रा प्रशासन ने जानबूझ कर रोकी है और उन के शिष्यों के साथ पुलिस ने मारपीट भी की है. बकौल अविमुक्तेश्वरानंद, ऐसा इतिहास में पहली बार हो रहा है कि शंकराचार्य को स्नान नहीं करने दिया जा रहा. देखते ही देखते यह मेला तमाशे में तबदील हो गया था. अविमुक्तेश्वरानंद को उम्मीद थी कि योगी आदित्यनाथ उन के विरोध के आगे घुटने टेक देंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सो, वे और खीझ उठे. इस मुद्दे पर आगलगाऊ और भड़काऊ न्यूज चैनल्स ने खूब वक्त दिया था. एनडीटीवी ने तो 22 जनवरी को एक लाइव डिबेट ही इस विषय पर प्रसारित कर दी थी जिस में रामभद्राचार्य और अविमुक्तेश्वरानंद आमनेसामने थे. इस बहस में दोनों जम कर एकदूसरे पर बरसे थे.

इस के पहले प्रशासन इस कोशिश में लगा रहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद मान जाएं लेकिन जब नहीं माने तो उन्हें यह नोटिस थमा दिया कि आप शंकराचार्य हैं ही कब, लिहाजा इस पदनाम का इस्तेमाल न करें. जैसा कि ऊपर बताया गया है कि अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने न होने का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. अब लड़ाई सीधेसीधे लोकतांत्रिक दौर के वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच सिमट कर रह गई थी जिस में क्षत्रिय शासक को एक दिग्गज वैष्णव संत, जो उन्हें अपना छोटा भाई मानता है, का सहयोग और आशीर्वाद मिल गया था. इस बेमतलब की बहस की परिणति आशुतोष पांडेय द्वारा लगाए गए यौनशोषण के आरोप की शक्ल में ड्रामाई अंदाज में हुई. ये दोनों भी एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप मढ़ते रहे.

अविमुक्तेश्वरानंद इसे राजनीतिक साजिश करार देते यह कहते रहे कि यह एपस्टीन फाइल्स से जनता का ध्यान भटकाने की साजिश है. वे अपने बचाव में वकीलों सरीखी दलीलें देते रहे और आशुतोष पांडेय उन्हें पापी वगैरह कहता रहा. पीड़ित बटुकों का इंटरव्यू एक न्यूज चैनल आजतक ने प्रसारित कर दिया जिस में पीड़ित बच्चों ने खुल कर अविमुक्तेश्वरानंद और उन के शिष्यों पर यौनशोषण के आरोप लगाए. सो, हंगामा और भी बढ़ गया.

गौरतलब है कि एक वक्त में सनातनियों के धार्मिक संत करपात्री महाराज ने गौरक्षा को ले कर देशव्यापी आंदोलन छेड़ा था और देशभर के साधुसंतों का संसद तक पैदल मार्च भी करवा दिया था. 7 नवंबर, 1966 को लाखों लोगों ने संसद का घेराव किया था तब पुलिस लाठीचार्ज और गोलीबारी में लगभग 8 लोग मारे गए थे. हिंदूवादियों ने इस का जिम्मेदार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ठहराया था जिन की इमेज सनातन विरोधी बना दी गई थी. लेकिन 70 के दशक में जिस धर्मगुरु ने इंदिरा गांधी को सहारा दिया था वे स्वरूपानंद थे. वे उन धर्मगुरुओं में से थे जिन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल का खुला समर्थन किया था. तब से उन पर कांग्रेसी शंकराचार्य होने का ठप्पा लग गया था क्योंकि उन के नेहरूगांधी परिवार सहित कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं से घनिष्ठ संबंध थे.

दरअसल, भाजपा को उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी का डर अकसर सताता रहता है. हालांकि, इस के कोई तात्कालिक माने नहीं हैं. दीर्घकालिक क्या होंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा. लेकिन यह सनातनी ब्राह्मण – ब्राह्मण विवाद आसानी से थमेगा, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं क्योंकि इन दोनों ही धर्मगुरुओं की अपनी ठसक है, जिद है, अहं और अहंकार हैं जो त्रेतायुग से ही चले आ रहे हैं. लेकिन अब लोकतंत्र के चलते सब की डोर बहुसंख्यक वैश्यों और शूद्रों यानी पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के हाथ में है जिन के 80 फीसदी वोट तय करते हैं कि दिल्ली और लखनऊ की कुरसी पर कौन बैठेगा. इन दोनों वर्णों ने अगर पहले की तरह यह ठान लिया कि इन में से ही क्यों कोई बैठे, हम में से क्यों नहीं, तो तसवीर कुछ और होगी. Religious Conspiracy

 

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