Reservation System India:

नेता जी सुभाष चंद्र बोस महाविद्यालय लखनऊ का एक सब से अच्छा कालेज है. यहां पढ़ने आने वाली लड़कियों में बड़ी संख्या स्कूटी से आने वाली लड़कियों की है. साइकिल से आने वाली लड़कियों की बेहद कम है. कुछ लड़कियां बस, टैक्सी या कार से आती हैं. यह कालेज लखनऊ के अलीगंज एरिया में कपूरथला और पुरनिया चौराहे के बीच विज्ञान आंचलिक केंद्र के सामने स्थित है. करीब 1200 लड़कियां यहां पढ़ने आती हैं. इन लड़कियों को देख कर इस बात का अंदाजा लगाना आसान होता है कि लड़कियों में ओबीसी जातियों की संख्या अधिक है. यह सांवले रंग की साधारण सी दिखने वाली होती हैं.

केवल सुभाष चंद्र बोस महाविद्यालय का ही नहीं, हर स्कूलकालेज में ओबीसी लड़कियों की संख्या अधिक दिखती है. अगर 1980 के दशक से किसी कालेज से इस की तुलना करें तो ओबीसी लड़कियों की संख्या तेजी से बढ़ी है. पहले लड़कियां साइकिल से अधिक आती थी या फिर उन के परिवार का कोई सदस्य कालेज छोड़ने आता था. ओबीसी की लड़कियां अधिक से अधिक कक्षा 10 या 12 तक पढ़ती थी. इस के बाद उन की शादी हो जाती थी.

अब स्कूल ही नहीं कालेज में भी लड़कियों की संख्या बढ़ी है. बात केवल लड़कियों तक सीमित नहीं रह गई है. ओबीसी लड़के भी अब पहले से अधिक पढ़ रहे हैं. पढ़नेलिखने के बाद भी नौकरियों में इन की संख्या उस अनुपात में नहीं दिखती है. 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में ओबीसी की बेरोजगारी दर लगभग 3.1 फीसदी है. नौकरियों में ओबीसी उस अनुपात में नहीं पहुंच पा रहे हैं जिस तरह से उन की पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है.

1990 में जब मंडल कमीशन लागू हुआ तो ओबीसी को आगे बढ़ने का मौका मिला. मंडल कमीशन लागू होने से अन्य पिछड़ा वर्ग ओबीसी को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 फीसदी का आरक्षण मिला. जिस से उन की सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ. इसने पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना जगाई और उन्हें मंडल राजनीति के तहत सत्ता में मुख्यधारा का भागीदार बनाया, जिस से बिहार और यूपी जैसे राज्यों में राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया.

पिछड़ी जातियों के वोट बैंक के रूप में उभरने से लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को आगे बढ़ने का मौका मिला. उच्च शिक्षा और केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण से ओबीसी युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर मिला. मंडल की राजनीति के जवाब में कमंडल की धार्मिक राजनीति का दौर शुरू हुआ. इसने मंडल से पैदा हुई चेतना को खत्म कर दिया. दूसरी तरफ मंडल कमीशन का लाभ ओबीसी में अपरकास्ट तक ही सीमित रह गया. वह पूरी तरह से पूजापाठी हो गया है. उसे यह लगता है कि जब तक वह ब्राहमणों की तरह से पूजापाठ नहीं करेगा तब तक उसे अगड़ा नहीं माना जाएगा.

पूजापाठी हो गया ओबीसी : मंडल कमीशन के बाद रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि ओबीसी की 6,000 जातियों में से केवल 40 जातियों को ही 50 फीसदी से अधिक लाभ मिला. मंडल कमीशन का पूरा लाभ सभी पिछड़ी जातियों तक समान रूप से नहीं पहुंच सका. मंडल और कमंडल की राजनीति में ओबीसी दो हिस्सों में बंट गया. ओबीसी का एक बड़ा वर्ग पूजापाठी को गया. यह ओबीसी अब जातियों में बंट गया है. इस में जिन के पास पैसा और ताकत आ गई वह धर्म को मानने लगे हैं. इस वर्ग से मोरारी बापू और देवकीनंदन ठाकुर जैसे कई प्रसिद्व कथावाचक हो गए हैं.

उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों में यादव, कुर्मी, निषाद, लोध और मौर्य ओबीसी के लोग कथावाचक हो गए हैं. यह लोग गांव, कस्बों और शहरों में जा कर भागवत कथा, रामायण और देवी भागवत करने लगे हैं. 22 जून का इटावा के दादरपुर गांव में यादव जाति के कथावाचक मुकुटमणि सिंह कथा कहने पहुंच गए. यह गांव ब्राहमणों का था. कथा सुनने वाला परिवार भी ब्राहमण था. जब उन को यह पता चला कि कथा सुनाने के लिए व्यासगद्दी पर बैठने वाला यादव है तो उसे हटाया गया. उस से पैसे वापस लिए गए. और उस के सिर के बाल बनवा कर अपमानित किया गया.

जब सोशल मीडिया पर यह बात फैली जो समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कथावाचकों को लखनऊ बुलाया. उन का समर्थन किया. 21-21 हजार रुपए 3 कथावाचकों को दिया. उन से कथा भी सुनी और इस के बाद भाजपा और उस की मानसिकता का विरोध भी किया. मंडल कमीशन लागू होने के पहले समाजवाद में ब्राहमणवाद का विरोध था. मंडल कमीशन लागू होने का सब से बड़ा लाभ यादवों को मिला. पैसा आने के बाद वह ब्राहमण जैसे बन गए. अब अखिलेश यादव मंच पर समाजवाद की बात करते हैं घर में पूजापाठ होता है.

यादव जाति के तमाम लोग पूजापाठी और कथावाचक हो गए हैं. इन में मुकुटमणि यादव, संत सिंह यादव, ममता यादव, नीलम यादव और बृजेश यादव प्रमख है. हजारों स्थानीय ओबीसी कथावाचक गांवगांव धर्म का प्रचार वैसे ही कर रहे जैसे ब्राहमण कथावाचक करते हैं. जब धर्म आगे आ गया तो जाति और समाजवाद को पीछे जाना ही पड़ेगा. इन ओबीसी कथावाचकों को ओबीसी जाति को मानने वाले लोग ही अपने अपने घरों पर बुलाते हैं. धर्म के प्रभाव में आया व्यक्ति अनजाने ही सही भाजपा का प्रचार करने लगता है. इस को भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तरफ मिला कर ओबीसी राजनीति को खत्म कर दिया. बिहार में राम विलास पासवान और नीतीश कुमार भाजपा के साथ हो गए. इन के सहारे भाजपा ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद को खत्म कर दिया. यादव जाति के नेताओं को अपनी तरफ मिला लिया. इस के ही सहारे भाजपा ने उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया.

सपा केवल यादव और मुसलिमों तक सीमित रह गई. मुलायम सिंह यादव के समय सपा में पिछड़े वर्ग की कई जातियां शामिल थी. अब हालात बदल गए हैं. पिछड़ा वर्ग के पूजापाठी होने यह वह मुसलिमों के प्रति अलग भाव रखने लगे हैं. ऐसे में वह पिछड़ा वर्ग सपा से बिदक रहा है. अब अखिलेश यादव के समाने दिक्कत है कि वह खुद को पूजापाठी कैसे साबित करें. अपने को पूजापाठी साबित करने के लिए अखिलेश यादव अपने गांव सैफई में शिवमंदिर बनवा रहे हैं.

ओबीसी के आगे बढ़ने के बाद उन का जो धार्मिक रूझान बदल गया है. उस से मंडल कमीशन की सोच का खत्म हो गई है. रामचरित मानस की चैपाई ‘ढोल गंवार शुद्र पशु नारी’ को भूल ओबीसी का एक बड़ा तबका पूरी तरह से धार्मिक हो चुका है. यही भाजपा की सब से बड़ी ताकत है. भाजपा धर्म के जरिए राजनीति कर रही है. उस का प्रचार मंदिरों से होता है. अब लगभग हर जाति के लोगों के अलगअलग मंदिर हैं जहां वह अपनेअपने भगवानों की पूजा करते हैं. धर्म के नाम पर यह भाजपा के साथ खड़े हो रहे हैं.

समाजवादी पार्टी का मूल वोटबैंक यादव भी अब अखिलेश यादव के साथ पूरी तरह से नहीं है. वह सपा को पसंद करता है लेकिन जैसे ही मुद्दा हिंदूमुसलिम का होता है वह भाजपा के साथ खड़ा हो जाता है. भाजपा ने इस वर्ग को प्रभावित करने के लिए मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया था. राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में कई ओबीसी नेता उप मुख्यमंत्री बनाए गए. ओबीसी खुद को सवर्ण समझ कर वैसा व्यवहार कर रहा है. उसे लगता है कि पूजापाठ कर के वह सवर्ण बन जाएगा.

ओबीसी जब इंटरकास्ट मैरिज करता है तो सवर्ण उस की पहली पंसद होते हैं. ओबीसी के लोग सवर्णो की लड़कियों से शादियां कर रहे हैं. सवर्ण परिवारों की यह लड़कियां घर के अंदर से ही बदलाव कर रही हैं. इन के बच्चे पूरी तरह से सवर्णो वाला व्यवहार करते हैं यही उन के स्वभाव में रच बस जाता है. उत्तर प्रदेश में सब से बड़े यादव परिवार मुलायम सिंह यादव का घर इस का उदाहरण है. मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता थी. जिस से उन को एक बेटा प्रतीक यादव है. प्रतीक यादव ने ठाकुर जाति की अपर्णा बिष्ठ से शादी की.

मुलायम सिंह यादव के बड़े बेटे अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव पहाड़ी जाति की ठाकुर है. उन के पिता का नाम आरएस रावत और मां का नाम चंपा रावत है. शादी के पहले डिंपल सिंह रावत थी. अब डिंपल यादव हो गई हैं. मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव की पत्नी राजलक्ष्मी मध्य प्रदेश के मैहर राजपूत घराने की है. इन के नाना राजा कुवंर नारायण सिंह जूदेव 3 बार विधायक रहे. राजलक्ष्मी ने लखनऊ विश्व विद्यालय से एमबीए किया था.

बिहार में लालू प्रसाद यादव के बेटे तेज प्रताप यादव की शादी भूमिहार जाति से आने वाले नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय की पौत्री ऐष्वर्या राय से हुई. ऐष्वर्या के पिता चंद्रिका राय भी बिहार में मंत्री रहे. लालू प्रसाद यादव के दूसरे बेटे तेजस्वी यादव की पत्नी रैचल गोडिन्हो हरियाणा के रेवाडी में रहने वाले इसाई परिवार की है. वह दिल्ली में पलीबढ़ी यहीं तेजस्वी यादव से उन की मुलाकात हुई और शादी के बाद उन का नाम राजश्री यादव हो गया. राजश्री यादव नाम इसलिए रखा गया जिस से बिहार के लोग आसानी से इस का उच्चारण कर सके. इस नाम को रखने का सुझाव लालू प्रसाद यादव ने ही दिया था.

ओबीसी जातियों ने खुद को सवर्णो की तरह बदला. वह अपना रहनसहन और व्यवहार सवर्णो जैसा ही करने लगी. धार्मिक रूप से वह सवर्णों की तरह की व्यवहार करने लगे हैं. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भले ही खुद को शुद्र कहे लेकिन उन का व्यवहार सवर्ण जैसा ही होता है. वोट से अलग हट कर देखें तो वह धर्म को पूरी तरह से मानते हैं. अपने पिता की अस्थियों का विर्सजन पूरी आस्था और धार्मिक कर्मकांडों के साथ किया. वह गंगा में डुबकी लगाए और कुंभ भी नहाएं. ऐसे में एससी जातियों को ओबीसी और सवर्णो में फर्क नजर नहीं आता है.

दक्षिणपंथ से अलग थी समाजवादी विचारधारा : धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर रामदेव का कारोबार भले ही बढ़ गया हो पर इस से वर्ण व्यवस्था पर कोई असर नहीं हुआ. ऐसे ओबीसी नेताओं की लिस्ट लंबी है. जो ओबीसी के नाम पर आगे तो बढ़ गए लेकिन वह खुद को ब्राहमण जैसा समझने लगे. ओबीसी के जो नेता आगे बढ़े वह धर्म की आलोचना कर के ही आगे बढ़े थे. इन की विचारधारा दक्षिणपंथी पंडावाद की नहीं थी. यह समाजवादी विचारधारा के थे. जिस में महिलाओं और रूढ़िवादी विचारों को व्यापक जगह दी गई थी.

समाजवादी राजनीति उस पक्ष या विचारधारा को कहते हैं जो वर्ण व्यवस्था वाले समाज को बदल कर उस में अधिक आर्थिक और जातीय समानता लाना चाहते हैं. इस विचारधारा में समाज के उन लोगों के लिए सहानुभूति जताई जाती है जो किसी भी कारण से अन्य लोगों की तुलना में पिछड़ गए हों या कमजोर हो. समाजवादी विचारधारा सब को साथ ले कर चलने की बात करती है. यह वर्णव्यवस्था के ठीक विपरीत विचारों को ले कर चलती है. यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कहा कि ‘हम शूद्र है.’ समाजवादी पार्टी कार्यालय पर इस का प्रचार करता होर्डिंग भी लगाया गया था. उत्तर प्रदेश में रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले नेता स्वामी प्रसाद मौर्य उस समय समाजवादी पार्टी में थे. इस को ले कर सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर सवाल उठ रहे थे.

उसी समय अखिलेश यादव मंदिरों में दर्शन करने गए उतो हिंदू संगठनों ने उन को काले झंडे दिखाए और उन के खिलाफ नारेबाजी की थी. इसे ले कर अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार पर हमला बोलते कहा था कि मैं मुख्यमंत्री जी से सदन में पूछूंगा कि मैं शूद्र हूं कि नहीं हूं. भाजपा और आरएसएस के लोग दलितों और पिछड़ों को शूद्र समझते हैं.’ यह वर्ण व्यवस्था की देन थी.

अखिलेश यादव कितनी भी वर्ण व्यवस्था की बात कर ले पर उन की पत्नी और सांसद डिंपल यादव नवरात्रि में कन्या पूजन कर उन का खाना खिलाती है. वह मंदिर बनवा रहे हैं. ऐसे में समाजवादी विचारधारा छोड़ ओबीसी अब धार्मिक हो कर कमंडल की तरफ झुक गए हैं. जिस से समाजवादी विचारधारा खत्म हो गई है. समाजवाद की बातें केवल भाषणों तक ही सीमित रह गई है. वह वर्ण व्यवस्था की आलोचना तो करते हैं पर उसी वर्णव्यवस्था का हिस्सा बन कर रह गए हैं. समाजवादी नेताओं की कथनी और करनी में अंतर होने से वोटर एक जुट नहीं हो पा रहा है.

क्या है वर्ण व्यवस्था ?

वर्ण व्यवस्था का सब से पहले जिक्र ऋग्वेद के दसवें मंडल में पाया जाता है. यही बाद में जातीय व्यवस्था व्यवस्था बन गई. जातीय व्यवस्था में 4 जातियां प्रमुख रखी गई. यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है. शूद्र का मतलब दलित वर्ग से नहीं था. वर्ण व्यवस्था में उन को तो चर्चा के लायक भी नहीं समझा जाता था. वर्ण व्यवस्था 1500 ईसा पूर्व आर्यों के आने के साथ ही भारत में आ गई थी. यह मध्य एशिया से भारत आए थे. यह गोरे रंग वाले लोग थे. अपनी नस्लीय श्रेष्ठता को बनाए रखने के प्रयास में उन्होंने देश के मूल निवासियों यानी काली चमड़ी वाले लोगों से खुद को अलग रखा था.

आर्यों के आगमन के बाद समाज में दो वर्ग हो गए. मूलवर्ग काले रंग का था. जिस को दास कहा गया. ऋग्वैदिक काल में ही समाज का विभाजन हो गया था. आर्यों के एक समूह ने बौद्धिक नेतृत्व के लिए खुद को दूसरों से अलग रखा. इस समूह को ‘पुजारी’ कहा जाता था. दूसरे समूह ने समाज की रक्षा के लिए दावा किया. जिसे ‘राजन्या’ यानि राजा से पैदा कहा जाता था. यही आगे चल कर क्षत्रिय वर्ग बन गया. तीसरे वर्ग ने कारोबार करना शुरू किया यह ही वैश्य कहलाया.

उत्तर वैदिक काल में शूद्र नामक एक नए वर्ण का उदय हुआ. इस की जानकारी ऋग्वेद के दसवें मंडल में मिलती है. ब्राह्मणों, क्षत्रिय और वैश्यों को द्विज का दर्जा दिया गया था. जबकि शूद्रों को द्विज स्थिति के दायरे से बाहर रखा गया था और उन्हें ऊपरी 3 वर्णों की सेवा के लिए बनाया गया था. वर्ण व्यवस्था के तहत लोगों को उन की सामाजिक आर्थिक स्थिति के आधार पर दर्जा दिया जाता था. वर्ण व्यवस्था के तहत समाज को 4 अलगअलग वर्णों में विभाजित किया गया था. इस के आधार पर जातीय भेदभाव भी खूब होता है.

वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था. एक ब्राह्मण महिला एक ब्राह्मण पुरुष से ही शादी कर सकती थी. इस के बाद दूसरे नंबर पर क्षत्रिय वर्ग आता था. इन का मुख्य कार्य युद्धभूमि में लड़ना था. एक क्षत्रिय को सभी वर्णों की स्त्री से विवाह करने की अनुमति थी. हालांकि एक ब्राह्मण या क्षत्रिय महिला को प्राथमिकता दी जाती थी. इस व्यवस्था में तीसरा नंबर वैश्य का था. इस वर्ण की महिलाएं पशुपालन, कृषि और व्यवसाय में अपने पति का साथ देती थी. वैश्य महिलाओं को किसी भी वर्ण के पुरुष से शादी करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई थी. शूद्र पुरुष से शादी करने का प्रयास नहीं किया जाता था.

शूद्र वर्ण व्यवस्था में सब से निचले स्थान पर थे. इन को किसी भी तरह के अनुष्ठान करने से रोक दिया गया था. कुछ शूद्रों को किसानों और व्यापारियों के रूप में काम करने की अनुमति थी. शूद्र महिलाएं किसी भी वर्ण के पुरुष से विवाह कर सकती थीं. जबकि एक शूद्र पुरुष केवल शूद्र वर्ण की महिला से ही विवाह कर सकता था. बौध और जैन धर्म में वर्ण व्यवस्था में जातीय भेदभाव को खत्म करने की कोशिश की लेकिन यह खत्म नहीं हो सका. आजादी के बाद भी इस का प्रभाव कायम है. संविधान से मिली आरक्षण की ताकत से शूद्र वर्ग के लोग राजनीतिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ गए. आर्थिक संपन्नता से यह खुद को ब्राहमणों जैसे समझने लगे. असल में यह अपने वर्ग में श्रेष्ठ हो सकते हैं, लेकिन वर्ण व्यवस्था में इन की जगह जहां थी वहीं है. इस का सब से बड़ा उदाहरण समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले वैवाहिक विज्ञापनों में देखी जा सकती है.

वैवाहिक विज्ञापनों में दिखती है वर्ण व्यवस्था : ‘ब्राह्मण, 29 वर्षीय पोस्ट ग्रैजुएट बिजनेसमैन युवक के लिए सर्वगुण सुंदर, स्लिम, संस्कारी, गृहकार्य दक्ष, विश्वसनीय, ईमानदार व शाकाहारी वधु चाहिए.’ नौकरी केवल सरकारी टीचर और केवल ब्राह्मण परिवार ही स्वीकार्य. कुंडली मिलान और 36 गुणयोग, बायोडाटा फोटो सहित सम्पर्क करें.’ वैवाहिक विज्ञापनों में पूरी जातीय और वर्ण व्यवस्था दिखती है. हर जाति के लिए अलग कालम बने हैं. जहां अंतरजातीय विवाह की बात होती है उस का अर्थ है कि ब्राहमण, क्षत्रिय और वैश्य आपस में विवाह कर सकते हैं. शूद्र के साथ यह लोग अतंरजातीय विवाह नहीं करते हैं. यह विज्ञापन आज भी उतने ही रूढ़िवादी और जातिवादी हैं जितने पहले थे.

हाल के 10-15 सालों में विज्ञापन और अधिक पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त हो गए हैं. इन विज्ञापनों में यह भी दिखता है कि कैसे हमारे सामाज में विवाह की मूल सोच को नकारते हुए इसे वैवाहिक सौदा बनाया गया है जिस में जाति, धर्म, गोत्र का ध्यान रखना सब से पहले आवश्यक है. कुछ विज्ञापनों में बिना दहेज और कोई जाति बाधा न होने जैसी बातें भले ही लिखी जा रही हैं लेकिन विज्ञापन देनेवाले अपनी जाति का उल्लेख करना नहीं भूलते हैं. वास्तविक रूप अपनी जाति से इतर शादी करना कितना कठिन होता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हमारे समाज में अपनी पसंद से शादी करने वाले जोड़े को जान तक गंवानी पड़ती है.

शादी के नाम पर पहले भी मातापिता की रजामंदी के आधार पर जातीय व धार्मिक व्यवस्था को लागू किया जाता आ रहा है. मैट्रिमोनियल साइट्स इन बातों को ध्यान में रखते हुए जाति, धर्म, समुदाय, क्षेत्र और व्यव्साय जैसे वर्गों को अपनी साइट्स में बांटे हुए हैं. वैवाहिक विज्ञापनों और साइट्स की भाषा समाज की उसी मानसिकता को दिखाते हैं. जो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की ही मानसिकता है.

वैवाहिक विज्ञापनों की शुरूआत के पहले कालम में ‘ब्राहमण’ वैसे ही लिखा होता है जैसे वर्ण व्यवस्था में उस का नाम पहले आता है. वर चाहिए या वधू इस के अलगअलग कालम होते हैं. इस के बाद क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ, जाट, जाटव, मुस्लिम, यादव, बंगाली, पंजाबी, सिख होते हैं. एक कालम अन्य का होता है. इस में पासी, विश्वकर्मा, पाल, गड़रिया, प्रजापति, चमार जैसी जातियों के लिए वर या वधू का जिक्र होता है. ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य के विज्ञापनों में सजातीय शब्द के वरवधू की चाहत अधिक होती है. बहुत कम में जाति बंधन नहीं लिखा मिलता है. पासी, विश्वकर्मा, पाल, गड़रिया, प्रजापति, चमार और जाटव जैसी जातियों के वर्ग में जाति बंधन नहीं लिखा होता है.

सोशल मीडिया पर वैवाहिक साइटों की मैंबरशिप लेने से पहले वर या वधू का पूरी जानकारी बायोडाटा के रूप में ली जाती है. अब इस में लड़कालड़की और उस के मातापिता की जानकारी के अलावा भाई, बहन, चाचा और चाची की जानकारी भी ली जाती है. इस के साथ ही साथ लड़की शाकाहारी और अल्कोहल का प्रयोग नहीं करती यह भी लिखा जाता है. एक नया कालम जुड़ गया है जिस में पूछा जाता है कि वह सोशल मीडिया पर रील तो नहीं बनाती. समाचारपत्रों के वैवाहिक विज्ञापनों में कम बातों का जिक्र किया जाता है. वैवाहिक साइटों में तमाम गोपनीय जानकारी ली जाती है. जिस से आर्थिक हालत, लोन, ईएमआई जैसे सवाल होते हैं. कुछ बातें फार्म में भरी नहीं जाती अपने परिचय में बताई जाती है. वैवाहिक साइटों को चलाने वाला का दावा है कि इन जानकारियों के जरिए ही वह परफैक्ट मैच तलाश करते हैं. इन के जरिए लोगों की गोपनीय जानकारियां कहीं की कहीं पहुंचने का खतरा रहता है. 1990 से पहले इंटरकास्ट मैरिज का जोर सुनाई देता है. अब समाजवादी विचारधारा की तरह यह भी डूब गया है.

आजादी के 77 साल के बाद भी वर्ण व्यवस्था कायम है. 1960 से 1990 के बीच ब्राह्मणवाद को पीछे ढकेल कर समाजवाद आगे आया था. उस दौर में न केवल समाजवाद का आधार बढ़ा था बल्कि ब्राह्मणवाद और मनुवाद पीछे गया था. 1990 के बाद मंडल बनाम कमंडल की राजनीति में पहले ऐसा लगा जैसे कमंडल पिछड़ जाएगा. जैसे ही समाजवाद परिवार और जाति के लाभ में बदलने लगा समाजवाद का प्रभाव घटने लगा. समाजवादी लोग खुल कर धर्म की बुराई नहीं कर सकते हैं. मनुवाद का नाम लेने में समाजवादी विचारधारा के लोगों की जुबान पर ताला लग जा रहा है. ऐसे में कैसे समाजवाद बढ़ पाएगा?

समाजवाद की जड़े कार्ल मार्क्स और फ्रैडरिक एगेल्स के विचारों से जुड़ी है. यह आर्थिक समानता, वर्ग संघर्ष और धर्म को निजी मामला मानने की बात करता है. भारत का समाजवाद इस से अलग विचारों का रहा है. भारत का समाजवाद मिश्रित विचारधारा का रहा है. राम मनोहर लोहिया ने धर्म का सांस्कृतिक जुड़ाव माना था. जय प्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं से जुड़े लालू, मुलायम जैसे नेताओं ने धर्म से कोई दूरी नहीं बनाई थी. भारत का समाजवाद धर्म से दूर नहीं रहा. वह जातिवाद पर फोकस करता रहा.

दक्षिणापंथी लोगों ने इस का लाभ उठाया और समाजवाद को धर्म से जोड़ लिया. राजनीति में धर्म का प्रभाव बढ़ने से समाजवादी विचारधारा को धर्म से जोड़ने में मदद मिल गई. धर्म से खुद को जोड़ने के चक्कर में समाजवाद बिखर गया. समाजवादी नेताओं ने सोचा था कि वह धर्म के साथ संतुलन साध कर आगे निकल जाएंगे. संतुलन की रस्सी इतनी पतली निकली कि इस पर चलने वाले फिसल कर धर्म कि खाई में गिर गए. अब उन का बाहर निकल पाना संभाव नहीं है. उन को बीचबीच में चुनावी सफलता भले मिल जाए पर अब उन के वैचारिक बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. Reservation System India

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