Middle East war : ईरान-इजराइल युद्ध वैश्विक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी बन गया है. क्षेत्रीय शक्तियां हथियारों की होड़ में आगे बढ़ती रहीं, तो पश्चिम एशिया में अशांति और अस्थिरता गहराती चली जाएगी. युद्ध रोकने के कूटनीतिक प्रयास कहीं दिखाई नहीं दे रहे. हमले बढ़ेंगे तो उन का दायरा और बड़ा हो सकता है. यानी, युद्ध की जद में कई देश और आ जाएंगे.
ईरान अब ऐसे हथियारों से हमले कर रहा है जो आयरन डोम को फेल कर रहे हैं. क्लस्टर बम, जो एक मिसाइल के अंदर मौजूद सैकड़ों छोटेछोटे बम होते हैं, में हर बम में करीब 5 किलोग्राम तक विस्फोटक होता है. एक मिसाइल में लगभग 24 क्लस्टर बम होते हैं, यह संख्या 80 तक पहुंच सकती है. जब ऐसी मिसाइल से हमला किया जाता है तो यह 8 से 10 किलोमीटर के दायरे को कवर करती है. ईरान ने इन मिसाइलों का इस्तेमाल कर के अमेरिका और इजराइल के बेहद महंगे व विनाशक हथियारों की ऐसी हवा निकाली कि जिस की कल्पना भी इन दोनों देशों ने न की होगी.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान-इजराइल युद्ध को जितने हलके में ले कर इजराइल का साथ दिया था, अब यह उतना ही भयानक हो चुका है. ट्रंप ने सोचा था कि ईरान के सुप्रीम लीडर के साथ दोचार अन्य नेताओं का खात्मा कर के वे हफ्तेभर में ईरान को अपने कदमों में झुका लेंगे, खामेनेई की सत्ता पलट कर वहां अपनी किसी कठपुतली को बिठा देंगे, मगर इस जंग में अब खुद अमेरिका दो पाटों के बीच पिस रहा है.
अमेरिका और इजरायल का टूटा सपना
जारी जंग में ईरान की जिन मिसाइलों के खत्म होने का इंतजार अमेरिका कर रहा था, वो तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं, उलटे, इजराइल के इंटरसैप्टर जरूर खात्मे की कगार पर हैं, जिन से वो ईरानी मिसाइलों से अपना बचाव कर रहा था. इजराइल के पास पहले ही इंटरसैप्टर की संख्या कम थी क्योंकि पिछले साल ईरान के साथ हुए संघर्ष में इन का काफी इस्तेमाल हो चुका था. अब मौजूदा युद्ध में ईरान लगातार मिसाइल हमले कर रहा है, जिस से इजराइल की लंबी दूरी की रक्षा प्रणाली पर भारी दबाव पड़ रहा है.
हैरानी तो यह है कि ईरान अब अपनी मिसाइलों में क्लस्टर म्यूनिशन भी जोड़ रहा है, जिस से निपटना इजराइल के लिए चुनौती साबित हो रहा है. क्लस्टर म्यूनिशन वह प्रणाली है जिस से एक मिसाइल से कई छोटेछोटे बम गिरते हैं, जिन्हें रोकना और मुश्किल हो रहा है. यह जंग कितनी लंबी चलेगी, फिलहाल कहना मुश्किल है क्योंकि अमेरिका और इजराइल मिल कर जिस ईरान को कब्जाने का सपना देख रहे थे उस के पास जमा हथियारों की तादाद ने इन दोनों देशों का गणित बिगाड़ दिया है.
ये हमले क्यों ज्यादा प्रभावशाली हैं
ईरान की मिलिट्री पावर और आक्रामक रवैये से यह तो साफ हो गया है कि ईरान ने बीते सालों में न केवल अपने डिफैंस सिस्टम को मजबूत किया है, बल्कि सस्ते मगर घातक हथियारों के उत्पादन में भी बढ़त हासिल कर ली है.
ईरान की युद्ध रणनीति अब पारंपरिक तरीकों तक सीमित नहीं रही है. उस ने मिसाइल तकनीक, ड्रोन और प्रौक्सी नैटवर्क के माध्यम से एक मल्टीलैवल मिलिट्री स्ट्रक्चर खड़ा कर लिया है. उस के ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रभाव पिछले साल की लड़ाई में भी देखा गया था. इस युद्ध में उस ने दुनिया को दिखा दिया है कि कम संसाधनों में भी उस ने जबरदस्त प्रभाव वाले हथियार विकसित करने की दिशा में बड़ी सफलता पाई है.
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि युद्ध में तबाही का आकलन केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि उन के रणनीतिक उपयोग, लक्ष्य चयन और मनोवैज्ञानिक प्रभाव से भी होता है. इस बार के युद्ध में ईरान इन तीनों पहलुओं में भी दक्षता दिखाता नजर आ रहा है. यही कारण है कि हमले ज्यादा प्रभावशाली हैं.
ईरान इस समय एक बड़ी रणनीति के तहत जंग लड़ रहा है. अमेरिका को धूल चटाने के लिए उस ने दुनियाभर के देशों में मौजूद तमाम अमेरिकी मिलिट्री अड्डों को गिनगिन कर निशाना बनाया और तबाह किया है. यही नहीं, अब वह उन तमाम देशों के तेल भंडारों को भी नष्ट करने की दिशा में बढ़ रहा है जो देश अमेरिका और इजराइल के मददगार हैं. ईरान ने अमेरिका का समर्थन कर रहे मिडिलईस्ट के देशों को धमकी दी है कि उस के निशाने पर सभी तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर हैं. इस के बाद मिडिलईस्ट में तेल और गैस प्रोडक्शन पर संकट मंडराने लगा है.
यूरोप और एशिया में गैस के लिए होड़
19 मार्च को ईरान ने कतर के लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) प्लांट पर हमला कर दुनिया में कुहराम सा मचा दिया. यानी, अब यह युद्ध औयल इंफ्रा अटैक में तबदील होता जा रहा है. कतर के जिस एलएनजी प्लांट पर हमला हुआ है वह दुनिया के सब से बड़े गैस निर्यात केंद्रों में से एक है. उस के बाद यूरोप में गैस की कीमतों में 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यूरोप एलएनजी पर ज्यादा निर्भर है और ईरान ने हमला कर पूरी सप्लाई चेन ब्लौक कर दी है.
ऐसे में अब यूरोप और एशिया में गैस के लिए होड़ बढ़ेगी. फिलहाल इन क्षेत्रों के तमाम प्लांट्स सुरक्षा के मद्देनजर बंद कर दिए गए हैं. आने वाले दिनों में तेल और गैस की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है. भारत के लिए भी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि भारत कतर से गैस आयात करता है जिस का सब से बड़ा प्लांट बंद होने से सप्लाई बाधित होगी. ऐसे में देश में कंप्रेस्ड नैचुरल गैस (सीएनजी) और पाइप्ड नैचुरल गैस (पीएनजी) महंगी हो सकती हैं. यही नहीं, बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है. यानी, आम आदमी तक महंगाई की मार बस पहुंचने ही वाली है.
गौरतलब है कि ईरान ने बहुत सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों से वार किए और अमेरिका व इजराइल ने उन ड्रोन्स को मारने के लिए अपनी महंगी मिसाइलों व डिफैंस सिस्टम का इस्तेमाल किया. इस से अमेरिका-इजराइल के लिए ईरान के सस्ते ड्रोन्स को मारना बहुत महंगा साबित हुआ. उन्होंने सोचा था कि ईरान थोड़ेबहुत हमले के बाद डर कर घुटनों पर आ जाएगा मगर ईरान ने तो इजराइल और मिडिलईस्ट के देशों में तमाम अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों पर ड्रोन्स की बारिश कर दी.
बताते चलें कि एस-400 दुनिया का एक सब से आधुनिक डिफैंस सिस्टम है और यह 400 किलोमीटर दूर के खतरों पर वार कर सकता है. इस डिफैंस सिस्टम को मुख्य रूप से फाइटर जेट्स और खतरनाक मिसाइलों को रोकने के लिए बनाया गया है. मगर एस-400 जैसे बेहद आधुनिक डिफैंस सिस्टम से हर हवाई खतरे पर वार करना समझदारी नहीं है. इस को औपरेट करने का खर्च बहुत ज्यादा है. एस-400 से एक बार मिसाइल दागने में 2.5 करोड़ से 16 करोड़ रुपए का खर्च आता है. यह इस सिस्मट में लगी तरहतरह की मिसाइलों के हिसाब से तय होता है. ऐसे में ड्रोन जैसे नन्हें एरियल खतरों को मारने के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल करना बेवकूफी है, जो इजराइल कर बैठा है.
ईरान जिस तरह से जंग में तबाही मचा रहा है, उस से यह प्रतीत होता है कि उस ने बहुत बड़ी तादाद में घातक हथियार बना लिए हैं. शायद रूस और चीन भी उस की अप्रत्यक्ष रूप में मदद कर रहे हैं. मगर हथियार सिर्फ खून बहा सकते हैं, शांति नहीं ला सकते. रूसयूक्रेन युद्ध ने दोनों देशों को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है. उन्हें फिर से व्यवस्थित होने में दशकों का समय लगेगा. अगर अमेरिका बीच में न कूदता तो ईरान-इजराइल युद्ध इतना लंबा न खिंचता, तबाही इतने बड़े पैमाने पर न होती जिस के कारण दुनिया के तमाम देशों के आगे तेल और गैस का इतना बड़ा संकट खड़ा हो गया है. मगर अमेरिका की अदूरदर्शिता और हेठी ने अपने साथसाथ पूरी दुनिया को परेशानी में डाल दिया है.
यह धर्म युद्ध है
इस युद्ध को देख कर कुछ लोग यह तर्क देने लगे हैं कि वियतनाम और दक्षिण कोरिया भी युद्ध की आग से तप कर मजबूत और विकसित राष्ट्र बने. आर्थिक चमत्कार की मिसाल बने. ईरान भी आने वाले सालों में ताकतवर राष्ट्र के रूप में उभर सकता है, मगर यह सोच बिलकुल गलत है. दरअसल ईरान-इजराइलअमेरिका के बीच धर्म युद्ध चल रहा है. ऊपरी तौर पर भले यह मालूम पड़े कि लड़ाई अस्तित्व की, तेल की, भूमि हथियाने की है, मगर सच्चाई यह है कि यह युद्ध सिर्फ धर्म का है. इसलाम-यहूदी और ईसाइयत के बीच जंग है, जो सदियों से जारी है. और यह एक कड़वी सच्चाई है कि धर्म ने जिनजिन देशों में युद्ध करवाए, उन देशों के आम नागरिक कभी चैन और सुकून की जिंदगी नहीं जी पाए.
ईरान के मामले में वियतनाम और दक्षिण कोरिया का उदाहरण देना गलत सिद्ध होगा क्योंकि इन दोनों देशों में धर्म युद्ध नहीं लड़ा गया था. और युद्ध के बाद उन्होंने शांति, संस्थागत सुधार और वैश्विक सहयोग को अपनाया था. युद्ध के बाद जो नीतियां इन देशों में बनीं उन नीतियों ने उन्हें आगे बढ़ाया. वियतनाम ने दशकों तक आर्थिक सुधार, वैश्विक निवेश और राजनीतिक स्थिरता पर जोर दिया, जबकि दक्षिण कोरिया को अमेरिका का व्यापक समर्थन, तकनीकी निवेश और वैश्विक बाजारों तक खुली पहुंच मिली.
इस के विपरीत, ईरान की स्थिति जटिल है. इस के साथ ही ईरान इसलामिक राष्ट्र के रूप में अपनेआप को स्थापित करना चाहता है. उस की इस चाहत में ईरान की कुछ जनता उस के साथ है और कुछ उस के खिलाफ. बहुतेरी कुर्द औरतें हिजाब को उतार फेंकना चाहती हैं और पश्चिमी लिबास में आजाद घूमने की इच्छा रखती हैं. वहीं एक बड़ी संख्या उन औरतों की भी है जो जबरन हिजाब ओढ़ कर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं या नौकरियां कर रही हैं. वे डाक्टर, इंजीनियर, नर्स, टीचर, लैक्चरर हैं.
बीते कुछ सालों से पश्चिमी मीडिया इस चीज को जोरशोर से उठा रहा है कि ईरान में महिलाओं के हक कुचले जाते हैं. ईरान ने अपने नागरिकों से खुल कर सांस लेने की आजादी छीन ली है. औरतें कैसे कपड़े पहनें, कैसे बाल बनाएं, कैसे चलें, किस के साथ आएंजाएं, सब इसलाम की नजर से तय हो रहा है. लगातार इस तरह की खबरों से ईरान के भीतर भी अविश्वास, घृणा, असहयोग और तनाव का माहौल बना है. धार्मिक प्रतिबंध ज्यादा होने लगें, तो उपद्रव में देर नहीं लगती है, ईरान को यह समझना होगा. जब किसी समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित होती है और शासन व्यवस्था धार्मिक नियंत्रण में होती है, तो वहां स्थायी विकास की संभावनाएं कमजोर पड़ जाती हैं. ऐसे वातावरण में युद्ध केवल अस्थिरता को और गहरा करता है.
अमेरिकीइजराइली हमले से ठीक पहले ईरान बुरी तरह ईरानी जनता के विद्रोह का सामना कर रहा था. अमेरिका और इजराइल ने उस विरोध की शक्ति छीन ली और ताकत फिर से कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं के हाथों में आ गई है.
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युद्ध की भेंट चढ़ गए ईरान के प्रमुख नेता
अमेरिकाइजराइल और ईरान के बीच जारी जंग में ईरान के कई प्रमुख राजनीतिक और सैन्य हस्तियों की जानें गई हैं जिस के कारण शीर्ष नेतृत्व को गहरा झटका लगा है.
अयातुल्लाह अली खामेनेई : ईरान के सर्वोच्च नेता, जो 1989 से सत्ता में थे. 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में उन के परिसर पर हुए हवाई हमले में मारे गए. वे 86 वर्ष के थे. उन के 3 दशकों से अधिक के शासनकाल ने सुरक्षा तंत्र के माध्यम से सत्ता को मजबूत किया और ईरान के प्रभाव का विस्तार किया. उन के परमाणु कार्यक्रम के कारण उन्हें बारबार पश्चिम के साथ टकराव का सामना करना पड़ा.
अली लारीजानी : सुप्रीम नैशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव और एक प्रभावशाली रणनीतिकार, जिन्हें 17 मार्च, 2026 को एक इजराइली हवाई हमले में मार गिराया गया. वे 67 वर्ष के थे. उन के साथ उन के बेटे और एक डिप्टी भी मारे गए. वे सर्वोच्च नेता के करीबी सलाहकार थे और ईरान की सुरक्षा व विदेश नीति को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
अली शमखानी : खामेनेई के करीबी सलाहकार और पूर्व रक्षा मंत्री, इन की 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में किए गए एक हमले में मृत्यु हो गई. इस से पहले इजराइल और ईरान के बीच जून में हुए 12 दिवसीय युद्ध के दौरान इन के घर पर हुए हमले में वे बालबाल बचे थे.
मोहम्मद पाकपुर : ये ईरान की सब से शक्तिशाली सैन्य टुकड़ी इसलामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स (आईआरजीसी) के कमांडर-इन-चीफ थे जो 28 फरवरी, 2026 के हमले में मारे गए.
अजीज नसीरजादेह : ईरान के रक्षा मंत्री और वायुसेना के अनुभवी अधिकारी अजीज को 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में शीर्ष नेतृत्व पर हुए हमलों में मार दिया गया. उन्होंने सैन्य योजना और रक्षा नीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
गुलामरेजा सोलेमानी : ईरान के बासिज अर्धसैनिक बल के कमांडर 17 मार्च, 2026 के हमले में मारे गए. वे रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के वरिष्ठ अधिकारी और आतंरिक सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व्यक्ति थे.
इस्माइल खतीब : ईरान के खुफिया मंत्री की मौत 18 मार्च, 2026 को इजराइली हमले में हुई. एक कट्टरपंथी धर्मगुरु और राजनीतिज्ञ, जिन्होंने अगस्त 2021 में नागरिक खुफिया तंत्र का नेतृत्व करने से पहले अयातुल्लाह खामेनेई के कार्यालय में भी काम किया था.
अब्दोलरहीम मौसवी : ईरानी सशस्त्र बलों के चीफ औफ स्टाफ, जो 28 फरवरी, 2026 के हमलों में मारे गए.
अली मोहम्मद नैनी : ये आईआरजीसी के प्रवक्ता थे जिन्हें युद्ध के 21वें दिन अमेरिकीइजराइली हमले में मार दिया गया.
इन के अलावा, कई अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, सुरक्षा सलाहकार और परमाणु वैज्ञानिक भी इस संघर्ष के दौरान मारे गए हैं, जिस से ईरान का सुरक्षा ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ है. , Middle East war





