Family Story in Hindi : रोज बस वही घर, घर के काम, बच्चों, पति को देखना. कुछ सुकून देता था स्वाति को, तो वह था छत पर आ कर पड़ोस की सहेली सुनीता से जीभर के बातें करना. पर कमबख्त उस के घुटने के दर्द ने उस से यह सुख भी छीन लिया.
कामवाली झाड़ूपोंछा कर के जा चुकी थी. स्वाति बचा हुआ काम जल्दीजल्दी निबटा रही थी. रैक में धुले हुए बरतन लगा कर किचन की सफाई पूरी की और एक गहरी सांस ली. बस, अब वह फ्री थी अपनी खुशियों के समुद्र में गोते लगाने के लिए.
उस ने एक पल को मुंह उठा कर ऊपर की ओर देखा, यह खुला आसमान जैसे अब कुछ देर के लिए उस का अपना था. बस, फिर तो चप्पल पहनी और झाटपट आंगन से छत की सीढि़यां चढ़ गई. मुंडेर से झांका तो दिल खुश हो गया, उधर, सुनीता भी बालटी में कपड़े लिए ऊपर आ रही थी.
दोनों ने एकदूसरे को मुसकरा कर देखा और दोनों अपनीअपनी छत पर मुंडेर के पास आ कर खड़ी हो गईं.
‘‘वाशिंग मशीन ठीक करा ली तू ने?’’ स्वाति ने धुले कपड़े देख कर पूछा.
‘‘कहां दीदी, हाथ से ही धोए हैं.’’
‘‘अरे, मेरी मशीन से धो लेती, कहा तो था उस दिन भी.’’
‘‘अरे दीदी, कपड़े धोतेधोते दस काम और भी निबटा लेती हूं. अब वहां आ कर धोने लगी तो यहां का काम तो रुक ही जाएगा. वैसे, ‘कल आएगा मिस्त्री’ ये कह कर गए हैं. काम तो निबट ही जाता है, दीदी. और बस, आप से बातें कर के जी हलका हो जाता है.’’
‘‘यह तो है. एक तू ही तो है जिस से जीभर कर बातें कर लेती हूं. पूरे दिन में एक यही समय तो अपना होता है जिस का इंतजार रहता है और इसीलिए सुबह जल्दी सारा काम भी खत्म कर लेती हूं.’’
‘‘हां दीदी, यही तो है. आज काम ज्यादा था तो पोहा बना लिया था नाश्ते में. नमन को टिफिन में भी वही दे दिया.’’
‘‘मैं ने तो परांठे ही बनाए. आरव 12वीं में आ गया मगर टिफिन में परांठासब्जी ही ले कर जाता है. इसीलिए सब्जी काट कर रख दी थी रात ही.’’
‘‘अरे, हां दीदी, रात कैसा शोर हो रहा था, क्या बात हो गई?’’
‘‘अरे वही, पिछली गली में कुछ कहासुनी हो गई. वही बिमला के पति से,
और क्या.
घर से शुरू हो कर महल्लेपड़ोस को पार करती इन की बातें दुनियाजहान नाप लेतीं. यही खुशी थी, यही चाहत, यही तमन्ना, यही दुनिया.
एक गृहस्थन को और क्या ही अपेक्षा होती है दुनिया से. पति के दफ्तर और बच्चों के स्कूलकालेज जाने के बाद क्या बचता है, भला. अपनी इस चारदीवारी की दुनिया में कोई बात करने को मिल जाए अपने जैसा, तो घर में रहते ही पूरी दुनिया की सैर हो जाती है.
बाहर कहां जाएं, क्यों जाएं, किस के लिए जाएं. रोजरोज बाहर जाने का कोई कारण भी तो होना चाहिए न. रोज शौपिंग पर निकलने वाली औरतों में से वह न थी. यह तो फुजूलखर्ची ही है.
दरअसल, कोई 10 साल पहले इन्होंने इस कालोनी में अपना घर बनाया था. तब यह कालोनी भी नईनई बस रही थी. स्वाति और उस के परिवार के यहां आने के कोई एक साल बाद ही सुनीता के पति ने भी यहीं अपने प्लौट में मकान बनाना शुरू कर दिया और सालभर में रहने भी आ गए. सुनीता का बेटा नमन भी यहीं पैदा हुआ था और तब स्वाति ने सुनीता के घरपरिवार की बड़ी जिम्मेदारी उठाई थी. आसपास ज्यादा बसावट नहीं थी. इन के अलावा कुछ ही और परिवार थे. बस, धीरेधीरे इन की दोस्ती पक्की होती चली गई.
स्वाति छत पर कपड़े सुखाने जाती और तभी सुनीता भी कपड़े सुखाने ऊपर आ जाती. बस, फिर तो दोनों घंटों बातें करतीं.
कई घंटे बातें कर के जो ऊर्जा महसूस होती उस का मुकाबला नहीं. 12 बजे के आसपास सुनीता के घर की घंटी बजती जब उस का बेटा स्कूल से आता. तब ये दोनों ही अपनेअपने घरों को वापस नीचे आ जातीं अगली सुबह फिर छत पर बतियाने का अरमान लिए.
इधर स्वाति का बेटा आरव दोपहर तक घर आ जाता और बेटी अवनि कालेज से शाम तक ही लौटती.
उस दिन सुबह से ही घुटने के दर्द ने स्वाति को परेशान कर रखा था. यों तो यह दर्द अकसर ही होता था लेकिन उस दिन पेनकिलर से भी ज्यादा आराम नहीं आ रहा था. स्वाति की तकलीफ देख पति ने औफिस से छुट्टी ले ली और उसे डाक्टर को दिखाने दोनों अस्पताल आ गए.
डाक्टर ने परचे पर दवाई लिख दी, एक्सरसाइज भी बता दी और एक बात जो सख्ती से मना की वह थी, ‘सीढि़यां नहीं चढ़नी आप को.’
डाक्टर ने स्वाति के पति को खास हिदायत दी कि इन्हें किसी भी तरह सीढि़यां न चढ़ने दी जाएं जबकि पैदल चलना जरूरी है आधा घंटा.
अब पति तो हिदायत पर अमल करवा कर रहेंगे. रहासहा बच्चों को भी बता देंगे कि किसी कीमत पर मम्मी को सीढि़यां नहीं चढ़ने देना. कपड़े सुखाना, अचार, पापड़ को धूप लगाना आदि सब काम अवनि या आरव करेंगे.
‘सीढि़यां नहीं चढ़ना’ सुन कर तो स्वाति का दिल धक से रह गया. यह क्या कह दिया, अब कैसे छत पर जाऊंगी.
स्वाति रोंआसी हो गई.
‘‘अरे यार, क्या रखा है छत पर,’’ पति ने कहा.
‘क्या रखा है?’ उस के दिल से आवाज आई, ‘सारे दिन की खुशियों की चाबी है छत पर ये क्या जानें,’ वह चिढ़ गई.
वैसे तो इस कालोनी में ये लोग पिछले 10 साल से रह रहे हैं लेकिन ज्यादा मिलनाबैठना तो बस सुनीता से ही है.
अब उसे रहरह कर घुटने के दर्द पर गुस्सा आ रहा था.
यों ही कई सप्ताह बीत गए. सुनीता भी अकसर मिलने आ जाती, हालचाल पूछ लेती और चली जाती. अब वह छत पर खड़े हो कर घंटों बातें करने का सिलसिला थम गया था. अकेले पड़ेपड़े उस का मन घबरा जाता. टीवी में तो मन पहले भी कम ही लगता था उस का. मोबाइल भी बस कुछ देर ही सुहाता उस को. दिल करता सुनीता से आमनेसामने बात करे. खुले आसमान का आलिंगन भरे, अपनी कहे, उस की सुने, हंसेमुसकराए. लेकिन अब तो खुद भी एकएक सीढ़ी जैसे घुटनों पर भारी पड़ने लगी थी. और फिर डाक्टर की बात, ‘अगर लापरवाही की तो घुटने घिस जाएंगे, फिर तो नी रिप्लेसमैंट ही करना होगा.’
नी रिप्लेसमैंट के ख्याल से ही उस को चक्कर आ गया. ‘इस से तो अच्छा है, ऐसे ही चुपचाप पड़ी रहूं, नी रिप्लेसमैंट के झांझाट से तो बच जाऊंगी.’ वह सोच रही थी.
लेकिन मनुष्य तो एक सामाजिक प्राणी है न. यों अकेले पड़ जाने से तो मानसिक रूप से बीमार हो सकता है. यही हुआ भी.
कई सप्ताह यों ही बीत गए. अब तो इस अकेलेपन से मायूसी होने लगी थी.
लेकिन उस दिन अखबार में दिखे विज्ञापन ने स्वाति के दिल में उम्मीद की एक किरण जगा दी.
यहां किसी एनजीओ ने एक फिजियोथेरैपिस्ट सैंटर की ओपनिंग की थी. अखबार के कोने में इसी सैंटर का विज्ञापन छपा था. देख कर स्वाति को खुशी हुई कि चलो, अब सैंटर पास में खुल गया है तो घुटनों की सही ऐक्सरसाइज हो जाया करेगी और फिर तो मैं सीढि़यां भी चढ़ पाऊंगी. यह सोच कर वह मुसकरा दी. जहां चाह वहां राह. उस ने सैंटर जाने का निश्चय कर लिया.
और अगले ही शनिवार को पति के साथ फिजियोथेरैपी सैंटर पहुंच गई. फिजियोथेरैपी सैंटर सोसाइटी के आखिरी छोर पर बनी एक बिल्डिंग में सैटअप किया गया था. किसी बड़े एनजीओ ने यहां बढि़या इंटीरियर तैयार किया था. रिसैप्शन हौल में गद्दीदार सोफे, एसी की ठंडक, चमचमाता फ्लोर वगैरह, कुल मिला कर आकर्षक एंबिएंस था.
हौल में अच्छीखासी वेटिंग थी. वह एक सोफे पर जा कर बैठ गई. आसपास अधिकतर महिलाएं ही थीं. इन में से कई वे थीं जो कभी मार्केट आतेजाते दिख जाती थीं और कईयों को वह पहली बार देख रही थी. शायद वे लोग दूर से आए थे. पति ने रिसैप्शन से परचा बनवाया और आ कर बैठ गए.
‘‘आप को देर नहीं हो रही?’’
‘‘थोड़ा लेट चला जाऊंगा.’’
‘‘नहीं, आप जाएं, यहां काफी समय लग जाएगा.’’ उस ने कहा तो पति भी समय रहते औफिस के लिए निकल गए.
20-25 मिनट बाद रिसैप्शनिस्ट ने उसे डाक्टर के पास अंदर भेज दिया.
डाक्टर ने चैकअप कर के असिस्टैंट को निर्देश दिए और फिर उस असिस्टैंट ने उसे बैड पर लिटा दिया. वह हाथों का हलका दबाव बना कर ऐक्सरसाइज करा रही थी. ‘‘मसल वीक हैं आप की. मसल स्ट्रैंथ करना होगा,’’ वह बता रही थी.
फिर एक ऐक्सरसाइज वाली मशीन को घुटनों पर लगा दिया. इलैक्ट्रिक वेव से मांसपेशियों को आराम मिल रहा था.
उस ने लेटेलेटे नजर दौड़ाई. आसपास के बैड पर कई महिलाएं मौजूद थीं. कंधा, कमर, स्पाइन सभी तरह के दर्द की मरीज थीं यहां और वैसी ही मशीनें भी. ‘ये सारे मसल पेन महिलाओं को ही होते हैं क्या.’ एक बार उस के मन में खयाल आया. ‘हां शायद, उम्र का महिलाओं की मसल्स पर सब से पहले असर होता होगा या फिर महिलाएं लापरवाह होती हैं अपनी सेहत को ले कर, इसलिए जल्दी शिकार बनती हैं बोन वीकनैस की या फिर जन्म से ही कमजोरियां ले कर आती हैं,’ पता नहीं क्याक्या सोचे जा रही थी वह कि उसे खुद ही हंसी आ गई.
इलैक्ट्रिक वेव थेरैपी का एक सैशन पूरा हो गया था. अब थोड़ी हलकी ऐक्सरसाइज की बारी थी. वो बाहर सोफे पर बैठ कर अब अपनी बारी का इंतजार करने लगी.
यहां पड़ोस की कई वे महिलाएं नजर आ रही थीं जिन से कभी आतेजाते बातचीत हो जाया करती थी. कुछ तो दूर की सोसाइटी से भी आई थीं. बातोंबातों में पता चला, सभी इस फिजियोथेरैपी सैंटर के खुलने से बहुत खुश थीं. कोई दोढाई घंटे की ऐक्सरसाइज के बाद अच्छा लग रहा था. उस दिन घर आ कर खूब गहरी नींद सोई थी वह.
ऐसे ही कोई एक सप्ताह गुजर गया. उस ने एक दिन की भी छुट्टी नहीं की थी. एक रूटीन बन गया था और कई सहेलियां भी बन गई थीं. अब तो रिसैप्शन पर अपनी बारी का इंतजार करना भी नहीं अखरता था. बातों में कितना समय निकल जाता, पता ही नहीं चलता. बल्कि रोज सैंटर जाने के लिए हर दिन के अलगअलग कपड़े वह बड़ी फिक्र से हैंगर में लगा कर रखती थी. अब हर दिन, एक नया दिन होने लगा था. रोज अच्छे से तैयार होना, अच्छा सा सूट या कभी जौगर पहन लेना, बाल संवारना. हलका मेकअप कर के वह जब तैयार होती तो एक अलग ही लैवल का कौन्फिडैंस फील करती. अब सुनीता को देखे हुए ही कई सप्ताह बीत जाते थे. कहां उस से मिले बिना दिन नहीं गुजरता था और कहां यह वक्त.
अब फिजियोथेरैपी शुरू हुए कोई डेढ़ महीना हो गया था. स्वाति के घुटनों के दर्द में आराम आने लगा था.
अब कभी सीढि़यां चढ़नी पड़तीं तो दर्द नहीं होता था लेकिन यह क्या, अब उसे कोई दूसरी चीज परेशान कर रही थी. वाकई इस दर्द से नजात पा कर खुश नहीं थी वह. ऐसा कैसे हो सकता है. अब तो आराम मिल गया, अब जहां चाहे जाए और सीढि़यां चढ़े, कोई नहीं रोकेगा, अपनी प्यारी सुनीता से छत पर जा कर जीभर बातें कर सकेगी. तो अब कहीं किसी कोने कुछ चुभ क्यों रहा था. और वह क्या था जो दर्द खत्म होने पर दर्द दे रहा था. नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं, उस ने खुद को झाठलाया. अब क्यों जाना है मुझे सैंटर. बस, कुछ ही दिन में रोजरोज सैंटर जाने से छुट्टी. न रोज तैयार होने का झांझाट, न घर को खाली छोड़ने की फिक्र और न ही रोज ढेरों सहेलियों से मुलाकात, न बातें, न दिल हलका करने का इत्मीनान, न सब के साथ बैठ कर खिलखिलाने वाली हंसी, न हर दिन के नए होने का एहसास…नहीं, कुछ नहीं.
उदासी के जज्बे अपने काले पंख फैलाने लगे. फिर वही घर और मैं, सिर्फ मैं. मैं और मेरी तनहाई.
अरे मगर सुनीता, हां, सुनीता तो है न. हूं, है तो.
अब तो कब से मिली ही नहीं उस से. बस, फोन पर ही थोड़ी बातचीत हो जाती थी. क्या कहेगी वह, भूल ही गई मैं उसे. मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं. सोच में डूबी हुई वह छत पर पहुंच गई. बादलों की आवाजाही से दोपहर भी गरम न थी. हलकी हवा से मौसम खुशनुमा हो गया था. उस ने मुंडेर से झांका और सुनीता को आवाज दी. कई बार में भी जब कोई जवाब न आया तो वह परेशान हो गई और फौरन ही घर को लौक कर के सुनीता के पास पहुंच गई.
सुनीता बैड पर लेटी थी. सहेली को देख कर सुनीता की खुशी का ठिकाना न रहा. वह उठ बैठी लेकिन दर्द की लकीरें उस के चेहरे पर नुमायां थीं.
‘‘दीदी, महीनाभर हो गया, कमरदर्द ने बहुत परेशान कर रखा है, दवाएं खा रही हूं.’’
स्वाति को दुख हो रहा था कि इतने समय से सहेली की खबर ही नहीं ली उस ने. अपने दर्द और उस के इलाज में पिछला सब भूल ही गई वह.
‘‘अरे, परेशान क्यों होती है, मेरी तरह तू भी फिजियोथेरैपी करा ले. देख, मेरे घुटनों में आराम आ गया.’’
‘‘क्या, सच आप को आराम हुआ है?’’ सुनीता आश्चर्यमिश्रित खुशी से देख रही थी.
‘‘हांहां, बहुत फर्क पड़ गया. अब तो सीढि़यां भी आराम से चढ़ जाती हूं मैं.’’
‘‘अच्छा, लेकिन दीदी, उस में तो रोज जाना होगा और मुझा से तो…’’ सुनीता उदास होने लगी.
‘‘अरे, क्या बात कर रही है, मैं हूं न. मैं तुझे रोज ले कर जाऊंगी सैंटर पर.’’
‘‘सही बताओ, दीदी. आप कैसे रोजरोज?’’
‘‘अरे, तू बेफिक्र रह. अब यह मेरी जिम्मेदारी,’’ यह कहते हुए स्वाति खुशी से फूली नहीं समा रही थी.
अब मैं रोज सैंटर जाऊंगी, सारी सहेलियों से मिलूंगी. इतना सोचनेभर से दिल में खुशी के लड्डू फूट रहे थे. ‘‘ठीक है, तो कल तैयार रहना, मैं आ जाऊंगी जल्दी.’’ दिल की खुशी से पैदा होने वाला जोश पैर जमीन पर नहीं टिकने देता. अब वह कल पहनने के लिए अलमारी से नया सूट निकाल रही थी. Family Story in Hindi





