कहानी

दिनोंदिन बढ़ते प्रकृति के अनुपम उपहार नन्हे की आंखों में इतने गहरे समा रहे थे कि खुद आभा का चेहरा धूमिल पड़ने लगा था. फिर भी न जाने क्यों आभा मन ही मन सोचती, बेटा है तो क्या हुआ, है तो मेरा नन्हा सा, प्यारा दुश्मन.