सरिता विशेष

सरिता में प्रकाशित लेख ‘सच से मुकरता जैन धर्म’ को ले कर जैन धर्म से जुड़े संगठनों व धर्मानुयायियों में मानो हलचल सी मच गई. जाहिराना तौर पर कई नसीहतें, चेतावनियां, आपत्तियां और धमकियां प्रतिक्रियास्वरूप हम तक पहुंचीं. प्रस्तुत है इन सभी टिप्पणियों पर आधारित भारत भूषण श्रीवास्तव का प्रतिक्रियात्मक लेख.

सरिता के अक्तूबर (प्रथम), 2012 अंक में प्रकाशित मेरे लेख ‘सच से मुकरता जैन धर्म’ पर ढेरों प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं और हो रही हैं. इन में से अधिकांश में चेतावनियां, नसीहतें और धमकियां जैसी बातें ज्यादा हैं, तार्किक और प्रामाणिक न के बराबर हैं और जो हैं उन पर मैं अपना स्पष्टीकरण लेखकीय उत्तरदायित्व निभाते हुए दे रहा हूं. बेहद विनम्रता से पहले स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि पूर्व में प्रकाशित लेख व इस प्रतिक्रियात्मक लेख का उद्देश्य समाज की सोच का विश्लेषण करना है न कि किसी को आहत करना.

संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट है कि हर नागरिक के विचारों की अभिव्यक्ति की रक्षा करना संविधान का ध्येय है. इसी तरह भाग 4 ए के अनुच्छेद 51(ए) में मौलिक उत्तरदायित्वों में वैज्ञानिक सोच विकसित करना, मानवता को प्रबलता देना और सुधार की भावना हर नागरिक का कर्तव्य है. सरिता के पहले लेख और इस प्रत्युत्तर का उद्देश्य यही संवैधानिक निर्देश है.

धर्मांध लोगों को सम?ा पाना हमेशा से ही दुष्कर कार्य रहा है. उस की वजह हमेशा की तरह बेहद साफ है कि लोगों को धर्म और धार्मिक पाखंडों के मामले में आंखों के साथसाथ दिमाग भी बंद रखने का निर्देश जन्म से ही दिया जाता है. धर्मों के पैरोकार नहीं चाहते कि सदियों से जिन बातों को बगैर सम?ो भक्त सच मानते आ रहे हैं उन बातों के दोष कोई ढूंढे़ व उन्हें बताए. और जो ऐसा करता है वह उन का शत्रु हो जाता है, उसे गालियां दी जाने लगती हैं, उसे प्रताडि़त व परेशान किया जाने लगता है. अधिकांशत: सुनियोजित तरीके से किए जाने वाले इन कृत्यों को संगठित रूप से किया जाता है और इस के पीछे छिपा वीभत्स सच है धर्म की शाश्वत दुकानदारी, जिस में हजारों सालों से आम लोग ठगे, छले जा रहे हैं.

‘सच से मुकरता…’ लेख भोपाल के एक धार्मिक आयोजन की घटना पर आधारित था जिसे किसी पाठक ने गलत या ?ाठ नहीं कहा है. वजह, यह विवाद हर कोई जानता है पर किसी पाठक या प्रतिक्रियादाता ने यह भी नहीं कहा या बताया कि आखिरकार क्यों हुकुमचंद जैन को बोलने से बलात रोका गया, उन्हें मंच पर अपमानित किया गया और उन के साथ ?ामा?ाटकी की गई?

इस सवाल का जवाब कोई देता (या दे) तो मेरे विचार में आपत्तिकर्ताओं की सारी तकलीफें दूर हो जाएं परंतु कुछ बातें ऐसी भी हैं जिन पर प्रतिक्रिया देने वालों को विस्तार से, तथ्यपरक ढंग से सम?ाने की आवश्यकता है.

शुरू में मैं ने कहा, मु?ो धमकियां दी गईं, ज्यादातर फोन पर दी गईं, भद्दी गालियां दी गईं, देख लेने और सबक सिखाने की धौंस दी गई. आवश्यकतानुसार ये फोन नंबर उपलब्ध हो सकते हैं और यह वैज्ञानिक तकनीक की वजह से संभव होगा किसी धर्म की वजह से नहीं. यहां मेरा संक्षिप्त अभिप्राय और संदेश इतना भर है कि आज चारों तरफ जो सुविधाएं दिख रही हैं वे उन लोगों की देन हैं जो वैज्ञानिक हैं, संन्यासी नहीं.

एक का उल्लेख मैं कर रहा हूं जिस के शब्द हैं, ‘आज आप के इस लेख को पढ़ कर यही समाज आप के विद्यापन को भी सीख दे सकता था, पर हमारा धर्म किसी को इजाजत नहीं देता कि वह किसी का मुंह बंद करे या उस से शत्रुता रखे, या फिर नफरत करे.’

4 दिसंबर, 2012 को ईमेल के जरिए मिली इस प्रतिक्रिया के आखिर में लिखा गया है, ‘भगवान आप को  सद्बुद्धि दे.’ (ईमेल :jain.udyog@hotmail.com)

सरिता के नवंबर (द्वितीय) अंक, 2012 में प्रकाशित कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाओं को यहां उद्धृत किया जाना प्रासंगिक होगा, जिस में अप्रत्यक्ष ही सही, माना गया है कि लेख में कुछ तो सच था पर इसे बोला ही क्यों गया?

एक : नोएडा, उत्तर प्रदेश की सरोज जैन ने लिखा है, ‘आजकल हर कोई एकदूसरे पर कटाक्ष करना जानता है, जैन धर्मगुरु कभी भी यह नहीं कहते कि खुद को कष्ट दे कर आप उन की सेवा करो. लेखक ने लेख में बेवजह जैन धर्म पर कीचड़ उछाला है. मैं कहती हूं, यदि लेखक खुद एक हफ्ता दिगंबर जैन साधु की तरह अपनी दिनचर्या व्यतीत करें तो उन्हें सत्य का पता चल जाएगा कि जैन धर्म, भावनाओं का धर्म है. अंगरेजों से देश को आजादी दिलाने के लिए गांधीजी ने जैन धर्म के अहिंसा व सत्य को अपनाया था.’

सच :  जैन धर्मगुरु स्वयं अपनी सेवा करने को कहते हैं, यह लेख में पाठिका ने कहां पढ़ लिया, कृपया बताएं? जहां तक दिगंबर साधु बनने की बात है, मैं स्वीकार करता हूं. वह भी हफ्तेभर नहीं बल्कि पूरे 1 साल के लिए. इस के लिए मु?ो मालूम है कि सभ्य तौरतरीकों को छोड़ना पड़ेगा, हाथ का पात्र बना कर भोजन करना होगा, शौच के बाद जल का प्रयोग मेरे लिए वर्जित होगा, मैं साबुन वगैरह इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा, आदिआदि अभ्यास और प्रशिक्षण से मेरे क्या किसी के लिए भी यह संभव है? गांधीजी ने कहां यह माना है कि उन्होंने आजादी के लिए जैन धर्म से प्रेरणा ली, कृपया बताएं? यह सरासर धर्म की मिथ्या महत्ता जताने की कोशिश नहीं तो और क्या है?

दो : जबलपुर से डा. जागृति राज लिखती हैं, ‘चंद जैन मुनियों के कारण संपूर्ण जैन मुनियों को बदनाम करना गलत है.’

सच : पिछले 100 सालों में जैन मुनियों के व्यभिचार के सैकड़ों मामले उजागर हुए हैं और हर बार धर्मांध यही तर्क देते हैं. क्या गलत तभी होगा जब 100 प्रतिशत जैन मुनि व्यभिचारी हो जाएंगे? लेख की मूल भावना पर ध्यान दें कि मुनियों की बढ़ती संख्या के कारण ऐसे मामले बढ़ रहे हैं. लेख में कहीं भी किसी जैन मुनि या धर्म के बारे में अनर्गल और मूर्खतापूर्ण बात नहीं कही गई है. हां, सच कहना अगर मूर्खता और अनर्गल है तो वह कहा गया है.

तीन : उज्जैन की मीरा जैन ने माना है कि यह सत्य है कि जैन धर्म में कुछ विकृतियां प्रवेश कर गई हैं किंतु इस के लिए संपूर्ण जैन धर्म की सत्यता पर प्रश्नचिह्न लगाना अशोभनीय है.

सच : उन्हीं विकृतियों की चर्चा की गई है, परंतु आप को जाने क्यों संपूर्ण जैन धर्म की सत्यता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है. यह बात तो आप के जेहन में आई है या पहले से ही है, मैं ने कहीं ऐसा नहीं लिखा. आप भी विकृतियों से मुंह मोड़ने की बात कह रही हैं.

इन तीनों पाठिकाओं को मु?ो खेद के साथ बताना पड़ रहा है कि जैन धर्म स्त्री को मोक्ष की अधिकारी नहीं मानता, इस पर क्यों वे कुछ नहीं बोलतीं. हर धर्म औरतों को दबाता है, दोयम दरजे की मानता है. हैरत है इस के बाद भी औरतें उस की वकालत करती हैं और कानून, समाज व परिवार में बराबरी का दरजा न मिले तो क्यों हायहाय करती नजर आती हैं.

औरंगाबाद के पाठक समीर ढोले की लंबी प्रतिक्रिया का संक्षिप्त लेकिन संपूर्ण उत्तर संपादक ने दिया है. इसे सभी प्रतिक्रियादाता एक दफा फिर गौर से पढ़ें और सोचें कि उन्होंने प्रतिक्रियाएं वाकई सिर्फ इसलिए दी हैं कि सच पर चुप रहो, जो गलत चल रहा है उसे उजागर मत करो.

बहरहाल, समीर ढोले चैंबूर की घटना पर खेद व्यक्त करते हुए मानते हैं कि इस केस में शक की गुंजाइश है और कोर्ट में इस विषय पर सच सामने आ ही जाएगा. ठीक इसी तरह प्रदीप मुनि की घटना के बारे में कुछ कहा जाएगा.

चैंबूर की पीडि़ता के परिवार के एक सदस्य ने फोन नंबर 9819850××× पर लेखक को बताया था कि उन के पास वह सीडी है जिस में आरोपी जैन मुनि अपने दुष्कृत्य के बाबत माफी मांग रहा है. यह आप का व दूसरे पाठकों का विश्वास नहीं बल्कि अपने उन व्यभिचारी धर्मगुरुओं के बचाव की बचकाना कोशिश है जिन्होंने वास्तव में धर्म को बदनाम कर उस की वास्तविकता बताई है. हैरानी की दूसरी बात उन्हें क्लीन चिट दे देना है जिस से दूसरों को शह मिलती है. क्यों इन्हें धर्म के बाहर निकालने की बात की गई?

उपकार नहीं है संन्यास

इस सहित दूसरे सैकड़ों पाठकों का कहना है कि संन्यासी जीवन दुर्लभ है, कठिन है, मानव समाज पर उपकार है, त्याग है और न जाने क्याक्या है. कुछ पाठकों के अनुसार लेख में यह गलत कहा गया है कि संन्यासी मुफ्त के मालपुए उड़ाते हैं, निकम्मे हैं, ऐश करते हैं या फिर मुफ्तखोर होते हैं.

एक पाठक युगराज जैन लिखते हैं, ‘याद रखना कि जैन समाज ने हमेशा देना सीखा है, आज पूरे देश में सर्वाधिक इनकम टैक्स जैन समाज देता है, पूरे देश में सर्वाधिक गोशालाएं संचालित करता है और यही जैन समाज स्कूल व अस्पताल बनाने में भी अग्रणी है.’ जैन मुनियों की वकालत करते युगराज का कहना है, ‘आप ने धर्मगुरुओं की बढ़ती तादाद पर लिखा कि ये मुफ्त की कमाई का धंधा है, अगर कमाई का धंधा ही करना होता तो वे अपनी कमाई का धंधा छोड़ कर संन्यास नहीं लेते.’

बात सम?ा से परे और अव्यावहारिक भी है कि संन्यास उपकार कैसे और क्यों है. संक्षिप्त में संन्यास एक धार्मिक कृत्य है जिस में व्यक्ति विशिष्ट वेशभूषा धारण कर लेता है, भक्ति करने लगता है, प्रवचन देने लगता है. इसलिए वह पूजा जाने लगता है और धर्मावलंबियों की श्रद्धा का पात्र हो जाता है.

संन्यास मेहनत की कमाई की रोटी नहीं खाता, दूसरे उस का पेट भरते हैं. पूजाअर्चना करना एहसान क्यों माना जाए, यह कोई राष्ट्रीय कर्तव्य नहीं है? व्यक्तिगत बात है और पलायन है. पलायन शब्द पर जो धार्मिक लोग आपत्ति उठाते रहते हैं वे बताएं कि इसे त्याग का चोला ओढ़ा कर वे क्या साबित करना चाहते हैं? समाज से अलग हो कर विशिष्ट दिख कर संन्यासी बन जाना क्या अपने उत्तरदायित्वों से भागना नहीं है. जिन लोगों का स्वाभिमान खत्म हो जाता है उन की संघर्षक्षमता भी उसी अनुपात में गिरने लगती है. लिहाजा, खुद को बचाएबनाए रखने के लिए वे संन्यास ले लेते हैं. दूसरे कई कारण भी संन्यास के हो सकते हैं जिन में विरक्ति प्रमुख है. संन्यासी सुरक्षा की दृष्टि से समाज में रहते हैं, मूल उद्देश्य अगर ईश्वर को पाना है तो जंगलों में जा कर साधना करें. यह तर्क कि वे तो प्राणी मात्र के कल्याण के लिए समाज में रहते हैं, एक अपरिपक्व बात है. वे तो खुद के कल्याण और उदरपोषण के लिए लोगों के बीच रहते हैं.

क्या यह बात बगैर पसीना बहाए मालपुए खाने की श्रेणी में नहीं आती? प्रतिक्रियादाताओं से मेरा दोटूक कहना यह है कि वे समाज की बागडोर किन हाथों में दे रहे हैं, उन्हें जो खुद हैरानपरेशान हैं, दुनिया से, घरपरिवार से, जिम्मेदारियों से, मेहनत से भाग चुके हैं. संविधान सभी को स्वतंत्र विचार रखने का अधिकार देता है पर थोपने का नहीं. यह काम तो धर्म करता है. धर्म एक नहीं है, अनेक हैं और उन में विकट के मतभेद हैं, ?ागड़े हैं, हिंसा है यानी जितने धर्म उतनी तरह के भगवान और हास्यास्पद बात यह कि हर धर्म के अंदर उपधर्म, जातियां, विचारधाराएं व संप्रदाय वगैरह हैं. और यह सब कियाधरा उन्हीं संन्यासियों का है जो धर्म की व्याख्या और प्रचार मनमाने ढंग से करने को स्वतंत्र हैं. जैन धर्म इस का अपवाद नहीं, जिस के

अंदरूनी ?ागड़ेफसाद बेहद घटिया तरीके से देखने में आते रहते हैं. मूल लेख में भोपाल के विवाद का उल्लेख उदाहरणस्वरूप किया गया है.

धर्मांध लोग चाहते हैं कि संन्यास व संन्यासियों पर आंख बंद कर व दिमाग खाली कर श्रद्धा रखी जाए ताकि धर्म की महत्ता बनी रहे. संन्यासी चाहते हैं, उन पर बहस न हो जिस से निर्विघ्न पल रहे उन के पेट और कट रहे वक्त में कोई बाधा न आए. शरीर को कष्ट देना विद्वत्ता की बात क्यों मानी जानी चाहिए, सिर्फ इसलिए कि सभी लोग ऐसा करने की सामर्थ्य नहीं जुटा पाते और हीनभावना का शिकार हो कर संन्यासी को पालतेपोसते रहते हैं.

एक पाठक ने धिक्कारते हुए चुनौती दी है, ‘आप कुछ दिन संन्यासी जीवन व्यतीत करिए तो आप को पता चलेगा कि इस राह में कांटे ज्यादा हैं फूल कम, इस में कितने मुश्किल बंधनों में रहना पड़ता है, कितना सहना पड़ता है.’

पाठक महोदय, जिस जीवन को आप ने जिया नहीं उस का अनुभव आप को कैसे हो गया? गलती आप की नहीं है क्योंकि बचपन से ही आप को ये बातें रटा दी गई हैं. आप का सिर उठने से पहले ही संन्यासियों के चरणों में ?ाका रहा है, इसलिए आप को लगने लगता है कि संन्यासी की राह आसान नहीं. एक तरह से बात सही है क्योंकि मुफ्त की या दान की रोटी मु?ा से खाई न जाएगी.

दरअसल, धर्म और संन्यासियों के निर्देशों पर जीवनयापन करने से बड़ी गुलामी कोई और हो ही नहीं सकती. खानापीना, उठनाबैठना और सहवास तक धर्म तय करता है तो फिर आप की बुद्धि, स्वतंत्रता और अस्तित्व कहां हैं. आप खुद तो दया के पात्र हैं और सीख मु?ा को दे रहे हैं.

अधिकांश पाठकों ने लिखा है कि मैं ने बगैर जैन धर्म का अध्ययन किए ‘सच से मुकरता…’ लेख लिख दिया है. उन के अनुसार, अगर मैं ने जैन धर्म को पढ़ासम?ा होता तो मैं ऐसा लेख लिख ही नहीं सकता था क्योंकि मेरी बुद्धि ऐसा करने की अनुमति नहीं देती. इन पाठकों की सलाह यह है कि मु?ो जैन धर्म, दर्शन को पढ़नासम?ाना चाहिए कि वह कितना विशाल, विराट, उदार, अहिंसक और महान है.

लेख जैन मुनियों की बढ़ती तादाद पर हुए भोपाल के एक विवाद को ले कर था, धर्म की अंदरूनी बातों की तो उस में कोई चर्चा ही नहीं थी. संन्यास व संन्यासियों पर मैं ने आपत्ति उठाई है और ऊपर पाठकों की प्रतिक्रियाओं पर अपनी बात को विस्तार भी दिया है. बात जहां तक धर्म की है तो वह शुद्ध व्यापार ही है और वाकई अति प्राचीन है. हर वह काम जिस में लेनदेन होता है, अर्थशास्त्र के हिसाब से व्यापार के दायरे में आता है. लोग पैसा क्यों चढ़ाते हैं, इंद्र, इंद्राणी बनने के लिए लाखोंकरोड़ों की बोलियां क्यों लगती हैं? पैसे का, वैभव का प्रदर्शन क्यों खुलेआम किया जाता है?

इस बारे में मेरा मत बेहद स्पष्ट है कि हर धर्म में लोगों को मोक्षमुक्ति के नाम पर इतना डरा दिया जाता है कि जन्ममरण के चक्र से मुक्ति पाने के लिए वे पैसा इच्छा से दें या अनिच्छा से, देते जरूर हैं. जैन धर्म इस का अपवाद नहीं है, उलटे मिसाल है.

कई नेक बातें जैन धर्म कहता है जिन पर शायद ही कोई सम?ादार आदमी एतराज जताए. एतराज की बातें हैं धर्म के नाम पर दिखावा, फुजूलखर्ची, श्रेष्ठ होने (दूसरे धर्म के लोगों से) की भावना जो कतई व्यक्ति, समाज या राष्ट्रहित की बातें नहीं. पर यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि न तो बगैर ?ाठ बोले कोई रह सकता है, न ही अहिंसा का पालन कर सकता है और न ही परिग्रह से बच सकता है. धार्मिक श्रद्धा या भावनाओं का हवाला दे कर इस सच से भागना कतई बुद्धिमानी या सम?ादारी की बात नहीं कही जा सकती.

लोगों में लोकपरलोक, पापपुण्य और अच्छेबुरे का डर पैदा कर उन से पैसा कमाना, ऐंठना और समाज निर्माण करना अगर ज्ञान की बातें हैं तो आज इन की जरूरत ही नहीं है और न पहले कभी थी. मानव विकास का इतिहास देखें तो सार यह निकलता है कि जैसेजैसे आदमी बुद्धिमान होता गया, तरक्की करता गया. उस के समानांतर एक समूह ऐसे लोगों का भी विकसित हुआ जिसे वाकई एक वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो गया था कि जब धर्मग्रंथ रच कर अज्ञात और प्राकृतिक रहस्यों का हौवा दिखा कर मजे और मौज से दूसरों की कमाई पर पेट पाला जा सकता है, ऐश किया जा सकता है, मालपुए खाए जा सकते हैं तो मेहनत क्यों की जाए?

अहंकार की पराकाष्ठा

अधिकांश प्रतिक्रियादाताओं ने एक बात बड़े गर्व से कही है कि पूरे देश में सब से ज्यादा इनकम टैक्स देने वाला समाज जैन समाज है जो गोशालाएं भी चलाता है और परमार्थ के सारे काम करता है. ऐसा लगता है सर्वाधिक इनकम टैक्स की बात इफरात से प्रचारित की गई है जिस में कोई आंकड़ा या तथ्य नहीं दिया गया है. प्रबुद्ध पाठक बेहतर जानते हैं कि अभी सरकार ने धर्म, जाति, संप्रदाय या गोत्र के आधार पर आयकर के आंकड़े जारी करना शुरू नहीं किया है. कथित रूप से ही सही, चूंकि देश संवैधानिक तौर पर जैन समाज के दिए इनकम टैक्स से चल रहा है इसलिए धार्मिक और दूसरे मामलों में उस का लिहाज व सम्मान होना चाहिए वरना अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाएगी.

दरअसल, इस बात को कहने का एक अभिप्राय यह भी है कि हम दूसरे धर्मों व जातियों से ज्यादा धनाढ्य हैं जो श्रेष्ठता का एक पैमाना है. काश, किसी पाठक ने एक सच यह बोलने की हिम्मत जुटाई होती कि हमारे धार्मिक आयोजनों में सब से ज्यादा खर्च होता है, हम धर्म के नाम पर बोलियां लगाते हैं और जितने पैसे दानदक्षिणा व चढ़ावे में खर्च करते हैं उतना कोई दूसरा नहीं करता या कर सकता. हमें गरीबी से कोई मतलब नहीं क्योंकि वह कर्मों की देन है. इस देश में रोजाना 30 करोड़ लोग एक वक्त का खाना खा कर बसर करते हैं. हमें उन से कोई सरोकार नहीं क्योंकि धर्म कहता है कि वे अपने पापों की सजा अभाव की शक्ल में भुगत रहे हैं. यही उन की नियति है. धन्य है ऐसा धर्म और धार्मिक लोग.

इस के बाद भी यह कहना कि धर्म का पैसे से कोई लेनादेना नहीं और धर्म व्यापार नहीं, यह एक ऐसी जिद है जिस का तोड़ किसी के पास नहीं. सूर्य पूर्व से नहीं उगता की बात पर अगर कोई अड़ जाए तो उसे सम?ानाबु?ाना व्यर्थ है.

मद में डूबा वह व्यक्ति यही कहावत कहेगा कि नहीं, सूर्य पूर्व दिशा से नहीं उगता बल्कि सूर्य जहां से उगता है वही पूर्व दिशा हो जाती है, सूर्य दिशाओं के अधीन नहीं होता. बहरहाल, यह सम?ा से परे है कि इनकम टैक्स का धर्म से क्या संबंध है और किसी तरह का होना भी चाहिए या नहीं. ‘सच से मुकरता…’ में मैं ने जैन समुदाय की व्यापारिक बुद्धि की जो प्रशंसा की थी अब उस पर यह शब्द पढ़ कर पछता रहा हूं. इस बाबत जरूर मु?ो खेद है.

और भी हैं मसले

एक प्रतिक्रियादाता ने लेख में उल्लिखित 2 जैन मुनियों के उजागर व्यभिचार पर लगभग शर्मिंदगी जताते हुए युवा संन्यासियों का जिक्र करते हुए लिखा है कि संन्यासियों पर श्रावक नजर रखते हैं.

6 शब्दों की इस स्वीकारोक्ति पर कुछ कहना बाकी नहीं रह जाता. संन्यासियों पर निगाह रखने का मतलब है उन पर, उन के आचरण और चरित्र पर भी अविश्वास किया जाता है. फिर क्यों संन्यास और संन्यासियों की महिमा गागा कर बताई जाती है. इसे सम?ाने, सम?ाने के लिए ज्ञान कहां से लाया जाए, यह बताने वाला इस सृष्टि में शायद कोई होगा ही नहीं. ऐसे में यह आरोप लगाना कि मैं ने जानबू?ा कर जैन मुनियों का अपमान किया है, मेरे साथ ज्यादती है. मेरे विचार किसी मुनि या संन्यासी से नहीं बल्कि 2 व्यभिचारियों से ताल्लुक रखते थे, उन की करतूत उजागर करते थे. इन के अलावा तो किसी और का जिक्र तक नहीं किया गया. संन्यासियों का व्यभिचार कतई नई बात नहीं है, यह तो संन्यास के उद्भव से ही प्रारंभ हो जाता है.

सरिता विशेष

हां, एक जैन मुनि तरुण सागरजी के राजनीतिक मोह को मैं ने उजागर किया है, जिस पर तमाम प्रतिक्रियादाता निरुत्तर या मौन रहे हैं. अगर यह सहमति है तो फिर राजनीति में रुचि रखने वाले मुनियों को कुछ हिंदू संतों की तरह खुल कर राजनीति में आने से हिचकिचाना नहीं चाहिए. आम जनता तो बेवकूफ है, इसलिए साधुसंत ही तय करें कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा क्योंकि सदियों से वे ही राजा का फैसला करते आ रहे हैं. बुरा हो लोकतंत्र का जिस ने यह अधिकार जनता को दे दिया, जिस का काम हमेशा से पालकी ढोना रहा है.

दूसरी बात हिंदू धर्मावलंबियों की तरह गाय को पूजने की है. यह बात विचित्र इसलिए है कि जैन धर्म कृष्ण को भगवान नहीं मानता बल्कि वर्तमान में नर्क में होना बताता है. किसी को भी कृष्ण या नर्क का अतापता नहीं मालूम. पर यह सब को मालूम है कि चूंकि धर्मग्रंथों में लिखा है इसलिए गोपालक कृष्ण को नर्क में मानते हैं. जब गाय कृष्ण को तार नहीं सकी यानी नर्क गमन से नहीं बचा पाई तो बेवजह उस की धार्मिक महत्ता का बखान क्यों?

हिंदू व जैन धर्म का परस्पर बैर जगजाहिर है. इन में आएदिन रीतिरिवाजों और धर्मस्थलों को ले कर विवाद होते रहते हैं. जैनियों की यह मांग पुरानी है कि जैन धर्म को स्वतंत्र व अल्पसंख्यक धर्म घोषित किया जाए. जैनियों की परेशानी यह है कि वे पहचाने हिंदू धर्म के नाम से ही जाते हैं. हैरत की बात यह है कि तमाम हिंदूवादी संगठनों में जैनियों का दखल है, हिंदुत्व के मुद्दे पर वे हिंदुओं के साथ हैं फिर भी अल्पसंख्यक होने की मांग सम?ा से परे है.

इन बातों को कहने का मतलब यह भर है कि प्रतिक्रियादाताओं ने अपने धर्मगुरुओं में अगाध आस्था जताते हुए कहा है कि उन के बताए रास्ते पर ही वे चलते हैं. अल्पसंख्यक बनने का रास्ता अगर धर्मगुरुओं ने दिखाया हो तो हैरानी नहीं होनी चाहिए. वजह, इस से कई शैक्षणिक व धार्मिक लाभ भी हैं.

हाल ही में गुजरात में एक जैन मुनि प्रबल सागरजी पर हुए हमले का जैन समुदाय ने देशव्यापी विरोध किया. सभी ने मांग यह की कि हमलावरों को पकड़ा जाए पर हमले की वजह क्या थी, यह बात किसी ने नहीं उठाई. प्रबल सागरजी का इस मसले पर बोलना काफी माने रखता. वे क्यों नहीं बोले या बोलते, यह वाकई सम?ा से परे है और कई संदेहों को भी जन्म देता है.

जैन मुनियों पर हमलों से किसी की धार्मिक भावना आहत नहीं होती. वजह साफ है कि यह उन का अंदरूनी मामला है. मुनियों की बढ़ती तादाद पर लेखक ने चिंता जताई और जो वजहें गिनाईं वे निराधार नहीं थीं, यह इन हमलों से भी साबित होता है. फिर तिलमिलाहट क्यों, सिर्फ इसलिए कि जैन धर्म पर लिख दिया, तो यह कोई वजह नहीं हुई. लेख का मकसद लोगों के भले का था, उन्हें सचेत करना था. जो धर्म वक्त के साथ चलने की सहमति न रखता हो उस में बदलाव जरूरी है जिस से जड़ता न बढ़े.

सारी प्रतिक्रियाओं में से एक भी ऐसी नहीं है जिस में तथ्य तो दूर की बात है तर्क भी ढंग के हों. उन का जवाब जो होना चाहिए था, वह प्रस्तुत है.

लेखक का उद्देश्य अगर दुर्भावनापूर्ण होता तो वह जैन धर्म के सिद्धांतों की, रूढि़वादिता की, रीतिरिवाजों की आलोचना करता लेकिन संयोग से एक सपाट और स्पष्ट लेख पर धौंसधपट भरी प्रतिक्रियाएं मिलीं तो चिंता होना स्वाभाविक है कि

लोग धर्म के नाम पर इतने अंधे क्यों हो रहे हैं कि न तो सच सुनना चाहते हैं न कहने देना चाहते हैं.

 

यह कैसा संन्यास

चंबल इलाके के भिंड जिले के कसबा मौ में 21 मार्च को एक जैन साध्वी सोनल जैन को कुछ बदमाश उन के घर में घुस कर अगवा कर ले गए और उन्हें निर्वस्त्र कर बुरी तरह मारापीटा. यह समाचार 23 मार्च के अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ था, जिस के मुताबिक 25 वर्षीय सोनल 18 मार्च को अपने पिता के घर आई थीं. घटना बहुत ही शर्मनाक और निंदनीय है. सोनल को चिकित्सा के लिए ग्वालियर के जयारोग्य अस्पताल में भरती कराया गया. पुलिस ने शुरू में सुस्ती दिखाते हुए आरोपियों के खिलाफ साधारण मारपीट का मामला दर्ज किया था पर बाद में जैन समुदाय के लोगों द्वारा आक्रोश जताने पर दुष्कर्म की कोशिश, अपराध व छेड़छाड़ की धाराएं भी इस में जोड़ दीं.

साध्वी से आरोपियों का बैर क्या और क्यों था, ये बातें यहां चर्चा का विषय नहीं पर सरिता के अंकों में प्रकाशित ‘सच से मुकरता…’ पर आपत्ति जताने वालों और संन्यास की महिमा गाने वालों को जरूर इन बातों पर गौर कर कोई जवाब, अगर सू?ाता हो तो, देना चाहिए :

एक : साध्वी सोनल अपने मातापिता के घर आई थी, यह वाक्य ही विकट का विरोधाभासी है. कहा यह जाता है कि संन्यासियों का कोई घर नहीं होता, न ही किसी से कोई रिश्तानाता होता है. फिर सोनल का क्यों था? क्या संन्यास छात्रावासीय जीवन सरीखा हो चला है जिस के तहत संन्यासी (साध्वी) होली, दीवाली अपने मांबाप और परिजनों से मिलनेजुलने व कुछ दिन साथ बिताने घर चले आते हैं. सांसारिकता और रिश्तेनातेदारों से उन का किसी भी तरह का लगाव अगर रहता है तो उन्हें संन्यासी क्यों कहा जाए और कैसे कहा जाए? क्या संन्यास इस मामले से पार्टटाइम जौब प्रतीत नहीं होता?

दो : 24 मार्च को होश में आने के बाद सोनल ने इलाज कर रहे डाक्टरों को इस बाबत फटकार लगाई कि उन्हें अंगरेजी दवा क्यों दी जा रही है. सोनल के साथ आरोपियों ने कोई दुष्कर्म यानी बलात्कार नहीं किया था पर मारा इतनी बेरहमी से था कि उन के शरीर में 3 जगह फै्रक्चर हुए थे. जाहिर है उन की मंशा साध्वी को बेइज्जत करने और किसी पुरानी रंजिश का बदला लेने की थी.

यानी सोनल को वक्त पर अस्पताल न ले जाया जाता तो उन की मौत भी हो सकती थी फिर जिंदगी देने वाले डाक्टरों को फटकार क्यों लगाई, उन्हें तो डाक्टरों को धन्यवाद देना चाहिए था. गौरतलब है कि जैन संन्यासी किसी तरह की चिकित्सा या दवा नहीं लेते क्योंकि इस से उन का संन्यास भंग हो जाता है.

प्रश्न उठता है कि क्या इस बात को ध्यान में रखते हुए डाक्टरों को अपना कर्तव्य भूल कर सोनल को उन के हाल पर छोड़ देना चाहिए था? भविष्य में अगर ऐसे हादसों का दोहराव होगा तो डाक्टरों को उन की ड्यूटी निभाने यानी मरणासन्न संन्यासी की जिंदगी बचाने के लिए इलाज से पहले वाकई सोचना पड़ेगा.

तीन : डाक्टरों को फटकार लगाने के बाद भी सोनल इलाज लेती रहीं और उन्हें ड्रिप भी बराबर लगाई जाती रही यानी वे इलाज करवाती रहीं. इस का मतलब साफ था कि उन्हें संन्यास से ज्यादा जीवन से प्यार था जो निहायत ही स्वाभाविक बात है फिर स्वांग और पाखंड क्यों? इलाज कर रहे डाक्टरों खासतौर से मैडिकल कालेज के डीन डा. जी एस पटेल और अस्पताल अधीक्षक डा. एस एन अयंगर की हालत तो इधर कुआं और उधर खाई वाली हो गई थी. सोनल अपने शरीर पर बंधा प्लास्टर हटाने की भी मांग कर रही थीं और मध्य प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा उन के स्वास्थ्य की जानकारी लगातार डाक्टरों से ले रहे थे. इलाज ढंग से न होता तो मंत्रीजी चढ़ाई कर देते और इलाज करते रहे तो साध्वी सोनल एतराज जताती रहीं. इस में डाक्टरों का क्या अपराध था?

चार : सोनल का कहना था कि उन का व्रत यानी इज्जत और जीवन दोनों णमोकार मंत्र जपते रहने से बचे. क्या वे यह बता पाएंगी कि जब णमोकार मंत्र इतना ही शक्तिशाली है तो आरोपियों की हिम्मत उन्हें अगवा करने और उन पर हमला करने की कैसे पड़ी? क्यों मंत्र से ही हमलावरों की बुद्धि नहीं पलट दी गई और उन्हें भस्म कर दिया गया?

पांच : क्या सोनल बयान देने के लिए अदालत जाएंगी, तकनीकी तौर पर यह सवाल बेहद पेचीदा है. अस्पताल तो उन्हें परिजन ले गए थे पर ठीक हो जाने के बाद वे अदालत जाने के लिए उन पर जबरदस्ती नहीं कर सकते क्योंकि संन्यासी अदालत भी नहीं जाते. अब सोनल के रुख से पता चलेगा कि इस मामले में संन्यास के सिद्धांत क्या हैं. लेकिन यह तय है कि अगर वे नहीं गईं तो इस का कानूनी फायदा आरोपियों को मिलेगा. जाहिर यह भी है कि एक साधारण फरियादी की तरह उन्हें आरोपियों की शिनाख्त करनी होगी.