सरिता विशेष

साल 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में रूस को हस्तक्षेप करने की इजाजत देने को लेकर अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पूछताछ किए जाने के बाद अमेरिका के बड़े सोशल मीडिया प्रोवाइडर अब अपने प्लेटफॉर्म में बदलाव करने जा रहे हैं. जहां ट्विटर रूस की सरकारी न्यूज एजेंसियों को प्रतिबंधित करेगा, तो फेसबुक तथ्यों की बेहतर जांच की योजना बना रहा है, और साथ ही वह राजनीतिक विज्ञापनों के स्रोत को भी उजागर करेगा.

संक्षेप में, सोशल मीडिया से जुड़ी दिग्गज कंपनियां अब अपनी बड़ी जिम्मेदारी स्वीकार कर रही हैं, ताकि लोगों को सच और झूठ में फर्क करने में मदद कर सकें और शिष्टाचार कायम रख पाएं. पूर्व में ‘फेक न्यूज’ और आक्रामक प्रचार के प्रति इन प्रोवाइडर्स ने जो उदासीनता बरती, उससे लोकतंत्र कमजोर हुआ, जो एक खुले समाज की आजादी की हिफाजत करता है, और इसमें इंटरनेट भी शामिल है.

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गूगल ने यह कहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान उसने अपनी यू-ट्यूब साइट पर रूस से जुड़े 1,108 वीडियो चलाने की इजाजत दी थी. फेसबुक ने भी माना है कि यह संभव है कि करीब 12 करोड़, 60 लाख लोगों ने उसकी साइट पर रूस की गलत सूचनाएं देखी-पढ़ी हों. इन नंबरों का आकार बताता है कि किस कदर सोशल मीडिया सूचनाओं को प्रसारित कर सकता है, चाहे वे सही हों या गलत. सिर्फ इन निजी कंपनियों को ही ऐसे लोगों के खिलाफ कदम नहीं उठाने चाहिए, जिनका असली मकसद अमेरिकियों को आपस में लड़ाना और भय का माहौल खड़ा करना है.

रूस के इंटरनेट ट्रोल्स ने आखिर यही तो करने की कोशिश की. पिउ रिसर्च सेंटर ने अपने ताजा सर्वेक्षण में पाया है कि 1994 के बाद आज अमेरिकी अपने विरोधी को लेकर सबसे ज्यादा बंटे हुए हैं. रिपब्लिकनों और डेमोक्रेट्स के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है, क्योंकि दोनों पक्षों का एक-दूसरे को लेकर काफी नकारात्मक नजरिया है. इस खाई पर पुल बनाने के लिए अमेरिका के नागरिकों को भी वही करना होगा, जो अब ट्विटर, गूगल व फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्रोवाइडर करने जा रहे हैं. विवेकशील विचारकों के बिना लोकतंत्र टिक ही नहीं सकता.

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