सरिता विशेष

पनामा पेपर्स लीक को ले कर एक और देश के मुखिया को सत्ता से बेदखल होना पड़ा है. पनामा पेपर्स में सामने आए विश्वभर के भ्रष्ट नेताओं में शुमार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को वहां के सुप्रीम कोर्ट ने पद से हटा दिया है. कोर्ट ने शरीफ को पद से हटने का आदेश तो दिया ही, भविष्य के लिए उन्हें अयोग्य भी करार दिया है. कोर्ट के फैसले से शरीफ के परिवार का सियासी भविष्य अधर में लटक गया है.

पनामा पेपर लीक मामले पर कोर्ट का फैसला पाकिस्तान की राजनीति की एक ऐतिहासिक घटना है. देश के प्रमुख पद पर बैठे नवाज शरीफ ऐसे शख्स हैं जिन्हें खोजी पत्रकारिता का शिकार होना पड़ा है.

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अदालत द्वारा अयोग्य ठहराने का यह पहला मामला नहीं है. इस से पहले पाकिस्तान में अगस्त 1990 में बेनजीर भुट्टो को 18वें संशोधन के तहत हटा दिया गया. जून 2012 में यूसुफ रजा गिलानी को भी सुप्रीम कोर्ट अयोग्य ठहरा चुका है.

इस से पहले आइसलैंड के प्रधानमंत्री सिग्मुंदुर डेविड को पद छोड़ना पड़ा था. पनामा पेपर्स लीक को ले कर विदेशों में कालाधन जमा करने की जांच कर रहे संयुक्त जांच दल यानी जेआईटी की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने नवाज शरीफ सरकार के वित्त मंत्री इशाक डार और नैशनल असैंबली के सदस्य कैप्टन मुहम्मद सफदर को भी उन के पदों से अयोग्य ठहराया है.

कोर्ट के 5 जजों की बैंच ने साफ निर्देश दिए कि नवाज शरीफ, उन की बेटी मरियम, बेटे हुसैन और हसन के खिलाफ 6 हफ्तों में मुकदमा दर्ज किया जाए. साथ ही, पाकिस्तान की शीर्ष भ्रष्टाचार निरोधी संस्था राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो को 6 माह में जांच पूरी करने को कहा गया है.

नवाज शरीफ को संविधान के अनुच्छेद 62 और 63 के तहत अयोग्य ठहराया गया है. इन अनुच्छेदों के अनुसार, संसद सदस्य को ईमानदार और इंसाफपसंद होना चाहिए. न्यायमूर्ति एजाज अफजल खान ने कहा कि नवाज शरीफ अब पाकिस्तानी संसद के प्रति ईमानदार और समर्पित सदस्य होने के योग्य नहीं हैं. उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना होगा. इस के बाद पाकिस्तान चुनाव आयोग ने तुरंत नवाज की योग्यता को खारिज करने का आदेश दे दिया.

बेनामी संपत्ति ले डूबी

नवाज पर प्रधानमंत्री पद पर रहने के दौरान लंदन में बेमानी संपत्ति बनाने के आरोप हैं. लंदन में शरीफ परिवार द्वारा खरीदे गए फ्लैट के लिए पैसे कहां से आए, इस पर नवाज और उन की टीम द्वारा दिए गए जवाब से कोर्ट संतुष्ट नहीं था. न्यायाधीशों ने कहा था कि अगर शरीफ परिवार ने लंदन में फ्लैट्स की खरीद के समय सभी जरूरी कागजात जमा किए होते तो विवाद खड़ा ही नहीं होता.

जेआईटी ने अपनी रिपोर्ट में नवाज और उन के परिवार पर धोखाधड़ी, फर्जी कागजात बनाने, अपनी संपत्ति के स्रोतों को छिपाने और आय से कहीं ज्यादा आलीशान जीवन जीने जैसे कई संगीन आरोप लगाए थे. इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीके इंसाफ यह मामला कोर्ट में ले गई थी और शरीफ के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था.

नवाज शरीफ वर्ष 2013 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे और अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके. उन्हें पहली बार राष्ट्रपति, दूसरी बार सेना और तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट ने हटाया.

15 महीने पहले नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार का यह मामला सामने आया था. नवंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ से जुड़े मामले को देखने का फैसला किया. बाद में कोर्ट ने अप्रैल 2017 में जौइंट इंवैस्टिगेशन टीम के गठन का आदेश दिया. 6 सदस्यीय टीम ने जांच शुरू की और 7 हफ्ते की जांच के बाद 10 जुलाई को रिपोर्ट जमा की. इस दौरान शरीफ परिवार के 8 सदस्यों से पूछताछ की गई.

नवाज शरीफ के तीनों कार्यकाल भ्रष्टाचार व घोटालों से घिरे रहे. 6 नवंबर, 1990 को वे पाकिस्तान के 12वें प्रधामंत्री बने. उन्होंने उस समय आर्थिक सुधारों के साथसाथ परमाणु कार्यक्रम को रफ्तार देने को प्राथमिकता पर रखा. 1992 में दिवालिया चिटफंड कंपनियों के उन के स्वामित्व वाले इत्तफाक ग्रुप को कर्ज देने के खुलासे से उन की किरकिरी हुई और उन की लोकप्रियता कम हुई थी. दिसंबर 2016 में लंदन, सऊदी अरब, यूएई में मनी लौंड्रिंग से संपत्ति खरीदने के आरोपों का खुलासा हुआ.

नवाज शरीफ 1985 में सैन्य तानाशाह जनरल जियाउल हक की मदद से राजनीति में आए थे. अदालत ने जिस अनुच्छेद के तहत अयोग्य ठहराया है, उसे जियाउल हक 18वें संशोधन के जरिए समाप्त करना चाहते थे पर तब शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन ने ही संशोधन का विरोध किया था.

जांच टीम के अनुसार, नवाज 7 अगस्त, 2006 से 20 अप्रैल, 2014 तक दुबई स्थित एक कंपनी के चेयरमैन थे. उन्हें 10 हजार दिरहम वेतन मिलता था. पर 2013 के चुनाव में उन्होंने यह जानकारी नहीं दी. वे इसे झुठलाते रहे पर यूएई वर्क वीजा रोड़ा बन गया. यूएई में सभी को वैज प्रोटैक्शन सिस्टम के तहत बैंक से वेतन मिलता है. सुबूत जांच टीम के पास था. इसी आधार पर नवाज बेईमान साबित हुए.

पनामा पेपर्स में शरीफ परिवार की लंदन में 4 महंगे फ्लैट्स सहित कई संपत्तियों का खुलासा हुआ था. 1990 के दशक में फर्जी कंपनी बना कर इन संपत्तियों को खरीदा गया था. ये संपत्तियां नवाज शरीफ की बेटी और बेटों के नाम हैं.

नवाज शरीफ को इस से पहले 18 जुलाई, 1993 को भी भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री पद से बरखास्त किया गया था. दूसरी बार अक्तूबर 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने उन की सरकार का तख्तापलट किया था.

68 वर्षीय शरीफ पहले ऐसे नेता हैं जो तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे. 1999 में कारगिल युद्ध के चलते शरीफ ने मुशर्रफ को सेना प्रमुख पद से हटाने का फैसला किया पर मुशर्रफ ने तख्तापलट कर दिया. बाद में पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधी अदालत ने शरीफ को भ्रष्टाचार मामले में दोषी करार दिया. सऊदी अरब की हुकूमत की मध्यस्थता के चलते वे जेल जाने से बच गए पर उन्हें पाकिस्तान छोड़ना पड़ा. तब उन्होंने सऊदी अरब के शहर जेद्दाह में शरण ली.

अगस्त 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने शरीफ को पाकिस्तान वापस आने की इजाजत दी. सितंबर 2007 में वे 7 वर्षों के निर्वासन के बाद इसलामाबाद लौटे पर हवाईअड्डे से ही तुरंत उन्हें वापस भेज दिया गया. सऊदी अरब के हस्तक्षेप के चलते नवंबर 2007 में नवाज शरीफ फिर से पाकिस्तान वापस आ गए. तत्कालीन सेना प्रमुख अब पनामा पेपर्स मामले ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पूरी सत्ता को उजाड़ दिया है.

भ्रष्ट नेताओं में जो भय का माहौल व्याप्त है, इस का श्रेय अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को दिया जाना चाहिए जिस ने पनामा पेपर्स की रिपोर्ट जारी कर के पूरी दुनिया के अवैध कारोबारियों की कलई खोल दी थी. 100 से ज्यादा देशों के पत्रकारों की संस्था इंटरनैशनल कंसोर्टियम औफ इंवैस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स ने पनामा पेपर्स के नाम से दुनिया की बड़ी हस्तियों का कालाधन उजागर किया था. इस के 1.15 करोड़ दस्तावेज हैं. यह सूचना पनामा की फर्म मोसेक फोंसेका को हैक कर निकाली गई थी. पनामा दक्षिणी अमेरिका का एक छोटा देश है जिस के बीच से एक नहर निकाली गई है जो प्रशांत महासागर व एटलांटिक महासागर को जोड़ती है.

पनामा पेपर्स में 500 भारतीयों के नाम भी सामने आए थे. इन में अभिनेता अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्र्या राय, अजय देवगन, डीएलएफ के चेयरमैन के पी सिंह, गौतम अडाणी के भाई विनोद अडाणी के नाम भी हैं. इन पर फर्जी कंपनियों के जरिए पैसा बाहर भेजने के आरोप हैं. मामले की जांच एसआईटी कर रही है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और फुटबौलर मैसी जैसी हस्तियों के नाम भी शामिल हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाली भारत सरकार इस मामले में कोई कार्यवाही करती नहीं दिख रही है.

भारत में भी ऐसे मामले हुए हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजनारायण की याचिका पर इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया था. 1971 में रायबरेली से लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत हुई थी. उन के प्रतिद्वंद्वी राजनारायण चुनाव हार गए थे पर राजनारायण ने इंदिरा गांधी की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी.

न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को कदाचार का दोषी पाया और अपने ऐतिहासिक फैसले में गांधी की जीत को अवैध करार दे दिया. कोर्ट ने इंदिरा गांधी पर 6 साल के लिए चुने हुए पद पर आसीन होने से रोक लगा दी थी. हालांकि इस निर्णय से देश में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया. इंदिरा गांधी ने इमरजैंसी का ऐलान कर दिया.

पनामा पेपर्स है क्या

पनामा की मोसेक फोंसेका कंपनी द्वारा 1.15 करोड़ गुप्त फाइलों का भंडार इकट्ठा किया गया था. इन में कुल 2,14,000 कंपनियों से संबंधित जानकारी है. इस से अब तक 40 देशों से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की जा चुकी है. जानकारी के मुताबिक, भ्रष्ट लोगों में सरकारों में बैठे नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, फिल्म इंडस्ट्री व खेल जगत के लोग और ड्रग स्मगलर शामिल हैं.

पनामा पेपर्स के नाम से लीक हुए इन दस्तावेजों को सामने लाने में मुख्य भूमिका अमेरिका स्थित एक एनजीओ और खोजी पत्रकारों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन आईसीआईजे की है. जांच में जो डाटा सामने आया वह 1977 से ले कर 2015 तक का यानी 40 वर्षों का है. इस मामले में पनामा स्थित ला फर्म मोसेका फोंसेका  के संस्थापक की गिरफ्तारी हो चुकी है.

पनामा की यह लौ कंपनी पैसे के प्रबंधन का काम करती है. कालेधन को सुरक्षित ठिकाने लगाने का काम यह कंपनी सालों से करती आई है. यह फर्जी कंपनी खोल कर कागजों का हिसाब रखती है. पनामा की अर्थव्यवस्था ऐसी ही कंपनियों पर निर्भर है.

आईसीआईजे ने 10 मई, 2016 को कर चोरी के सुरक्षा ठिकाने माने जाने वाले देशों में कंपनियां रखने से जुड़ी पनामा पेपर्स की विस्तृत जानकारी प्रकाशित की थी. इन में हजारों दस्तावेज ऐसे हैं जो भारत के लगभग 2 हजार लोगों, कंपनियों और पतों से जुड़े हैं. इन दस्तावेजों में 147 राजनीतिबाजों के बारे में जिक्र किया गया है. उन के परिवार व नजदीकी लोग इस से जुड़े हैं.

बीते 1 साल में 80 देशों के 100 से अधिक  मीडिया संगठनों के 400 पत्रकारों ने इन दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया है. अध्ययन करने वाले पत्रकारों में कानून, आयकर, अर्थशास्त्र, मैडिकल जैसे तमाम विषयों के विशेषज्ञ शामिल हैं.

42 देशों में सक्रिय इस कंपनी का करीब 600 लोगों का स्टाफ है. कई देशों में इस कंपनी ने अपनी फ्रैंचाइजी भी दे रखी है. टैक्स हैवन कहे जाने वाले देशों स्विट्जरलैंड, साइप्रस, ब्रिटिश वर्जिन आइसलैंड, जर्सी  जैसे 35 से अधिक देशों में इस के औफिस हैं. खुलासे के बाद कंपनी को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. कंपनी के खिलाफ जांच की मांग की गई कि  उस की सूचनाएं कैसे लीक हुईं.

बदहाल राजनीतिक दौर

धर्म के नाम पर बना पाकिस्तान अपनी आजादी के 70 वर्षों बाद भी नेताओं के भ्रष्टाचार और मजहबी कट्टरपंथियों से मुक्त नहीं हो पाया है. पाकिस्तान में उस के जन्म के समय से ही लोकतंत्र पर ग्रहण लगा हुआ है. यही वजह है कि पिछले 70 वर्षों में पाकिस्तान का कोईर् भी लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर सका.

14 अगस्त, 1947 को जब से पाकिस्तान का विश्व के नक्शे पर नए देश के रूप में उदय हुआ था तभी से यह देश भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता, सैनिक तानाशाही से जूझ रहा है. सत्ता की छीनाझपटी, तख्तापलट इस राष्ट्र की जैसी स्थायी नियति बन गई है.

1951 में इस देश के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या कर दी गई. इस के बाद प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन को गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद ने पद से हटा दिया था. ज्योंही 1956 में पाकिस्तान को इसलामिक राष्ट्र घोषित किया गया, सत्ता वहां फुटबौल बन गई. बारबार कभी सेना ने सत्ता हथियाई तो कभी अदालत ने भ्रष्टाचारी नेताओं पर कोड़ा फटकारा.

1958 में सेना प्रमुख रहे अयूब खान ने लोकतंत्र का गला घोंटते हुए सत्ता कब्जाने की शुरुआत की. देश में मार्शल ला लगा दिया गया. इस के बाद 1960 में वे राष्ट्रपति बन गए. अयूब खान के इस्तीफे के बाद 1969 में जनरल याहया खान ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार के खिलाफ बगावत की और उन्हें पद से हटा कर सैन्य शासन लागू कर दिया. बाद में भुट्टो को 1979 में फांसी पर लटका दिया  गया.

1986 में भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का नेतृत्व किया. 1990 में बेनजीर को भ्रष्टाचार और अक्षमता के आरोपों में बरखास्त कर दिया गया और नवाज शरीफ देश के प्रधानमंत्री बने.

1993 में राष्ट्रपति इशाक खान और नवाज शरीफ दोनों को ही सेना के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा. आम चुनाव हुए तो बेनजीर एक बार फिर सत्ता में लौटीं. फारुख लेघारी राष्ट्रपति बने जिन्होंने 1996 में बेनजीर सरकार को बरखास्त कर दिया. 1999 में बेनजीर भुट्टो और उन के पति आसिफ अली जरदारी को जेल की सजा सुनाई गई. हालांकि वे देश के बाहर ही रहे.

वर्ष 2000 में पीपीपी और शरीफ की मुसलिम लीग ने गठबंधन कर चुनाव जीता  और इस गठबंधन की तरफ से पीपीपी के यूसुफ रजा गिलानी देश के प्रधानमंत्री बने. गठबंधन सरकार के साल 1998 में देश में मार्शल ला लगाने की जांच शुरू करने की सहमति बनी तो परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया. नवाज शरीफ ने सरकार से अलग होने का फैसला किया और जरदारी देश के राष्ट्रपति बने.

2007 में बेनजीर भुट्टो निर्वासन से लौट आईं. परवेज मुशर्रफ एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव जीत गए पर सुप्रीम कोर्ट ने उन के निर्वाचन को चुनौती दी. इस से तिलमिलाए मुशर्रफ ने देश में आपातकाल लगा दिया और मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को बरखास्त कर के नया जज नियुक्त कर दिया. नए जज ने मुशर्रफ की जीत पर मुहर लगा दी.

इस बीच, नवाज शरीफ निर्वासन से वापस आ गए और बेनजीर की एक रैली में हत्या कर दी गई. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अयोग्य ठहरा दिया जिस से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. दरअसल, उन की सरकार ने जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले खोले जाने से इनकार कर दिया था.  इस के बाद रजा परवेज अशरफ देश में प्रधानमंत्री बने.

2013 में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में रजा गिलानी की गिरफ्तारी का आदेश दिया था. गिरफ्तारी का यह आदेश उस समय के भ्रष्टाचार से जुड़ा था जो उन्होंने 2010 में जल एवं बिजली मंत्री रहते हुए किए थे.

यह सही है कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकारों ने सही भूमिका नहीं निभाई. उस के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त रहे. बाद में उन पर भ्रष्टाचार, बेईमानी के मुकदमे चले, उन्हें निर्वासित होना पड़ा. नवाज शरीफ, बेनजीर भुट्टो, परवेज मुशर्रफ को निर्वासन झेलना पड़ा. मुशर्रफ पर देशद्रोह का मुकदमा चल रहा है.

सरकार और फौज दोनों भ्रष्ट

असल में पाकिस्तान धार्मिक कट्टरपंथियों, भ्रष्ट नेताओं और सेना के दखल के बीच हमेशा डांवांडोल हालात में रहा. तीनों अपनेअपने वर्चस्व के लिए एकदूसरे की टांग खींचने में लगे रहते हैं, इसलिए वहां लोकतंत्र बहुत मजबूत नहीं हो पाया. वहां आतंकवाद पनपता गया. आतंकी टे्रनिंग कैंप खुल गए. आएदिन अपने ही धर्म के लोगों पर हमले होते हैं.

पाकिस्तान ऐसा देश है जहां चुनी हुई सरकार और फौज दोनों ही समानरूप से भ्रष्ट हैं. पर कानून की तलवार ही कभीकभी कारगर साबित होती रही है. फिर भी, पाकिस्तान की न्यायपालिका को भी निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता. वहां भी सेना की दखलंदाजी रहती है. ऐसे में देश में सदैव अराजकता के हालात बने रहते हैं. आम जनता परेशान होती है. उस का गरीबी, भुखमरी, बेकारी से नजात पाना मुश्किल है. यही कारण है कि पाकिस्तान कभी अमेरिका तो कभी चीन के टुकड़ों का मुहताज बने रहने को विवश है.

45 दिनों के प्रधानमंत्री – शाहिद खाकान अब्बासी

पाकिस्तान में राजनीतिक उथलपुथल के बीच शाहिद खाकान अब्बासी को पाकिस्तान के 18वें प्रधानमंत्री के तौर पर चुना गया है. 221 वोटों से चुनाव जीत कर शाहिद अब्बासी पाकिस्तान के अंतरिम प्रधानमंत्री बन गए हैं. प्रधानमंत्री पद के लिए पीएमएल-एन के अब्बासी समेत कुल 6 उम्मीदवार मैदान में थे.

गौरतलब है कि पाकिस्तान मुसलिम लीग-नवाज ने शाहिद खाकान अब्बासी को अपना उम्मीदवार घोषित किया था, जबकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की ओर से खुर्शीद शाह और नावेद कमर के नाम पीएम उम्मीदवार के लिए घोषित किए गए थे. वहीं, पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ ने शेख राशिद को अपनी ओर से प्रधानमंत्री पद का कैंडीडेट बनाया था. नावेद कमर को 47 वोट, शेख राशिद को 33 वोट और जमाते इसलामी के साहिबजादा तारिक उल्ला को महज 4 वोट मिले.

पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक किसी पार्टी के उम्मीदवार को बहुमत के लिए 172 वोटों की जरूरत होती है. नवाज शरीफ के बेहद करीबी माने जाने वाले अब्बासी उन के मंत्रिमंडल में पैट्रोलियम एवं प्राकृतिक संसाधन मंत्री रहे हैं. अब्बासी 45 दिनों तक इस पद पर रहेंगे.

पाकिस्तान का सैन्य लोकतंत्र

बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान वजूद में आया था तब वहां पूंजीवादी तो दूर की बात है, कोई दूसरी तरह की भी अर्थव्यवस्था नहीं थी. नए आजाद हुए देश के लिहाज से यह बात कतई हैरत की नहीं थी पर पाकिस्तान में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का पनपना और फिर स्थायी हो जाना अर्थशास्त्रियों को भी अचंभित कर देने वाली बात थी.

आजाद पाकिस्तान में सिर्फ प्राकृतिक संसाधन थे, उन में भी उल्लेखनीय जमीनें थीं जो आज भी हैं. दोटूक कहा जाए तो वहां जमींदारी व्यवस्था थी जिस में 99 फीसदी आम लोग थे और 1 फीसदी जमींदार या नवाब.

ब्रिटिशकाल में सैन्य अधिकारियों को जमीनें देने का रिवाज पाकिस्तान में साल 1958 तक कायम रहा. मुट्ठीभर अंगरेजों ने, दरअसल, संपन्न किसानों को ही सैन्य अधिकारी बनाना शुरू कर दिया था. पद के हिसाब से सैन्य अधिकारियों को जमीनें दे दी जाती थीं. इस से अंगरेजों का फायदा यह था कि सेना उन की वफादार बनी रहती थी. इन सैनिकों या सैन्य अधिकारियों के हाथ में हल नहीं, बंदूक होती थी जिस के दम पर ये गरीब मजदूरों से खेतीकिसानी करवाते थे.

पाकिस्तानी सेना का ढांचा जैसा अंगरेज छोड़ गए थे वैसा ही बना रहा, और आज भी तकरीबन वैसा ही है. नतीजतन, आधी से ज्यादा जमीनों के मालिक वे सैन्य अधिकारी हैं जो खेती की एबीसीडी भी नहीं जानते लेकिन बंदूक और धर्म के दम पर अपने गोदाम भरते रहे. चूंकि पाकिस्तान बना ही धर्म के आधार पर था इसलिए मालिकों के लिए खेतों में पसीना बहाते शोषित वर्ग का ध्यान कभी इस तरफ नहीं गया कि ये जमीनें किस बिना पर आजादी के बाद भी बांटी जा रही हैं.

विभाजन के बाद एक दशक तो स्थापना और स्थायित्व की अफरातफरी में ही गुजर गया और जब लोग आश्वस्त हो उठे कि अब अंगरेज लौट कर नहीं आएंगे और  न ही भारत हमला करेगा, तो जमींदारी और शोषण को ले कर सुगबुगाहट शुरू हुई. पर कट्टरवाद को ले कर किसी ने चूंचपड़ नहीं की. 1960 के बाद इस पूंजीवाद का दिखना शुरू हो गया था और एक अर्थव्यवस्था भी आकार लेने लगी थी.

एक मशहूर और विवादित पाकिस्तानी लेखक मुबारक हैदर के अनुसार, बंटवारे के वक्त वहां जो जागीरें मौजूद थीं वे आज भी कायम हैं. सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान में तो कई ऐसे बड़े जमींदार हैं जिन के पास हजारों एकड़ जमीनें हैं. चूंकि जमींदार ही सत्ता में हैं, इसलिए भूमि सुधार की बात कोई नहीं करता. पाकिस्तान के गांवों की बदहाली आजादी के 67 वर्षों बाद भी ज्यों की त्यों है और जमींदारों के जुल्म ढाते तानाशाही रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है.

जब उद्योगों की स्थापना होने लगी और छोटेमोटे ही सही, कारखाने भी वजूद में आने लगे तब एक और हैरतभरी बात 1958 में पाकिस्तानी सेना के पहले कमांडर इन चीफ अयूब खान, जिन्होंने पाकिस्तान में सेना द्वारा तख्ता पलटने का रिवाज शुरू किया था, ने यह की कि सैन्य अधिकारियों को वित्त, उद्योग और अर्थव्यवस्था में अहम पद परोसे जाने लगे. बहुत जल्द ही इन सैन्य अधिकारियों ने अर्थव्यवस्था को भी अपने कब्जे में ले लिया. अब पाकिस्तान के उद्योगों व सार्वजनिक उपक्रमों और प्रतिष्ठानों के मुखिया पद पर भी सैन्य अधिकारी विराजने लगे. दोटूक कहा जाए तो अर्थव्यवस्था, जिसे किसी भी आजाद देश की रीढ़ माना जाता है, भी सेना के हाथ में आ गई.

कल तक सेना के जो अधिकारी गांवदेहातों में ब्याज पर पैसा चलाते साहूकारी कर रहे थे वे धीरेधीरे शेयर और स्टौक की खरीदफरोख्त भी करने लगे. तमाम अहम आर्थिक प्रतिष्ठानों पर रिटायर्ड सैन्य अधिकारी नजर आने लगे.

सैनिकों और सैन्य अधिकारियों के हाथ में पैसा आया तो राजनीति और धर्म को इन्होंने बंदी बना लिया. इसलाम में और कुरान में यह लिखा है, यह हिदायत है, और यह बंदिश है जैसी बातें भी ये थोपने लगे जिस से लोग कूपमंडूक बने रहें और ऐसा हुआ भी. तय है पाकिस्तान पहला देश है जहां पूंजीपति वही है जो कभी सैन्य अधिकारी रहा हो. सैन्य पूंजीपति आधारित इस अर्थव्यवस्था ने वहां लोकतंत्र को पनपने ही नहीं दिया.

पनामा पेपर कांड इस का अपवाद नहीं है. जब आम लोगों का गला सिर्फ दो वक्त की रोटी निगलने लायक भर छोड़ा गया तो इन्हीं सैन्य अधिकारियों ने दूसरे कालेधंधे भी करने शुरू कर दिए जिस के लिए पाकिस्तानी सेना दुनियाभर में कुख्यात है. ये धंधे थे हथियारों की तस्करी और आतंकवाद को शह देने के. जिस के चलते पाकिस्तान में मध्यवर्ग कभी मजबूत नहीं हो पाया. लोकतंत्र उच्चवर्ग के लोग कभी चाहते नहीं और निम्नवर्ग में इतनी क्षमता, बुद्धि या चालाकी, कुछ भी कह लें, होती नहीं कि वह सत्ता से लड़ सके.

सरकारें बदलीं, शासक आए, गए. पर पाकिस्तान की सत्ता उन जमींदारों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के हाथों में ही रही जो कल तक कुछ नहीं थे. इन सैन्य अधिकारियों को चूंकि देशहितों से कोई लेनादेना नहीं था, इसलिए ये हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी और धंधा भी करने लगे. इन लोगों ने इस बात का ध्यान हर वक्त रखा कि आवाम कभी इसलाम के खिलाफ न जाए, इसलिए लोगों को काबू में रखने के लिए ये लोग मजहब का मनमाना इस्तेमाल करते रहे.

मिसाल कट्टरवाद की

पाकिस्तान में पसरी धार्मिक कट्टरता कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही जिस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मात्र 3 शब्द हैं जिन पर अमल करने की सख्त मनाही है. खुले विचारों और हवा के लिए पाकिस्तान में कभी कोई जगह नहीं रही. ऊपर वाले के डर और नीचे वालों के कहर ने किस तरह लोगों को दिमागी तौर पर गुलाम बना रखा है, इस की एक मिसाल साल 2011 में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया के रूप में देखने में आई थी.

पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या दिनदहाड़े उन के ही सुरक्षा गार्ड ने कर दी थी. इसलामाबाद की कड़ी सुरक्षा तब एक तरफ रखी रह गई थी क्योंकि सलमान तसीर के हत्यारे मुमताज कादरी को यह बात पसंद नहीं आई थी कि  वे ईशनिंदा कानून पर सार्वजनिक रूप से कुछ बोलें. तसीर की गिनती पाकिस्तान के नामी कारोबारियों में होती थी लेकिन वे कट्टरवाद की घुटन से एक हद तक आजाद थे. उन का कुसूर इतना भर था कि वे एक ऐसी औरत की सजा माफ कर देने की बात कर रहे थे जिस ने ईशनिंदा की थी.

पाकिस्तान में ईशनिंदा यानी हजरत मुहम्मद पैगंबर की आलोचना एक संगीन गुनाह है जिस की सजा सिर्फ मौत होती है.

एक हत्यारे को हीरो की तरह पेश करने और पूजने का काम पाकिस्तान में हुआ तो सहज ही दुनिया को समझ आ गया कि पाकिस्तान में लोकतंत्र एक परिकल्पना भर है. धर्म और कट्टरवाद के खिलाफ बोलने वालों को अदालतों के पहले, आम लोग ही सजा दे देते हैं. एक कातिल को मिले समर्थन पर तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ जरदारी भी कुछ नहीं बोल पाए थे जो सलमान तसीर के बेहद नजदीकी दोस्त थे.

नवाज शरीफ बहुत ज्यादा कट्टर नहीं थे. उन्होंने ही पाकिस्तानियों को टीवी चैनल्स और इंटरनैट इस्तेमाल करने की सहूलियतें दीं. वे कट्टरवादियों की नापसंद बनते जा रहे थे. उन्होंने वही प्रचलित पाकिस्तानी बेईमानी की थी जो उन के पहले के शासक करते आए थे कि मनमाफिक दाम मिले तो देशहित बेचने में हिचकिचाओ मत. लेकिन पनामा कांड में तो दुनियाभर के नेता और दूसरे रसूखदार लोग भी शामिल हैं.

मुमकिन यह भी है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट पर सेना का दबाव इस बाबत रहा हो. वजह, जिस देश में कपड़े धर्म के मुताबिक पहने जाते हों, जहां की दिनचर्या धार्मिक निर्देशों से चलती हो, जहां के नेता पूरी तरह धार्मिक गुलामी ढोते हों, वहां की सब से बड़ी अदालत निष्पक्ष न्याय करेगी, इस में शक है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बारीकी से नजर डालें तो उस ने नवाज शरीफ को यूएई के वर्क वीजा के बाबत झूठ बोलने पर हटाया है, न कि भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो जाने पर. हुक्म यह भी था कि उन्हें अपील करने का भी हक न दिया जाए.

इमरान के निशाने पर नवाज की शाही जिंदगी

पनामा पेपर्स लीक में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पद से हटाए जाने से पहले ही नवाज शरीफ की खरबों की जायदाद उन के राजनीतिक विरोधियों खासतौर से इमरान खान के निशाने पर रही है. लाहौर में उन का आलीशान मकान रायविंड पैलेस है जिस में 3 भव्य ड्राइंगरूम और स्वीमिंग पूल भी हैं. नवाज शरीफ के परिजनों के दाखिले के लिए अलग से एक दरवाजा खासतौर से बना हुआ है. रायविंड पैलेस के लगभग सभी दरवाजों पर शेर बने हुए हैं.

नवाज शरीफ की देशविदेश में फैली जायदाद का सही अंदाजा शायद ही कोई लगा पाए पर उजागर तौर पर उन की जायदाद की कीमत 9,000 करोड़ रुपए के लगभग आंकी जाती है. शरीफ 6 शुगर फैक्टरियों और एक स्टील मिल के भी मालिक हैं. पनामा मुद्दे पर नवाज को घेरने वाले इमरान खान का दावा है कि नवाज के पास लंदन के एक पौश इलाके में भी जायदाद है और उन्होंने यूरोप में लाखों डौलर का निवेश कर रखा है. बकौल इमरान, चूंकि पाकिस्तानी संसद में बैठा विपक्ष भी भ्रष्ट है, इसलिए कोई इस बाबत सवाल नहीं करता, सभी के पास बेहिसाब नाजायज दौलत है.

नवाज शरीफ के मालिकाना हक की जमीनों की कीमत ही 150 करोड़ रुपए है. उन के बेटे हुसैन शरीफ के पास 80 करोड़ डौलर की जायदाद लंदन में है. उन की पत्नी कुलसूम नवाज के नाम 10 करोड़ रुपए कीमत की जमीनें और मकान हैं.

फौंट से फंसी सरकार

पनामा लीक्स मामले में तकनीक की बड़ी भूमिका सामने आई है. पनामा पेपर स्कैंडल में फंसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बेटी मरियम नवाज शरीफ की एक फौंट ने रातों की नींद उड़ा दी. असल में इस मामले में नवाज शरीफ की बेटी मरियम द्वारा पेश दस्तावेजों के केवल फौंट स्टाइल पकड़ में आने से झूठ की जटिल श्रृंखला का परदाफाश हुआ. इस के केंद्र में कैलिब्री फौंट रहा है. मरियम ने संपत्ति के जो कागजात अदालत में दाखिल किए थे, उन की तारीख और फौंट मेल नहीं खा रहे थे. उन के द्वारा पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेज, जो कि 2006 में तैयार किए गए थे, कैलिब्री फौंट में तैयार किए गए थे. जबकि कैलिब्री फौंट को माइक्रोसौफ्ट कंपनी ने मार्केट में 30 जनवरी, 2007 में विंडोज विस्ता और माइक्रोसौफ्ट औफिस में लौंच किया था. फौंट के मार्केट में आने से पहले कोई दस्तावेज उस फौंट में कैसे तैयार किया जा सकता है? इसी बात को ले कर मरियम के ऊपर फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने का आरोप लग गया.

मरियम ने दस्तावेजों की फोटो ट्वीट करते हुए दावा किया था कि वह संपत्ति की केवल ट्रस्टी है, स्वामी नहीं. बाद में ये दस्तावेज अदालत में पेश किए गए. डीड दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की गई तारीख फरवरी 2006 की थी और वह माइक्रोसोफ्ट कैलिब्री फौंट में प्रिंटेड थे. यहीं पर मरियम द्वारा दाखिल कागजों की पोल खुल गई. इस सिलसिले में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने फौंट के डिजायनर लुकास डी ग्रूट से और फौंट को मार्केट में लाने वाली माइक्रोसौफ्ट से भी पूछताछ की.

— भारत भूषण श्रीवास्तव के साथ राजीव खरे

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