सरिता विशेष

प्रांतीय विधानसभाओं और संघीय संसद के चुनावों के छह सप्ताह बाद जाकर नेपाली कांग्रेस ने यह जानने के लिए कार्यसमिति की बैठक बुलाई कि आखिरकार उसकी करारी शिकस्त के पीछे की वजह क्या रही? लेकिन इस बैठक में कोई सार्थक बहस की बजाय सबने अपना आक्रोश ही व्यक्त किया.

पार्टी के पूर्व महासचिव प्रकाशमान सिंह ने आरोप लगाया कि मौजूदा पार्टी अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा किसी से बिना सलाह-मशविरा किए मनमाने तरीके से पार्टी चला रहे हैं, तो वहीं देउबा ने प्रकाशमान सिंह को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने सार्वजनिक रूप से उनके विरुद्ध बोला, तो उनके खिलाफ ‘अनुशासनात्मक कार्रवाई’ की जाएगी. आश्चर्य की बात नहीं कि पार्टी अध्यक्ष अन्य नेताओं के निशाने पर आ गए हैं.

गगन थापा ने बुजुर्ग नेताओं से यह अपील की कि वे ‘अब सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लें’ और पार्टी के नौजवान नेताओं को नेतृत्व सौंप उनके अभिभावक की भूमिका संभालें. इसी हफ्ते एक इंटरव्यू में पार्टी के वरिष्ठ नेता शेखर कोईराला ने चुनावों में नेपाली कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के लिए कई कारण गिनाए थे. उन्होंने कहा था कि इस पराजय की जिम्मेदारी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को स्वीकार करनी चाहिए.

कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी के लोकतांत्रिक इतिहास की दुहाई देते कभी नहीं थकते, फिर भी अपनी हार की समीक्षा के लिए बैठक बुलाने में उसे इतना लंबा समय लगा. यह बताता है कि इस पार्टी के नेता किसी बदलाव के विचार के प्रति कितने उदासीन हैं? आम धारणा यही है कि देउबा और वे तमाम लोग, जो पार्टी के आंतरिक विमर्श से खुद को बचाने की जुगत में हैं, वे यथास्थिति बनाए रखने के लिए वह सब कुछ करेंगे, जो वे कर सकते हैं.

पार्टियां आती हैं और जाती हैं, अनेक लोकतांत्रिक देशों का इतिहास इसका साक्षी है. लेकिन नेपाली कांग्रेस को लेकर चिंता किसी गुट के हितों से नहीं, बल्कि नेपाली लोकतंत्र की सेहत से जुड़ी है. आखिरकार एक मजबूत विपक्ष ही सत्ता को बेलगाम होने से नियंत्रित कर सकता है, न कि कमजोर और बिखरा हुआ.