अनुभूति

November 1, 2013

यह सच है स्वत: सच
तुम यहां कभी नहीं आईं
और न कभी हुआ तुम्हारा
मेरे साथ रहना यहां

फिर भी इन वादियों में
इन पहाडि़यों पर
तुम्हारे रहने की अनुभूति है
एक असीमित अनुभूति

यह मत पूछना क्यों
क्यों होता है ऐसा
जिंदगी में कुछ बातों का
उत्तर नहीं होता.

जुलियस अशोक शा

एहसास

मांग में सिंदूर, माथे पर बिंदी, गले में मंगलसूत्र को पराधीनता का प्रतीक मानने वाली कल्पना थाने आई तो थी अपने पति से तलाक लेने...

दिसंबर की खामोश सी एक सर्द दोपहर थी. मैं थाना प्रभारी, कोतवाली की हैसियत से कार्यालय के अपने कमरे में कुरसी पर बैठी सरकारी कामों को निबटा कर, फुरसत के क्षणों में अपने पति के साहित्यिक पत्र का जवाब साहित्यिक भाषा में देने का प्रयास कर रही थी. वे लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफैसर थे और उन्होंने मुझ से शिकायत की थी कि पुलिस अधिकारियों में वह दया, ममता नहीं होती जो अन्य विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों में होती है. मैं उन्हें हिंदी भाषा में पत्र लिख कर यह बताना चाहती थी कि पुलिस वाले ऊपर से तो कठोर बने रहते हैं परंतु उन के हृदय में भी दया, ममता, स्नेह और प्यार का सागर हिलोरे लेता है.

मैं अपने पत्र में लिख रही थी, ‘‘एक दिन सागर ने नदी से पूछा, ‘कब तक मिलाती रहोगी मुझे मीठे पानी से?’ नदी ने हंस कर कहा, ‘जब तक तुझ में मिठास न आ जाए तब तक.’ यही तो रिश्ता होता है सच्चे प्रेम का, सच्चे मिलन का.’’

मैं आगे इस रोचक पत्र में बहुत कुछ अपने पति को लिखना चाहती थी कि तभी अचानक कमरे में कदमों की आहट से मेरा ध्यान भंग हुआ. जब तक मैं कुछ समझती तब तक मेरा पूरा कमरा ओपियम सेंट की खुशबू से भर उठा. मैं ने पत्र से नजर उठा कर देखा तो मेरे सामने एक पुरुष व स्त्री खड़े थे. उन दोनों के हावभाव से यह स्पष्ट हो रहा था कि वे रिश्ते में पतिपत्नी हैं.

मैं ने जल्दी से पत्र को समेटा और स्त्री को नीचे से ऊपर तक देखा. उस की उम्र 33-34 साल के आसपास होगी. उस ने सुंदर चेहरे पर गहरा मेकअप किया हुआ था. होंठों पर हलकी गुलाबी लिपस्टिक अलग से दिखलाई दे रही थी. विदेशी जींस और महंगे विदेशी कपड़े की खुले गले की पीली हाफ शर्ट पहने हुए थी, जो सलीके से ‘इन’ की गई थी. आंखों में गहरे काजल की उपस्थिति दर्ज थी. ऊंची एड़ी की सैंडिल पैरों में थीं. बौबकट बाल, कानों में कीमती सोने के सुंदर टौप्स, दाएं हाथ में एक फाइल और बाएं हाथ में कीमती मोबाइल. कुल मिला कर स्त्री में एक आकर्षण था, जिसे मैं भलीभांति महसूस कर रही थी.

मैं ने एक क्षण के लिए साथ में आए पुरुष पर दृष्टि डाली. वह हृष्टपुष्ट, दृढ़ विचारों वाला कोई उच्च वर्गीय व्यक्ति सा लगा. उस के वस्त्रों और भावों से उस के अधिकारी होने की पुष्टि हो रही थी. उस की उम्र भी अपनी पत्नी के आसपास या 1-2 साल ज्यादा ही होगी.

मैं ने दोनों को सामने रखी हुई कुरसियों पर बैठने का इशारा किया. स्त्री तो कुरसी पर नहीं बैठी लेकिन पुरुष मेरा निवेदन स्वीकार करते हुए कुरसी पर धन्यवाद कहते हुए बैठ गया. मुझे कहीं न कहीं स्त्री की अपेक्षा पुरुष ज्यादा संस्कारित लगा. मैं ने महसूस किया कि पुरुष से ज्यादा स्त्री तनाव में है. उस ने खड़ेखड़े ही साथ में लाई फाइल में से एक कागज निकाल कर मेरी ओर बढ़ाते हुए तेजी से कहा, ‘‘पहले इसे आप पढ़ लीजिए.’’

मैं ने कहा, ‘‘आप बैठिए तो सही.’’

लेकिन उस ने मेरी इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और मेरे सामने खड़ी ही रही.

मैं ने अपना दाहिना हाथ बढ़ाते हुए स्त्री से कागज ले लिया. यह एक कंप्यूटर से टाइप किया हुआ शिकायती पत्र था, जिस में लिखा था : ‘मैं कल्पना ठाकुर बीई, उच्च शिक्षा प्राप्त हूं और एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रही हूं. अपने पति आर के ठाकुर, जो एक प्राइवेट कंपनी में सीनियर इंजीनियर हैं, के साथ रहना नहीं चाहती हूं, इसलिए मुझे मेरे पति से तत्काल तलाक दिलाया जाए और मेरे मातापिता ने जो इन्हें दहेज दिया है वह वापस दिलाया जाए. इस के साथ ही मेरे पति के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही भी की जाए.’

शिकायती पत्र के नीचे कल्पना ठाकुर का पूरा पता, मोबाइल नंबर आदि लिखा हुआ था. पत्र पढ़ कर मैं ने कल्पना से कुछ प्रश्न करना ही ज्यादा उचित समझा. मैं ने टेबल की दराज से कुछ कोरे कागज निकाले और उस से पूछताछ कर लिखने लगी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप इन के साथ क्यों नहीं रहना चाहतीं?’’

‘‘कुछ विशेष कारण हैं, जिन्हें मैं बता नहीं सकती,’’ उस ने लापरवाही से कहा.

‘‘देखिए, तलाक तो आप को अदालत से ही मिलेगा लेकिन जितना मैं जानती हूं उस के अनुसार आप को कानूनी रूप से तब तक तलाक नहीं मिल सकता है जब तक तलाक के लिए कोई ठोस कारण

न हो और वह कारण जांच में सही भी पाया जाना चाहिए. जब तक आप इन से तलाक लेने का कोई विशेष कारण नहीं बतलाएंगी तब तक पुलिस आप की कोई भी मदद करने में असमर्थ है.’’

काफी लंबी खामोशी के बाद उस ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए अपने पति की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘बात यह है कि इन के विचारों से मेरे विचार मेल नहीं खाते. ये 21वीं सदी में भी 18वीं सदी की बातें करते हैं. मेरा इन से मतभेद ही नहीं मनभेद भी है. इसीलिए मैं इन के साथ रहना नहीं चाहती.’’

‘‘खुल कर पूरी बात बताइए,’’ मैंने कहा.

उस ने कहा, ‘‘अनादिकाल से यह होता आ रहा है, हो रहा है और होता रहेगा. महिलाओं की हथेलियों में लिखी हुई रेखाएं पैंसिल से खिंची होती हैं और उन्हें मिटाने वाली रबर पुरुषों के पास होती है. यदि महिलाएं पुरुषप्रधान समाज द्वारा खींची गई चारदीवारी के अंदर रह कर उस के द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करती हैं तो रेखाएं जीवित रहती हैं और यदि किसी महिला द्वारा इन नियमों का जानबूझ कर या भूलवश भी उल्लंघन किया जाता है तो इन पुरुषों द्वारा उन उभरी सभी रेखाओं को मिटा दिया जाता है.’’

पलभर के लिए वह रुकी और फिर उस ने कहना प्रारंभ किया, ‘‘जहां तक मैं समझती हूं, सदियों से स्त्री को देखने वाली नजर ही अलग रही है. उसे अलग रखा गया. अलग माना गया और फिर कहा, बराबरी करो. स्त्री ने जो उम्मीद पाली है कि नजर कभी तो बदलेगी लेकिन पुरुष की वह नजर नहीं बदली.’’

इतना कह कर वह फिर खामोश हो गई.

मैं ने थोड़ा सा कड़क रुख करते हुए कहा, ‘‘देखिए, आप भाषण मत दीजिए. आप तो केवल साफसाफ पूरी बात बताइए कि इन के साथ न रहने का क्या कारण है.’’

घबराहट में फिर उस ने संभल कर कहना प्रारंभ किया, ‘‘ये मुझ से कहते रहते हैं कि हमेशा तुम्हारी मांग में सिंदूर, माथे पर बिंदी, गले में मंगलसूत्र, हाथों में चूडि़यां और पैरों में बिछिया होनी चाहिए. ये सभी शृंगार, एक सुहागन स्त्री की पहचान होते हैं और आवश्यक भी. इन का यह भी कहना है कि जब भी ससुराल पक्ष को कोई उम्र में बड़ा पुरुष या स्त्री मिलने के लिए आए तो तुम्हारे सिर पर आंचल होना जरूरी है.’’

‘‘यह तो नारी धर्म है, सभी स्त्रियां इस धर्म का पालन करती हैं. मैं भी जब ड्यूटी पर नहीं होती हूं तो इन नियमों का निर्वाह करती हूं, लेकिन तुम्हें यह सब करने से क्यों इनकार है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मेरे लिए यह एक असहनीय, कष्टकारी बंधन है. मैं इन बंधनों को नहीं मान सकती, इसलिए मेरा इन के साथ रहना संभव नहीं है. मैडम, एक बात और कहना चाहती हूं.’’

‘‘हांहां, कहिए, हम सुन रहे हैं.’’

‘‘मैं यह कहना चाहती हूं कि लोग चाहते हैं कि औरत कमा कर भी लाए, खाना भी बनाए और बूढ़े सासससुर की सेवा भी करे, ड्राइंगरूम की शोभा भी बने और मखमली बिछावन भी. चूंकि वह पढ़ीलिखी है, इसलिए यह सब उसे करना ही है. इन्होंने जो कुछ काम करने की इजाजत दी है, क्या वह मेरे ऊपर इन का कम उपकार है?’’ उस ने व्यंग्य से कहा.

यह कह कर वह फिर खामोश हो गई. मैं ने फिर सवाल किया, ‘‘आप के विवाह को कितना समय हुआ?’’

‘‘5 साल.’’

‘‘कोई संतान है?’’

‘‘एक बेटा है, 4 साल का.’’

‘‘वह कहां है?’’

‘‘वह मेरे पास ही है, अभी स्कूल गया है.’’

‘‘क्या आप के पति शराब पीते हैं?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्या आप से मारपीट करते हैं?’’

‘‘जी नहीं, ये कितने भी क्रोध में रहें, न तो ये कभी मारपीट करते हैं और न ही कभी इन्होंने कोई अपशब्द ही कहा है.’’

‘‘क्या तुम्हारे मायके से पैसे लाने के लिए तुम्हें बाध्य करते हैं?’’

‘‘जी नहीं, इन का वेतन इतना ज्यादा है कि इन्हें हमारे पैसों की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘मैं यह बात नहीं समझ पा रही हूं कि जब ये शराब नहीं पीते, पैसों की मांग नहीं करते तो फिर आप को इन के साथ रहने में क्या परेशानी है? आप ने जो मुझे ऊपर कारण बताया है उन के अलावा भी कोई और कारण है?’’

उस ने मेरे प्रश्न के उत्तर में भावुक हो कर कहा, ‘‘मुझे प्रकृति की गोद में खिले हुए फूल और आकाश में उड़ते हुए परिंदे देख कर हमेशा सुखद एहसास होता है. मैं भी फूलों की तरह खिल कर सुगंधित होना चाहती हूं और उन्मुक्त परिंदों की तरह आकाश में उड़ना चाहती हूं. मैं बंधनहीन जीवन निर्वाह करना चाहती हूं. मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं, कुछ महत्त्वाकांक्षाएं हैं. मेरी दृष्टि में, मांग में सिंदूर, माथे पर बिंदी, गले में मंगलसूत्र ये सब शृंगार स्त्रियों के लिए पराधीनता के प्रतीक हैं, जिन्हें मैं स्वीकार नहीं करना चाहती. इसे एक उच्च शिक्षाप्राप्त स्त्री कैसे पसंद कर सकती है?’’

मैं ने स्त्री की बातों को ध्यान से

सुनने के बाद पुरुष से कहा, ‘‘आप क्या चाहते हैं?’’

‘‘मैं यह चाहता हूं कि ये पत्नी बन कर मेरे साथ वैसे ही रहें जैसे अन्य पारिवारिक महिलाएं रहती हैं. ये घर छोड़ कर चली गईं, मुझे सूचना भी नहीं दी. ये काफी समय से कहां और किस के साथ हैं, मुझे नहीं मालूम. मैं आज इन्हें अचानक सड़क पर दिखाई दिया तो इन्होंने मुझे आवाज दी और मुझ से कहा कि तुम थाने चलो, हम तुम्हें जेल भिजवाएंगे.’’

कुछ देर की चुप्पी के बाद उस ने फिर कहा, ‘‘इन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि मेरा बहुत अधिक वेतन है, फिर इन्हें नौकरी करने की क्या आवश्यकता है? यदि ये मेरे कहने से नहीं चलती हैं तो कोई बात नहीं. मुझे केवल चिंता इस बात की है कि मेरे बेटे का भविष्य क्या होगा? क्योंकि मैं जानता हूं कि ये जिस राह पर चल रही हैं उस राह पर चलने वाले का और मेरे बेटे का भविष्य अंधकारमय है. ये पढ़ीलिखी होने के बाद भी यह नहीं समझतीं कि इस पुरुष प्रधान समाज में बिना पति के पत्नी का कोई अस्तित्व नहीं होता है.

‘‘एक बात और, यदि ये मेरे साथ नहीं रहना चाहती हैं तो न रहें, किंतु मुझे इन से मेरा बेटा दिलवा दीजिए. यदि मुझे मेरा बेटा नहीं मिला तो मैं इन से बेटा प्राप्त करने के लिए न्यायालय में केस दायर करूंगा.’’

पुरुष की यह बात सुन कर कल्पना क्रोध से भर उठी. वह आवेश में कुछ कहना चाह रही थी कि तभी मेरे कमरे में 2 पुलिस वाले, नशे में झूमते हुए एक शराबी आदमी को पकड़ कर लाए. उन सभी के पीछेपीछे एक महिला ने भी लगभग दौड़ते हुए मेरे कमरे में प्रवेश किया. मैं ने उस महिला के चेहरे की ओर गौर से देखा, उस के चहेरे पर मारपीट के काफी स्पष्ट निशान थे. चेहरा काफी सूजा हुआ था. नाक से कुछ बूंद खून बह कर सूख चुका था. मैं ने सिपाहियों से पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘यह शराब पी कर घर में अपनी पत्नी को मार रहा था. पत्नी की मौखिक शिकायत पर हम पकड़ कर इसे आप के सामने लाए हैं.’’

मैं ने सिपाहियों को निर्देश देते हुए कहा, ‘‘इस की पत्नी की लिखित में शिकायत ले लो. पतिपत्नी का मैडिकल कराओ, मैडिकल कराने के बाद इसे हवालात में बंद कर देना. जब इस का नशा उतर जाए तब इसे मेरे सामने लाना.’’

सामने खड़ी महिला ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘मैं कुछ कहना चाहती हूं, साब.’’

मैं ने कहा, ‘‘कहिए, क्या कहना चाहती हैं आप?’’

‘‘मैं इन के खिलाफ रिपोर्ट नहीं लिखवाना चाहती और न कोई पुलिस कार्यवाही करना चाहती हूं.’’

मैं ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘इतनी मारपीट के बाद भी?’’

‘‘जी हां, इतनी मारपीट के बाद भी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘मुझे मेरे पति ने ही तो मारा है, किसी गैर ने तो मारा नहीं. ये नासमझ हैं, परंतु दिल के बहुत अच्छे हैं. ये कभीकभी दोस्तों के साथ बैठ कर जब शराब पी लेते हैं तब ही मुझ से मारपीट करते हैं, तो क्या हुआ, ये मुझे चाहते भी तो बहुत हैं. साब, इन्हें डांटडपट कर छोड़ दिया जाए और इन्हें समझाया जाए कि ये दोबारा मुझ से मारपीट न करें.’’

‘‘तो तुम चाहती हो कि इस के खिलाफ पुलिस कोई भी कार्यवाही न करे?’’ मैं ने आश्चर्यचकित हो कर पूछा.

‘‘हां साब, जब इन का नशा उतरेगा तो यही मुझे डाक्टर के पास ले जाएंगे, दवा कराएंगे और मेरी देखभाल करेंगे, अपने किए पर पछताएंगे. मुझ से माफी मांगेंगे. अब मैं इस उम्र में इन्हें जेल भिजवा कर क्या हासिल कर पाऊंगी? इस दुनिया में न इन का कोई है और न ही इन के सिवा मेरा कोई है.

‘‘इन से मेरे 2 बेटे भी तो हैं, हमें उन्हें भी तो पालना है. यदि इन्हें कुछ हो जाता है तो मुझे बहुत तकलीफ होगी क्योंकि मैं इन से बहुत प्यार करती हूं और शायद ये भी मुझे बेहद चाहते हैं.

‘‘साब, ये हैं, तो मैं हूं, मेरा अस्तित्व है, इन से ही मेरी मांग का सिंदूर है, गले में मंगलसूत्र है, माथे पर बिंदिया है, यानी इन से ही मेरे सोलह शृंगार हैं.

‘‘मैं अनपढ़ औरत जरूर हूं साब, लेकिन इतना जानती हूं कि ‘औरत के लिए मर्द उतना ही जरूरी है जितना एक तसवीर के लिए मजबूत फ्रेम.’ मेरे कहने का मतलब यह है कि मैं इन के बिना अपूर्ण हूं, अपूर्ण हूं. पुरुष और स्त्री एकदूसरे के पूरक हैं. हुजूर, जरा सा इन्हें डराधमका भर दें तो मैं इन्हें अपने साथ घर ले जाऊं. लगता है अधिक शराब पीने के कारण इन्होंने सुबह से कुछ खाया न होगा. इन्हें घर ले जा कर कुछ खिला दूं, तब ही मैं कुछ खा सकूंगी.’’

मैं ने दोनों सिपाहियों को निर्देश दिए कि जब तक इसे होश न आ जाए, जाने न देना. होश में आते ही इस से एक शपथपत्र ले लेना कि यदि भविष्य में अपनी पत्नी से मारपीट की तो इस के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाएगी.

‘‘जयहिंद,’’ कहते हुए दोनों सिपाही उस व्यक्ति को अपने साथ ले गए. पीछेपीछे कृतज्ञता व्यक्त करते हुए वह महिला भी चली गई.

उन सभी के जाने के बाद भी मुझे उस शराबी की पत्नी की उपस्थिति महसूस हो रही थी. उस महिला के कहे हुए शब्द मानो अभी भी हवा में तैर रहे थे.

मैं उस महिला के विचारों से प्रेरित हो कर कल्पना से कुछ कहने ही वाली थी कि तभी कल्पना ने मेरी टेबल पर रखा हुआ अपना शिकायती पत्र तत्परता से उठाया और मेरे सामने ही उस के टुकड़ेटुकड़े कर दिए.

पलभर बाद ही उस ने अपने पति के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘यह महिला सही कहती है कि पति ही स्त्री का संसार होता है. पतिपत्नी एकदूसरे के पूरक होते हैं. एकदूसरे के बिना अधूरे होते हैं. उस अनपढ़ महिला की बातें सुन कर मुझे भी एहसास हो चुका है कि आप के बिना मेरा जीवन निरर्थक है. चलिए, अब जीवन में मुझ से आप को कोई शिकायत नहीं होगी. मैं भटक गई थी. मैं आप को वचन देती हूं कि आप जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूंगी. मैं अपना टूटता हुआ घर फिर से बसाना चाहती हूं.’’

यह सुन कर जब पति ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की तब उस महिला ने अपने पति के कदमों पर झुकते हुए कहा, ‘‘अब तो मुझे माफ कर दो.’’

यह सुन कर पति ने अपनी पत्नी के दोनों कंधों को आहिस्ता से पकड़ते हुए उसे उठाया और कहा कि कल्पना, यह याद रखना कि जो प्रिय है वह कितने भी अपराध क्यों न करे, प्रिय ही बना रहता है. अनेक दोषों से दूषित होते हुए भी अपने शरीर का मोह किसे नहीं होता है. मैं यह भी जानता हूं कल्पना कि माफी ऐसी औषधि है जो गहराई तक जा कर भावनात्मक घावों का इलाज करती है, इसलिए मैं तुम्हें, तुम्हारी सारी गलतियों के लिए क्षमा करता हूं. चलो, अब अपने घर चलते हैं.’’

‘‘हांहां चलिए, लेकिन बेटे के स्कूल से होते हुए.’’

यह कहते हुए पति और पत्नी ने मेरी ओर हाथ जोड़ कर विदा मांगी. साथ ही कल्पना ने कहा, ‘‘धन्यवाद मैडम, अब शायद ही कभी हम आप के थाने की ओर अपना रुख करें,’’ यह कहते हुए एकदूसरे का हाथ पकड़े वे तेजी से मेरे कमरे से बाहर चले गए.