सरिता विशेष

असलम शेर खान हाकी के जाने माने खिलाड़ी रहे हैं, जिन्हें कांग्रेस ने अपने सुनहरे वक्त में पार्टी में भर्ती कर लिया था. मकसद मुसलमानों को अपने पाले में बनाए रखना था. भोपाल के इस कांग्रेसी खिलाड़ी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह दी गई थी, लेकिन असलम जमीनी नेता साबित नहीं हो पाये और धीरे धीरे वे भी सैकड़ों कांग्रेसी नेताओं की तरह गुजरे कल का अफसाना बन कर रह गए.

उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस दुर्गति का शिकार हुई तो उन नेताओं को नए नए आइडिये सूझ रहे हैं जो किसी वजह से दूसरी पार्टी में नहीं जा पा रहे, असलम उनमे से एक हैं. बगैर यूरेका यूरेका चिल्लाये उन्होंने कुछ मीडियाकर्मियों को बुलाया और कांग्रेसी आरएसएस बनाने का एलान कर डाला. बड़ी संजीदगी से उन्होंने बताया कि उनका आरएसएस भी गैर राजनैतिक मंच होगा और धर्मनिरपेक्ष ताकतों की मदद करेगा. हाल फिलहाल यह मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में ही काम करेगा बगैरह बगैरह.

दूसरी दिलचस्पी की बात उन्होंने यह बताई कि अभी इस कांग्रेसी आरएसएस के बाबत उन्होंने सोनिया राहुल से इजाजत नहीं ली है. असलम शेर खान पर तरस खाने की यह एक पर्याप्त वजह है. जो आरएसएस के माने नहीं समझते कि उसमे और कांग्रेस में बस दिखावे का फर्क है और कांग्रेसी दुर्दशा की वजह भाजपाई आरएसएस नहीं बल्कि वह कांग्रेसी आरएसएस ही है जिसके गठन की कभी विधिवत या औपचारिक घोषणा नहीं हुई.

इस विचार धारा को दुनिया भर में गांधीवाद के नाम से जाना जाता है. यह कांग्रेस की हार नहीं हो रही बल्कि गांधीवाद को समझने की शुरुआत हो रही है. नरेंद्र मोदी ने तो इसकी प्रस्तावना भर लिखी है, उपसंहार तक आते आते तो जाने कितने मंदिर मस्जिद बनेंगे टूटेंगे और मौजूदा दौर के कथित हिंदूवादी जाने कितना विध्वंस कराएंगे.  इस संभावित बरबादी के लिए अब किसी नए आरएसएस की जरूरत नहीं है और न ही वह किसी असलम या अनिल से बनने वाली, हां सत्ता की वासना अगर यह है तो दिल को बहलाने ख्याल बुरा नहीं है. वैसे भी 10 जनपथ और नागपुर में कोई फर्क करने लायक है नहीं.