झारखंड की पथरीली जमीन पर लीची पैदा करने की कवायद शुरू की गई है. फिलहाल राज्य के कुछ हिस्सों में ही लीची की पैदावार होती है. लीची की मांग बढ़ने की वजह से अब नएनए इलाकों में लीची के उत्पादन की कोशिशें शुरू की गई हैं. झारखंड जैसे पहाड़ी राज्य में वैज्ञानिक तरीके से लीची की खेती की शुरुआत की गई है. लीची के लिए सामान्य पीएच मान वाली गहरी बलुई दोमट मिट्टी मुनासिब होती है. जहां मिट्टी की पानी रखने की कूवत ज्यादा होती है, वहां लीची की बेहतर पैदावार होती है. अब हलकी अम्लीय और लेटराइट मिट्टी में भी लीची की खेती होने लगी है  झारखंड के कृषि वैज्ञानिक डाक्टर मथुरा राय बताते हैं कि झारखंड के बागबानी एवं कृषि वानिकी शोध कार्यक्रम ने लीची की स्वर्ण रूपा किस्म को झारखंड के लिए मुनासिब करार दिया है. यह छोटा नागपुर के पठारी इलाके के लिए बहुत ही मुनासिब है. इस किस्म की लीची के फल चटखन की समस्या से मुक्त होते हैं. इस के फलों का रंग गुलाबी होता है और आकार छोटा होता है. इस के फल काफी मीठे होते हैं.

लीची की 3 खास किस्में हैं शाही, चाइना और स्वर्ण रूपा. शाही लीची की सब से ज्यादा पसंद की जाने वाली किस्म है. इस के फल गोल और गहरे लाल रंग के होते हैं और फल में गूदे की मात्रा काफी ज्यादा होती है. इस किस्म के 15 से 20 साल के पेड़ से 80 से 100 किलोग्राम लीची के फल मिलते हैं. चाइना किस्म की लीची देर से पकती है और इस के पेड़ बौने होते हैं. इस के भी फल लाल और ज्यादा गूदे वाले होते हैं. इस का पूरी तरह से तैयार पेड़ 60 से 80 किलोग्राम लीची देता है. लीची के पेड़ को पूरी तरह से तैयार होने में 15-16 साल लग जाते हैं. शुरुआती दिनों में लीची के पौधों के बीच खाली पड़ी जमीन में दलहनी फसलें और सब्जियां लगा कर किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं. इस से मिट्टी की उर्वरा शक्ति का भी विकास हो जाता है. कृषि वैज्ञानिक डाक्टर विशाल नाथ बताते हैं कि नए शोधों से पता चला है कि लीची के बागों में पूरक पौधों के रूप में अमरूद, शरीफा और पपीते जैसे फलदार पेड़ भी लगाए जा सकते हैं. इन पौधों को लीची के 2 पौधों के बीच में 5×5 मीटर की दूरी पर लगा सकते हैं. 1 हेक्टेयर खेत में लीची के 100 पौधे और 300 पूरक पौधे लगाए जा सकते हैं. लीची अपनी मिठास और स्वाद की वजह भारत ही नहीं विदेशों में भी काफी मशहूर है. चीन के बाद लीची उत्पादन में भारत का ही नंबर है. इस की खेती के लिए खास जलवायु और मिट्टी की जरूरत होती है, इसलिए हर जगह इस की खेती नहीं हो सकती है. उत्तरी बिहार, देहरादून की घाटी, उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों और पश्चिम बंगाल, हरियाणा व पंजाब के कुछ इलाकों में भी इस की खेती की जा रही है. झारखंड के रांची और पूर्वी सिंहभूम में लीची की पैदावार तेजी से बढ़ रही है. लीची के जैम, और स्क्वैश की इंटरनेशनल मार्केट में खासी मांग है.                              

पथरीले इलाकों में

ऐसे पैदा करें लीची

* मंजर आने के 3 महीने पहले पौधों में सिंचाई न करें और उस के आसपास दूसरी फसलें न लगाएं.

* मंजर आने के 30 दिनों पहले पौधों पर जिंक सल्फेट (2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर) डालें और 15 दिनों बाद दूसरा छिड़काव करें. इस से मंजर और फूल अच्छे आते हैं.

* फल आते समय कीटनाशी दवाओं का छिड़काव न करें.

* लीची के बगीचे में मधुमक्खी के छत्ते रखने से लीची का शहद भी हासिल किया जा सकता है.

* फल लगने के 1 हफ्ते बाद प्लैनोफिक्स (2 मिली लीटर प्रति 4.8 लीटर) या एनएए (20 मिलीग्राम प्रति लीटर) का छिड़काव करने से फलों को झड़ने से बचाया जा सकता है.

फल लगने के 15 दिनों के बाद 15-15 दिनों के अंतराल पर बोरिक एसिड (4 ग्राम प्रति लीटर पानी) या बोरेक्स (5 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करने से फल कम झड़ते हैं और फलों की मिठास भी बढ़ती है.