शीला चलीं केरल
केरल वाकई खूबसूरत प्रदेश है. वहां नारियल के झूलते पेड़ हैं, अठखेलियां करती समुद्र की लहरें हैं और आकूत प्राकृतिक संपदा है. ऐसी और भी कई खूबियों के चलते दुनियाभर के पर्यटक वहां खिंचे चले जाते हैं.
शीला दीक्षित वहां खुद नहीं गई हैं, राज्यपाल बना कर भेजी गई हैं जिस से 5 साल सुकून से कभी समुद्र किनारे तो कभी राजभवन में बैठ कर चिंतनमनन कर पाएं कि 2003 से 2013 की सत्ता कैसे हाथ से छिन गई. करारी हार के बाद उन्हें कांग्रेस यानी सोनिया गांधी ने लाटसाहबी बख्शी है तो जाहिर है, इनाम है, सजा नहीं. कांग्रेस शीला दीक्षित को सूनी आंखों से कुरसी निहारते नहीं देखना चाहती. पटखनी तो अरविंद केजरीवाल ने ऐसी दी है जिस की कसक उन्हें जिंदगीभर रहेगी.
 
बाप रे बाप
नारायणदत्त तिवारी ने ठीक वैसे ही रोहित शेखर को बेटाबेटा कह कर गले लगा लिया जैसे प्रकाश मेहरा अभिनीत फिल्म लावारिस में अमजद खान ने अमिताभ बच्चन को लगाया था. अब एन डी तिवारी रोहित को नाम, दौलत और शोहरत सब देने को तैयार हैं. इसे बजाय हृदय परिवर्तन या पश्चात्ताप के मजबूरी कहना बेहतर होगा.
सुखांत हमेशा अच्छा होता है लेकिन इस से रोहित की संघर्षक्षमता भी उजागर हुई है. उस ने अदालती लड़ाई लड़ी पर हार नहीं मानी. इस खूबी का फायदा राजनीति में अगर वह आया तो वहां भी उसे मिलेगा. अब इस फिल्मी कहानी में दिलचस्पी इस बात भर की है कि क्या एन डी तिवारी उज्ज्वला शर्मा को भी पत्नी का दरजा देंगे?
 
दोहराने की चुनौती
चुनावी ढोलनगाड़े 16 मई तक गूंजते रहेंगे. इन के शोरशराबे के बीच आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी किसी राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी से कम दौरे नहीं कर रहे. उन के सामने दिल्ली के नतीजे दोहराने की चुनौती है.
आम मतदाता के नजरिए से देखें तो अब केजरीवाल परिपक्व हो रहे हैं. वे टुटपुंजिए और छुटभैये नेताओं के बजाय सीधे दोनों पार्टी के भावी प्रधानमंत्रियों– नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी पर प्रहार करते हैं, आचारसंहिता उल्लंघन के तो वे विशेषज्ञ होते जा रहे हैं और सियासी सौदेबाजी का बहीखाता भी समझने लगे हैं. दूसरी तरफ खासतौर से भाजपा अंदरूनी प्रचार यह कर रही है कि आप के पास न कार्यकर्ता हैं न संगठन, जो दिल्ली नहीं चला पाई वह देश क्या चलाएगी. अब वोटर की बारी है कि वह आप और अरविंद को ले कर क्या निष्कर्ष निकालता है.
 
एक और भगवा आइटम
धारावाहिक रामायण की सीता या सासबहू सीरियल की बहनजी छाप बहू होती तो जरूर भाजपा राखी सावंत को हाथोंहाथ ले लेती. बिंदास और उन्मुक्त राखी सावंत के आगे लोकप्रियता के मामले में दीपिका चिखलिया या स्मृति ईरानी कहीं नहीं ठहरतीं. भगवा खेमे में घबराहट उस वक्त मच गई जब खुद आइटम गर्ल राखी सावंत दिल्ली स्थित भाजपा के दफ्तर जा पहुंचीं. बकौल राखी सावंत, वे भाजपा की बेटी हैं और नरेंद्र मोदी की मुरीद हैं.
वे पहली अभिनेत्री हैं जिन का नाम कटाक्ष करने ही इसी राजनीति में सब से ज्यादा इस्तेमाल किया गया. उन की इमेज भगवा खेमे के उसूलों से मेल नहीं खाती, इसलिए राजनाथ सिंह ने चतुराई से उसे टरका दिया पर भूल यह गए कि यह वही बोल्ड लड़की है जिस ने रामदेव से शादी करने की अपनी ख्वाहिश छिपाई नहीं थी.