सरिता विशेष

सब्सिडी हमारे यहां अर्थव्यवस्था के लिए सब से खतरनाक शब्द बन गया है. यह अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डालती है और वास्तविक लोगों या जरूरतमंदों को इस का फायदा भी नहीं मिलता है.

सब्सिडी भी आरक्षण की व्यवस्था की तरह बन कर रह गई है जिस में दशकों से सरकार में मंत्री रहे लोगों के बच्चे भी नौकरियों आदि में दलित होने के नाते आरक्षण मांगते हैं.

यह आरक्षण की व्यवस्था का दुरुपयोग और मजाक है. ऐसा ही मजाक सब्सिडी के नाम पर होता है. गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी का फायदा सब उठा रहे हैं. हाल ही में एक सरकारी आंकड़ा आया जिस में कहा गया है कि आधार नंबर से जुड़ने के बाद करोड़ों राशनकार्ड फर्जी निकले.

इस का सीधा अर्थ है कि करोड़ों लोग गरीबों के राशन पर डाका डाल रहे थे. ऐसी ही हालत रसोई गैस सिलैंडर के बारे में है.

रसोई गैस पर सरकार सब्सिडी देती है और इस के तहत साल में 12 सिलैंडर एक उपभोक्ता को मिलते हैं. सब्सिडी का पैसा अब उपभोक्ताओं के खाते में जाता है. इस से पहले सब्सिडी के सिलैंडर होटलों, रैस्टोरैंट में चल रहे थे. सरकार अब सब्सिडी खत्म करने पर विचार कर रही है.

इस के लिए हर माह प्रति सिलैंडर 4 रुपए बढ़ाए जा रहे हैं और 1 साल में यह दर सामान्य सिलैंडर के स्तर पर पहुंच जाएगी. सरकार यह व्यवस्था पिछले साल से शुरू कर चुकी है.

सरकार का कहना है कि इस पैसे का इस्तेमाल उज्ज्वला योजना के तहत उन लोगों को गैस कनैक्शन देने में किया जाएगा जिन के पास गैस कनैक्शन नहीं हैं.

योजना अच्छी है और इस का फायदा गरीब को मिलेगा लेकिन वर्तमान में जो गरीब सब्सिडी का लाभ ले रहा है उस के लिए यह योजना दुखदायी बन जाएगी. दरअसल, सरकार को सब्सिडी खत्म करने के बजाय जरूरतमंद को ही इस का लाभ मिले, यह सुनिश्चित करना चाहिए.