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‘‘तो...’’

‘‘उस की बेटी को अपनी बहू बना लूं,’’ मेरी बात पर प्रतीक ने मु   झे देखा और हंस कर बोले, ‘‘वैसे, आइडिया अच्छा है, बात करें क्या?’’

‘‘ज्यादा बकवास मत करो, सुकठा कहीं का. मुंह देखा उस का. बेटी भी वैसी ही होगी,’’ मैं ने मुंह बनाया.

‘‘अरे, बाप रे, सास के तेवर तो अभी से    झलकने लगे तुम में,’’ प्रतीक की बात पर मु   झे जोर की हंसी आ गई.

‘‘हां, यह हुई न बात. हंसती रहा करो, अच्छी लगती हो,’’ बोल कर प्रतीक ने मु   झे अपने कंधे से सटा लिया. लेकिन मेरी हंसी तो उस नवीन को देखते ही गायब हो गई थी. सालों बाद उसे देख कर मेरे पुराने जख्म फिर से हरे हो गए. कुछ ही देर में प्रतीक खर्राटे भरने लगे और मैं खिड़की से बाहर देखते हुए यह सोचने लगी कि नवीन का दिया एकएक जख्म, मम्मीपापा और भैया का तिरस्कार कभी नहीं भूल सकती मैं.

विचारों की कड़ी मु   झे सुदूर अतीत में ले गई-

‘‘सुन, सुन, सुन दीदी, तेरे लिए एक रिश्ता आया है. सुन, सुन, सुन लड़के में क्या गुण. सुन, सुन, दीदी, सुन...’

सुलेखा की आंखों के सामने नवीन का फोटो लहराते हुए माला गाने लगी तो सुलेखा ने    झपट्टा मार कर वह तसवीर उस के हाथ से छीननी चाही, मगर माला दूर छिटक गई और बोली, ‘न-न दीदी, ऐसे थोड़े ही. इस के लिए पहले कुछ देना पड़ेगा. आप का वह सिल्क वाला दुपट्टा चाहिए मु   झे, तभी यह तसवीर मिलेगी, वरना मैं चली.’

‘अच्छाअच्छा चलो, दिया. अब तो फोटो दे दो,’ बोल कर मैं ने वह फोटो माला के हाथ से    झटक लिया और कमरे में जा कर बंद हो गई. माला कहती रही, ‘अरे दीदी, दरवाजा तो खोलो.’ पर मैं ने दरवाजा नहीं खोला. मेरा कलेजा जोरजोर से धड़क रहा था. ऐसा लग रहा था कि बाहर ही निकल आएगा. मैं जितनी बार भी नवीन की तसवीर देखती, आहें भरती. रातदिन मेरे जेहन में सिर्फ नवीन ही होता. सोतेजागते, उठतेबैठते, खातेपीते, बस, मैं उस के ही सपने देखा करती. उस से प्यारा इस दुनिया में और कोई नहीं था अब मेरे लिए. मेरा दिल बेकरार हुआ जा रहा था उस से मिलने को, बातें करने को. सोचती, जिस दिन मेरी नजर उसे देखेगी, जाने मेरा क्या हाल होगा. मेरी हालत पर भाभी और बहन मेरा मजाक उड़ातीं. उस का और मेरा नाम जोड़ कर हंसतीं और मैं    झूठा गुस्सा दिखाती पर मु   झे वह सब अच्छा लगता था. सच कहूं, तो मु   झे प्यार हो गया था नवीन से.

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