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“एक बात कहना चाहता हूं. आई होप, तुम मुझे गलत नहीं समझोगी,” एक दिन पिज्जा हट में बैठे हुए पिज्जा कुतरते हुए रोमेश ने इतना कहा तो रीतिका चौंकी. बेबाकी से हर बात कहने वाला इंसान आज अनुमति ले रहा था. यह सच था कि रोमेश का साथ उसे भाने लगा था और औपचारिकताएं की सीमा भी उन के बीच टूट चुकी थीं, इसलिए आप से तुम पर आ गए थे.

“बोलो ना, तुम कब से हिचकिचाने लगे?” रीतिका हंसी.

“तुम्हें ले कर एक लाइकिंग मन में हो गई है. आई नो यू आर मैरिड. एंड आई बिलीव हैप्पिली मैरिड. आई डोंट वांट एनी कमिटमैंट फ्रौम यू एंड प्लीज मुझ से दोस्ती मत तोड़ देना.”

रीतिका चुप रही. मिंट मौकटेल का सिप लेती रही.

“कुछ कहोगी नहीं?”

“क्या कहूं? कि आई ऑल्सो लाइक यू? बहुत बचकाना नहीं लगेगा क्या?” रोमेश उस की इस बात का जवाब देते, उस से पहले ही वह आगे बोल उठी, “अच्छा चलो, बचकाना लगने दो, मुझे भी तुम अच्छे लगते हो, इसीलिए मैं इस समय यहां बैठी हुई हूं, वरना केवल दोस्ती की डोर इतनी दूर तक नहीं खिंच पाती है.” और रीतिका ने रोमेश के हाथ पर अपना हाथ रख दिया. “पर प्लीज, इसे प्यार का नाम मत देना. बड़ी खतरनाक चीज है वह.” अपनी आगे झूल आई लट को पीछे धकलते हुए वह बोली.

“कोई नाम देना जरूरी तो नहीं हर रिश्ते को. एहसासों का समुद्र, बस, बहते रहना चाहिए बीच में. किसी बंधन की जरूरत नहीं,” रोमेश थोड़े पोएटिक हो गए थे.

समुद्र में कभीकभी उफान आ ही जाता है, फिर उन दोनों के बीच भी उफान आना स्वाभाविक ही था, क्योंकि दोनों एकदूसरे का साथ पाने को बेचैन रहते थे. दो दिन के लिए प्रो. विवेक शास्त्री दूसरे शहर में अपना नाटक मंचन करने गए थे. रीतिका एक रात रोमेश के घर ही रुक गई. रोमेश के स्पर्श से भीग जब वह लौटी तो मन में कोई ग्लानि नहीं थी उस के, पर एक डर था कि विवेक को पता लगा तो उन की जिंदगी में तूफान आ सकता है. जो सुख, जो पल विवेक उसे नहीं दे पाए थे, वे रोमेश के सान्निध्य ने दे दिए थे. वह हजारों बार खुद को समझा चुकी थी कि जिस्म की जरूरत क्या माने नहीं रखती...वह विवेक के प्रति पूरी तरह समर्पित है...फिर इस में गलत क्या है...

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