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लेखिका- दीपान्विता राय बनर्जी

घर उसे मुरगीखाने से कुछ कम नहीं लगता था, तिस पर पापा और दुर्बा तो किसी जेलर की तरह हर वक्त हमला बोले रहते. दिनभर सीखों और उलाहनों की बरसात. ऐसा लगता जैसे कोई कीचड़ फेंक कर मार रहा हो. पूर्बा न  झगड़ा करती थी और न ही उन पर उस की कुछ बोलने की ही इच्छा होती, बस ये लोग इस की नजर में न आएं उस की इतनी भर तो इच्छा थी जो पूरी नहीं हो सकती थी. मां की तो पापा के सामने कोई आवाज ही नहीं थी और भाई अंशुल उसे बस ‘दीदी मौडल बनवा दो’, ‘फलाने से एक बार मेरी बात करवा दो’, ‘दीदी एक जींस दिलवा देना,’ ‘दीदी मु झ पर कौन सा हेयर कट सूट करेगा’, ‘जरा इन गूगल की तसवीरों को देख कर बताना.’

यद्यपि भाई को हाथ में रखने के लिए उसे सब्जबाग दिखाना पड़ता, लेकिन पूर्बा जानती थी कि उसे कितना संघर्ष करना पड़ रहा है अपने बड़े सपनों को सच करने में, तो क्या वह भाई के लिए कुछ कर पाएगी.

आज के इस मौडर्न जमाने में पापा जैसे मीडियोकर लोग दो पैसे के लिए घर

को अशांति का अखाड़ा बनाए रहते हैं, उन्हें आगे बढ़ने, सपनों का पीछा करने से कोई मतलब नहीं है. बस हमेशा आटेदाल का भाव ही गिनते रह जाएंगे. दुर्बा भी तो वैसी है. पूर्बा इतनी करीबी और तंगहाली में नहीं जी सकती. उसे लाट साहेबी ही पसंद है, चाहे ये लोग कितना ही उस का मजाक बनाएं.

इन दिनों पूर्बा धूप में रंग उड़े खाली टीन के डब्बे की तरह हो गई है. ऊपर से पीटो तो ढेर सारी निरर्थक आवाजें, अजूबा बातें ही उस का सहारा थीं इन दिनों, ‘‘बस कुछ दिन और देखना अमुक अभिनेता, अमुक राजनेता, अमुक सैलिब्रिटी मु झे अपने पास बुला लेंगे. मैं अब कुछ दिन में ही मैनेजर बन जाने वाली हूं. फिर छोटे से कमरे में चिकचिक करने वाली बहन के साथ मु झे कैद नहीं रहना होगा. फ्लैट का सार सामान ले कर मैं उस से बड़े फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊंगी,’’ अनर्गल, अविराम वह खुद को तसल्ली देती रहती.

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