Hindi Stories: मध्यवर्गीय भारतीय की जिंदगी में लोन और ईएमआई का वही स्थान है जो संतफकीर के लिए दोहे व अमृतवाणी और नेताओं के लिए जुमले. फर्क बस इतना है कि दोहे शिक्षा और शांति देते हैं, नेताओं के जुमले समर्थकों को तात्कालिक सुकून दे देते हैं, जबकि ईएमआई कर्जदार के जीवन में स्थायी तनाव और बेचैनी भर देती है.
सांसारिक जीवन के चक्र में मनुष्य को लव और लोन दोनों के मायाजाल से हो कर गुजरना ही पड़ता है. लव के चक्कर में फंसे चेहरे पर मुसकराहट आती है जबकि लोन के चक्र में फंसे चेहरे से ईएमआई हर महीने औटोडैबिट के साथ मुसकराहट काट लेती है. सरकारी बाबू यह मान कर चलता है कि वह नौकरी कर रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि उस की नौकरी, घर, कार, सब ईएमआई की निष्ठापूर्ण सेवा में लगे हैं. वेतन मिलते ही बैंक का व्यवहार बिलकुल उस कुटिल सास जैसा हो जाता है जो मायके से सीमित दहेज और उपहार ले कर आई बहू के प्रति होता है.
उपभोक्ता का मोबाइल भी इस गठजोड़ में शामिल हो चुका है. हर महीने के आखिरी सप्ताह से ले कर अगले महीने की 10 तारीख तक तरहतरह के संदेश आने लगते हैं, ‘प्रिय ग्राहक, आप की ईएमआई की नियत तिथि निकट है. कृपया समय पर भुगतान करें. यदि कर दिया है तो इस संदेश को नजरअंदाज करें. देरी पर ब्याज बढ़ सकता है.’ जागरूकता के नाम पर बैंक द्वारा कर्जदार होने का स्मरण दिलाना भी किसी सूदखोर साहूकार की चेतावनी जैसा ही लगता है.
कर्जदार सोचता है कि जिस बैंक ने कभी लोन देने के लिए फोन पर मित्रवत अंदाज में मनुहार की थी वही बैंक अब पड़ोसी मुल्क की तरह सख्ती दिखाते हुए धमकाने लगा है. बैंकों की सक्रियता ऐसी है कि शायद वह दिन भी दूर नहीं जब शुभ दीपावली की जगह उपभोक्ताओं को शुभ ईएमआई दिवस के संदेश मिलने लगें.
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