सरिता, बीस साल पहले, जून (द्वितीय) 2006
Hindi Story: वैसे तो कशिश को मम्मी की सभी सहेलियां पसंद थीं लेकिन मधुलिका आंटी की बात कुछ अलग थी. यद्यपि आते ही गले मिलने और हालचाल पूछने के बाद वे एक तरह से कशिश की ओर से तटस्थ हो जाती थीं फिर भी जब तक वे घर में रहती थीं उसे पूरे घर में जैसे अपनेपन की ऊष्मता महसूस होती थी.
मम्मीपापा अचानक ही देहरादून छोड़ कर दिल्ली आ बसे. यहां का स्कूल और सहेलियां कशिश को बहुत पसंद आईं. देहरादून पिछली कक्षा की किताबों की तरह पीछे छूट गया. बस, मधुलिका आंटी की याद गाहेबगाहे आ जाती थी.
‘‘देहरादून से सभी लोग आप से मिलने आते हैं. बस, मधुलिका आंटी नहीं आतीं,’’ मम्मी से कशिश ने एक रोज हसरत से कहा.
‘‘मधुलिका आंटी डाक्टर हैं और देवेन अंकल वकील. दोनों ही अपनी प्रैक्टिस छोड़़ कर कैसे आ सकते हैं?’’ मम्मी ने बताया.
मम्मी और भी कुछ कहना चाह रही थीं लेकिन उस से पहले ही पापा ने कशिश को पानी पिलाने को कहा. वह पानी ले कर आई तो सुना कि पापा कह रहे थे, ‘कशिश की यह बात तुम मधु को कभी मत बताना.’
कशिश को समझ में नहीं आया कि इस में न बताने वाली क्या बात थी. जल्दी ही उम्र का वह दौर शुरू हो गया जिस में किसी को खुद की ही खबर नहीं रहती तो मधु आंटी को कौन याद करता. मम्मीपापा न जाने कैसे उस के मन की बात सम?ा लेते थे और उस के कुछ कहने से पहले ही उस की मनपसंद चीज उसे मिल जाती थी. उस की सहेलियां उस की तकदीर से रश्क किया करतीं. कशिश का मैडिकल कालेज में अंतिम वर्ष था. मम्मीपापा दोनों चाहते थे कि वह अच्छे नंबरों से पास हो. वह भी जीजान से पढ़ाई में जुटी हुई थी कि दादी के मरने की खबर मिली.
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