Daayra Film Review: देश की लचर कानून व्यवस्था में न्याय एक धीमा प्रोसैस है. कई बार कुछ मामलों में वर्षों लग जाते हैं. हालांकि, जनता को 'इंस्टेंट न्याय' चाहिए होता है. जब जनता की यह मांग राजनीतिक या सामाजिक दबाव से होते हुए पुलिस की बंदूक से निकलती है, तो उसे 'एनकाउंटर' कहा जाता है. मेघना गुलजार की फिल्म 'दायरा' इसी विवादित मुद्दे पर सवाल पूछती है.
फिल्म की कहानी 2019 के हैदराबाद गैंगरेप और उस के बाद हुए चर्चित पुलिस एनकाउंटर से प्रेरित लगती है. जहां एक लड़की के साथ निर्भया जैसा मामला होता है. दर्शकों के लिए दिलचस्प यह है कि फिल्म एक जघन्य अपराध के पुलिस इन्वैस्टिगेशन को इन्वैस्टिगेट करती है.
फिल्म वहां से शुरू होती है जब डीसीपी रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) अपनी टीम के साथ गैंगरेप के 4 आरोपियों को एक तथाकथित मुठभेड़ में ढेर कर देते हैं और शहर में इस एनकाउंटर को ले कर जश्न चल रहा होता है. वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार आयोग के दबाव में एसआईटी की टीम गठित होती है जिस का काम यह पता लगाना होता है कि यह फर्जी एनकाउंटर तो नहीं था.
इस टीम को हेड इंटरनल विजिलैंस औफिसर डीसीपी अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) कर रही होती है. एक तरफ वह पुलिसवाला है जो तुरंत न्याय देने के लिए कानून तोड़ने से नहीं हिचकता. दूसरी तरफ वह अफसर है जो मानती है कि कानून को अपनी प्रक्रिया खुद पूरी करनी चाहिए. अजूनी अपनी स्पैशल इन्वैस्टिगेशन के दौरान हर पहलू की जांच करती है और एनकाउंटर में शामिल सभी सुबूतों को खंगालती है. इस बीच उसे आभास हो जाता है कि एनकाउंटर फेक है. हालांकि, फिल्म का क्लाइमैक्स अधूरा छोड़ दिया गया है. संभव है कि ऐसा दर्शकों के विवेक के लिए छोड़ा गया हो.
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