उसदिन सुबह की पहली किरण एक नए सुनहरे इंद्रधनुष को ले कर आई. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिसे आज जिले के सर्वश्रेष्ठ होनहार बालक के सम्मान से नवाजा जा रहा है यह वही अर्पण है. मुझे याद आ रही थीं क्लास की बातें.

‘‘मैम, इस ने फिर मुझे मारा.’’

‘‘मैं ने कुछ नहीं किया,’’ अर्पण के उत्तर में गुस्सा साफ झलक रहा था.

‘‘आप और बच्चों से पूछ लीजिए मैम और यह कागज का गोला देखिए, मेरी आंख पर लगा है.’’

‘‘नहीं, तुम झूठ बोल रहे हो,’’ अर्पण का फिर इनकार भरा स्वर गूंजा.

मैं इस क्लास की क्लास टीचर हूं. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि सच क्या है. मुझे रोज किसी न किसी मामले में बच्चों का जज बनना पड़ता था और अर्पण मेरे लिए एक पहेली बना हुआ था. मुझे कभीकभी अर्पण की कही बात ही सच लगती, तो बच्चों के इलजाम और गवाही सब उस के प्रतिकूल निर्णय देते नजर आते. आज भी यही हुआ था. मैं मनोविज्ञान की छात्रा रही हूं, लेकिन इस बालक के सामने हारने लगी थी. कक्षा में प्यार से समझाने से अर्पण चुप रहता पर बुद्धि इतनी तेज कि जो एक बार सुन लिया उसे पूछने पर तोते की तरह सुना देता. टिक कर बैठना शायद इस की डिक्शनरी में ही नहीं था. लेकिन कोई काम कहो तो शतप्रतिशत खरा उतरता और पूरा कर के ही दम लेता. पेपर मिलते ही 10 मिनट में उत्तर पुस्तिका दे देता, तो मैं हैरान रह जाती उस की स्पीड देख कर. जितना आता उसे कंप्यूटर प्रिंट की तरह फटाफट कागज पर उतार देता और बाकी समय पूरे स्कूल में घूमता रहता. इस के लिए नियम तो जैसे तोड़ने के लिए ही बने थे. किसी होस्टल से इसी साल यह इस विद्यालय में आया है. पिछले 2 साल इस ने होस्टल में ही काटे थे. मैं सोचती रहती हूं कि यह वहां कैसे रहा होगा? वहां के नियमों ने इसे ऐसा बना दिया या फिर अब खुली हवा में उड़ना सीख रहा है?

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