कहीं दूर रेडियो बज रहा था. हवा की लहरों पर तैरती ध्वनि शेखर के कानों में पड़ी.

मन रे, तन कागद का पुतला,

लागै, बूंद बिनसि जाइ छिन में,

गरब करै क्यों इतना.

शेखर पहचान गया कि यह कबीरदास का भजन है. जीवन की क्षणभंगुरता को जतला रहा है. कौन नहीं जानता कि जीवन के हासविलास, रागरंग और उल्लास का समापन अंतिम यात्रा के रूप में होता है, फिर भी मनुष्य का पागल मन सांसारिक सुखों के लिए भटकना नहीं छोड़ता.

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