कहीं दूर रेडियो बज रहा था. हवा की लहरों पर तैरती ध्वनि शेखर के कानों में पड़ी.

मन रे, तन कागद का पुतला,

लागै, बूंद बिनसि जाइ छिन में,

गरब करै क्यों इतना.

शेखर पहचान गया कि यह कबीरदास का भजन है. जीवन की क्षणभंगुरता को जतला रहा है. कौन नहीं जानता कि जीवन के हासविलास, रागरंग और उल्लास का समापन अंतिम यात्रा के रूप में होता है, फिर भी मनुष्य का पागल मन सांसारिक सुखों के लिए भटकना नहीं छोड़ता.

कुछ मिल गया तो खुशी से बौरा जाता है. कुछ छिन गया तो पीड़ा से सिसक उठता है.

यही पुरानी कहानी हर बार नई हो कर हर जिंदगी में दोहराई जाती है. उस का खुद का जीवन इस का एक उदाहरण है.

ऊंची नौकरी, नंदिता के साथ विवाह और निधि का जन्म. ये जीवन के वे सुख हैं जिन्हें पा कर वह खुशी से बौरा उठा था. फिर एक दुर्घटना में सदा के लिए अपाहिज हो जाना, नौकरी छूटना और बेटी को साथ ले कर पत्नी का घर छोड़ जाना वे दुख हैं जिन्होंने दर्द की तीखी लहर उस के सर्वांग में दौड़ा दी.

अनायास ही शेखर की आंखों में दो बूंद आंसू झिलमिला उठे. जब से तन जर्जर हुआ है, मन भी न जाने क्यों बेहद दुर्बल हो गया है. तनिक सी बात पर आंखें भर आती हैं. यह सच है कि पुरुष की आंखों में आंसू अच्छे नहीं लगते लेकिन क्या किया जाए.

जिस का सब कुछ लुट गया है, ब्याहता पत्नी तक ने जिसे छोड़ दिया है, उस एकाकी पुरुष की वेदना नारी की प्रसव पीड़ा से कम भयंकर नहीं. वह तो कहो कि अम्मां जिंदा थीं वरना...

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