सुधीर सोच रहा था मां क्या सोचेंगी जब बैंक के संयुक्त खाते में उन्हें 50 हजार रुपयों की जगह केवल 400 रुपए मिलेंगे. शायद उन्हें इस बात का आभास हो जाएगा कि फर्ज की जिस किताब पर सुधीर नोटों का कवर चढ़ाता आ रहा था, उस कवर को शायद उस ने हमेशा के लिए फाड़ कर फेंक दिया है. सब लोग खर्राटे ले रहे थे लेकिन सुधीर की आंखों में नींद नहीं थी. न जाने अपने जीवन की कितनी रातें उस ने बिना सोए ही बिताई थीं अपने घर वालों के बारे में सोचतेसोचते.

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