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माधुरी और उस के पूरे ग्रुप का आज धनोल्टी घूमने का प्रोग्राम था. माधुरी ने सारी तैयारी कर ली थी. एक छोटी सी मैडिसिन किट भी बना ली थी. तभी कुमुद चुटकी काटते हुए बोली, “मधु, 2 ही दिनों के लिए जा रहे हैं.” और विनोद हंसते हुए बोला, “भई, माधुरी को मत रोको कोई, पूरे 10 वर्षों बाद कहीं जा रही हैं. कर लेने दो उसे अपने मन की.” तभी जयति और इंद्रवेश अंदर आए, दोनों गुस्से से लाल पीले हो रहे थे.

विनोद बोले, “क्या फिर से प्रिंसिपल से लड़ कर आ रहे हो?” जयति गुस्से में बोली, “वो क्या हमें अपना गुलाम समझते हैं, क्या छुट्टियों पर भी हमारा हक नही हैं?” कुमुद तभी दोनों को चाय के कप पकड़ाते हुए बोली, “अरे, विजय समझा देगा. अभी वह टैक्सी की बात करने गया है.”

माधुरी को अपना यह ग्रुप बड़ा भला लगता था. कहने को किसी के साथ खून का रिश्ता नहीं था मगर 2 ही सालों में सभी लोग माधुरी के लिए अपनों से भी अधिक अजीज हो गए थे. माधुरी 56 वर्ष की थी, कुमुद 52 वर्ष की, वहीं विनोद था 63 वर्ष का. मगर पूरे ग्रुप में सब से एनरजेटिक सदस्य थे विजय जो 50 की लपेट में था. वहीं, जयति और इंद्रवेश 32 वर्ष के थे. ये सभी लोग देहरादून के एक रैजिडेंशियल स्कूल में कार्य करते हैं. सभी अपनी जीवनयात्रा में अकेले ही चल रहे थे और धीरेधीरे 2 वर्षों के भीतर सब एक ही राह पर चलने लगे थे.

विनोद का इस स्कूल से बहुत पुराना रिश्ता था. वे 30 वर्षों से इस स्कूल से जुड़े हुए थे. उन के दोनो बच्चे यहीं पढ़े और काबिल बने. विनोद की पत्नी की मृत्यु भी यहीं हुई थी. जब विनोद 60 वर्ष के हुए तो उन्हें पूरी उम्मीद थी कि उन के बच्चे उन्हें अब काम करने नहीं देंगे. मगर विनोद प्रतीक्षा करते रहे और फिर स्वेच्छा से उन्होंने इसी स्कूल में वार्डन की सेवा देनी आरंभ कर दी थी. जब कभी छुट्टियां होती तो विनोद बेहद उदास हो उठते थे. उन के पास कहने के लिए घर था मगर अपना घर नहीं था. जब कभी छुट्टियों में जाते तो बच्चों के कमरे में उन्हें एडजस्ट कर दिया जाता था. दोनों ही बच्चों के घर में उन के लिए कोई कोना सुरक्षित नहीं था.

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