अखिल भारतीय फुटबौल संघ यानी एआईएफएफ के अध्यक्ष पद पर पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल के चुनाव को दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया. एआईएफएफ के चुनाव में प्रफुल्ल पटेल को तीसरी बार अध्यक्ष बनाया गया था.

अदालत ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि एआईएफएफ ने चुनाव प्रक्रिया में राष्ट्रीय खेल संहिता का पालन नहीं किया था. दरअसल, खेल संघों की आचार संहिता में दर्ज नियमों में यह शर्त है कि इस में कोई भी पदाधिकारी एक पद 4-4 साल के 2 कार्यकाल बिताने के बाद उसी संघ में अगले 4 साल तक कोई भी चुनाव किसी पद के लिए नहीं लड़ सकता.

सवाल उठता है कि जब ऐसी बात थी तो एआईएफएफ के पदाधिकारियों को क्या नियमकायदे नहीं मालूम थे या फिर पैसों के खेल में सबकुछ भूल गए थे.

यह कोई नई बात नहीं है जब नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हों. ऐसा पहले से ही होता आया है क्योंकि खेल संघों में राजनेताओं, नौकरशाहों और कारोबारियों का कब्जा हमेशा से रहा है. यह केंद्रीय स्तर से ले कर राज्यों तक में होता है.

खेल संघों की जिम्मेदारी खेलों को बढ़ावा देना, खिलाडि़यों को निखारना, उन्हें बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना, खेल प्रतिभाओं की तलाश करना आदि होता है. पर यहां क्या हो रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है. राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम खेल में क्रिकेट को छोड़ कर कहां हैं, यह सभी जानते हैं.

यह हमेशा से कहा जा रहा है कि खेल संघों में उच्च पदों पर खेल से संबंधित लोग होने चाहिए पर संघों में तो पैसे वाले और पावर वाले ही कुंडली मार कर बैठे हुए हैं जिन को खेल से कोई लेनादेना नहीं है. पैसों के लालची लोगों ने खेल का बेड़ा गर्क कर रखा है.

खेल संघों में राजनीति इतनी हो गई है कि वहां खेल का भला हो ही नहीं सकता. अदालत ने भी यह बात कह दी है कि खेल को राजनीति से दूर रखा जाए पर खेल संघों में बैठे लोग इतने अडि़यल हैं कि सबकुछ अनसुना कर देते हैं क्योंकि उन के पास पैसा और पावर दोनों हैं. और इस देश में जिस के पास पैसा और पावर हैं उस की चलती खूब है क्योंकि वे चलाने वालों को अपनी जेब में रखते हैं.

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