Unemployment Problem: सुमित नीमच की एक गारमैंट फैक्ट्री में कई वर्षों से काम कर रहा था. उस की मेहनत और लगन को देख कर 4 साल पहले फैक्ट्री के मालिक ने उस को मैनेजर बना दिया. सैलरी अच्छी थी. घर में बीवी और 2 बच्चों के अलावा गांव में बूढ़ी मां और छोटा भाई था. गांव में उस का एक मकान और कुछ जमीन थी, जिस की देखभाल मां और भाई करते थे. कुल मिला कर सब का खर्चा ठीकठाक चल रहा था. सुमित कुछ पैसे हर महीने मां को भी भेजता था. उस के बच्चे भी एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ रहे थे जहां फीस कुछ ज्यादा थी. मगर सुमित उस भार को भी अच्छी तरह उठा लेता था. मालिक की खास मेहरबानी उस पर थी तो फीस की चिंता उसे कभी नहीं हुई.

वर्ष 2025-26 में अमेरिका के टैरिफों और बाद में अमेरिका-ईरान लड़ाई की वजह से फैक्ट्री बंद हो गई और उस में काम करने वाले कोई 300 से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए. कंपनी के भारी नुकसान ने सुमित को जैसे अनाथ कर दिया. कई दिनों तक वह बदहवासी की सी हालत में रहा. उस दौरान बहुत सारी फैक्ट्रियां बंद हुई थीं, सुमित को कहीं और काम नहीं मिला. आय रुक गई. एक साल तो अपनी बचत के पैसे से सुमित ने किसी तरह बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया पर उस के बाद उस को उन का दाखिला सरकारी स्कूल में करवाना पड़ा.

अन्य बहुत सारे खर्चे भी उस ने रोक दिए, यहां तक कि मां को भी पैसा भेजना उस ने बंद कर दिया. बदहवासी का आलम यह कि वह नौकरी के लिए दरगाहों, मजारों और मंदिरों के चक्कर काटने लगा. वहां मन्नतें मांगी, चढ़ावे चढ़ाए, गंडेतावीज भी बंधवा लिए मगर नौकरी नहीं मिली. ऊपर से इन पाखंडों पर और खर्च हो गया क्योंकि हर जगह दान मांगा जाता, आनेजाने का खर्च अलग.

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