Algorithm and Religion: आजकल कोई फेसबुक पर घंटों लगा रहता है तो कोई यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लौंग या शौर्ट वीडियो में जिंदगी के बेशकीमती घंटे गंवा रहा है. सोशल मीडिया पर घंटों स्क्रौल करने वाले लोगों को लगता है कि वे मुफ्त इंटरनैट का मजा ले रहे हैं जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है. सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति अपनी मरजी से अपना कीमती वक्त बरबाद नहीं कर रहा है बल्कि इस के पीछे एल्गोरिदम का एक ऐसा खतरनाक और छिपा षड्यंत्र काम करता है कि जिस के बारे में ज्यादातर लोगों को अंदाजा भी नहीं. सवाल यह है कि एल्गोरिदम के नाम पर यह ब्रेन हाईजैकिंग का गंदा खेल तो नहीं है?

सोशल मीडिया का एल्गोरिदम एक तरह की मानसिक गुलामी का हथियार है. आम आदमी उन विचारों का शिकार बनता है जिन की उसे जरूरत ही नहीं. यह बिलकुल धर्म के एल्गोरिदम जैसा है. धर्म ने भी विरोधी विचारों को कंट्रोल किया और आज एल्गोरिदम भी यही कर रहा है. वर्ष 2012 के फेसबुक एक्सपैरिमैंट में यूजर्स की फीड से पौजिटिव या नैगेटिव पोस्ट हटा कर उन का मूड बदला गया था.

यूजर्स को पता भी नहीं चला कि विकल्प हटाया गया है. आगे आप पढ़ेंगे कि कैसे इस एक्सपैरिमैंट से यह साबित हुआ कि एल्गोरिदम से लोगों की बुद्धि कंट्रोल की जा सकती है. धर्म ने भी विरोधी विचारों को कंट्रोल किया और आज एल्गोरिदम भी यही कर रहा है. एल्गोरिदम के नाम पर ब्रेन हाईजैकिंग का गंदा खेल खेला जा रहा है. न सोशल मीडिया आजाद है और न वह यूजर्स को आजादी दे रहा.

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