Supreme Court Verdict: भारतीय समाज औरतों को घर की मालकिन कहता है और इस मालकिन को घरेलू नौकर बना कर उस की मेहनत पर डाका डालता है. यह दोगलापन सदियों से जारी है हालांकि कंस्टीट्यूशन ने औरतों को बराबरी का दर्जा दे रखा है लेकिन बिना वेतन के घरेलू गुलामी आज भी जारी है. एक मर्द बाहर कमाने जाता है. औरत घर में रह कर मर्द से कहीं ज्यादा काम करती है. मर्द हर माह तनख्वाह ले कर आता है तो उसे कमाने वाला पूत मान लिया जाता हैं वहीं औरत बिना छुट्टी और बिना वेतन के लगातार पूरे माह काम करती है तो उसे मेहनताना तो दूर, श्रेय तक नहीं दिया जाता. इसी मानसिकता को सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने चुनौती दी है और औरत के घरेलू काम की कीमत तय कर दी है जो औरतों के हक में एक क्रांतिकारी फैसला है.
सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून 2026 को एक बहुत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. इस फैसले में कोर्ट ने कहा कि घरेलू महिलाएं, होममेकर या गृहिणियां असल में राष्ट्र की निर्माता हैं. उन का घर संभालने के काम की भी कीमत है और यह कीमत कम से कम 30 हजार रुपए प्रति महीना तो बनती ही है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हरियाणा के एक पुराने सड़क हादसे के मामले में आया. साल 2001 में रेशमा नाम की एक घरेलू महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उन के परिवार ने मोटर एक्सीडैंट क्लेम ट्रिब्यूनल में मुआवजे की मांग की. लंबे समय तक केस चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में यह नया सिद्धांत बनाया.
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