Women’s Freedom: आज की दुनिया में युवतियां परंपराओं के साथ नहीं, एजुकेशन के साथ खड़ी हैं जिस से पितृसत्ता की पुरानी बंदिशें टूट रही हैं. आज की शिक्षित औरतें कैरियर के जरिए अपना समय बदल रही हैं. अपनी काबिलीयत और मेहनत के दम पर वे हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और गुलामी के बंधनों को तोड़ रही हैं लेकिन फिर भी, पितृसत्ता की कुछ जंजीरें औरतों के पैरों में कस कर बंधी हुई हैं जिन्हें तोड़े बिना पैट्रियार्की पूरी तरह खत्म नहीं होगी.

मां बनने का गुण नेचर ने औरतों को दिया है लेकिन इस नैचुरल गुण की वजह से ही औरत हर युग में और हर समाज में मर्दों की निजी संपत्ति बनी रही. समाज कहता है कि औरत मां बनने के बाद ही पूर्ण होती है लेकिन क्या यह पूर्णता वाकई आजादी है या सिर्फ गुलामी का एक तरीका?

इस समस्या का हल एंटीनाटालिज्म की विचारधारा में है. यह संतान न पैदा करने की दार्शनिक और सामाजिक विचारधारा है. यह धर्म से जुड़ी पितृसत्ता की गुलामी को तोड़ने का सब से तर्कसंगत और सब से क्रांतिकारी रास्ता है. एंटीनाटालिज्म कोई नकारात्मक विचार नहीं बल्कि औरतों को उन के शरीर, समय, सपनों और जीवन पर खुद के कंट्रोल का एक नायाब उपाय है. यह न भूलें कि पितृसत्ता धार्मिक रीतिरिवाजों, प्रवचनों, परंपराओं के माध्यम से थोपी जाती है. हर गांव, कसबा, शहर के महल्ले में चारपांच पंडितों का काम यही होता है कि वे घरघर की पूरी जानकारी रखें और घर में भी कोई युवक अपनी युवा पत्नी को कंट्रोल नहीं करता तो उसे बाहर बारबार बीवी का गुलाम कह कर बदनाम किया जाता है.

दार्शनिक डेविड बेनातार ने अपनी किताब ‘बेटर नेवर टू हैव बीन’ में एंटीनाटालिज्म को सम?ाया है. वे कहते हैं, ‘‘जीवन में दुख का बो?ा सुख से कहीं ज्यादा है, इसलिए नया जीवन पैदा करना नैतिक रूप से गलत है. एंटीनाटालिज्म महिलाओं की मुक्ति का रास्ता है. इस से समाज महिलाओं को सिर्फ बच्चे पैदा करने वाली मशीन की नजर से नहीं देखेगा.’’

रैडिकल फैमिनिस्ट शुलामिथ फायरस्टोन ने अपनी किताब ‘द डायलिक्टिक औफ सैक्स’ में लिखा है- ‘‘गर्भावस्था बर्बर है. यह औरतों की दासता की जड़ है. जब तक औरत को गर्भ धारण करने, 9 महीने दर्द सहने और फिर आजीवन पालनपोषण का बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जाएगा तब तक उस की आजादी अधूरी रहेगी.’’

एंटीनाटालिज्म का कौन्सैप्ट कितना व्यावहारिक

आज जब कौंट्रासैप्शन और गर्भपात जैसे उपायों से चाइल्डफ्री जीवन आसान हो गया है तो एंटीनाटालिज्म का कौन्सैप्ट व्यावहारिक नजर आने लगा है. इस का सब से बड़ा फायदा औरतों को मिलेगा क्योंकि भारत में औरतें बच्चा पैदा करने के बाद ज्यादा बंध जाती रही हैं और उन के सपने पीछे छूट जाते रहे हैं. 2025 के टाइम यूज सर्वे के अनुसार, औरतें रोजाना 289 मिनट घरेलू काम और 137 मिनट बच्चों की देखभाल पर बिताती हैं जबकि पुरुष सिर्फ 88 और 75 मिनट ही यह काम करते हैं, यानी, महिलाएं पुरुषों से 8 गुना ज्यादा अनपेड केयर वर्क करती हैं.

विश्व बैंक की रिपोर्ट और हरियाणा के अशोक विश्वविद्यालय के अध्ययन बताते हैं कि बच्चे के जन्म के बाद 73 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं. उन में से 48 फीसदी फिर कभी वापस नहीं लौट पातीं. यह मदरहुड पेनल्टी इतनी भारी है कि बच्चा पैदा होने के बाद औरतों की नौकरी में हिस्सेदारी तेजी से गिर जाती है खासकर एससी/एसटी, मुसलिम और ओबीसी की महिलाएं मातृत्व का खमियाजा ज्यादा भुगतती हैं.

प्रैग्नैंसी के शारीरिक खतरे तो अलग हैं. बच्चा पैदा करते वक्त मौत का खतरा औरत को ही झेलना पड़ता है. प्रैग्नैंसी के दौरान औरतों की मौत के मामले में आज भी भारत सब से आगे है. पोस्ट प्रैग्नैंसी डिप्रैशन से मैंटल हैल्थ पर असर पड़ता है और कैरियर ब्रेक से आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. एक औरत जो डाक्टर, इंजीनियर, टीचर या बिजनैस वुमन बनना चाहती है उसे अचानक मां बना दिया जाता है और समाज का रुख यह होता है कि कैरियर या बच्चा दोनों नहीं चलेंगे.

एंटीनाटालिज्म कहता है दोनों की जरूरत ही क्यों? अपना शरीर, अपना समय, अपना पैसा, अपना सपना सबकुछ सिर्फ अपने लिए होना चाहिए. औरत मर्दों के लिए बच्चा पैदा क्यों करें?

औरत सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन क्यों बने

अब सवाल यह है कि समाज को तो बच्चे चाहिए वरना मानवता खत्म हो जाएगी लेकिन इस बात की ठेकेदारी औरत के सिर पर ही क्यों? एंटीनाटालिज्म पर्सनल चौइस का मामला है जो औरत बच्चे चाहे पैदा करे लेकिन जो नहीं चाहती उसे कोई अपराधबोध या सामाजिक दबाव क्यों ?ोलना पड़े? आज जब दुनिया जनसंख्या विस्फोट, जलवायु संकट और संसाधन की कमी से जू?ा रही है तब मरजी से चाइल्डफ्री होना पर्यावरण और भावी पीढि़यों के लिए जरूरी कदम है. इस का सब से बड़ा फायदा औरत को मिलता है. औरत को मां की पहचान से पहले इंसान के रूप में देखा जाना चाहिए, यही एंटीनाटालिज्म की अवधारणा का सच है.

एंटीनाटालिज्म औरत को सिर्फ शारीरिक मुक्ति नहीं देता बल्कि मानसिक और आर्थिक आजादी भी देता है. वह बिना किसी मदरहुड गिल्ट के जी सकती है, पढ़ सकती है, घूम सकती है, बिजनैस शुरू कर सकती है, रिश्तों का आनंद ले सकती है और अंतिम सांस तक खुद की मालिक बनी रह सकती है. दुनिया के जिस समाज में औरत पर बच्चा पैदा करने का दबाव होता है वहां औरतें गुलाम होती हैं और जो समाज कहता है बच्चा पैदा करना या न करना तुम्हारा फैसला, वह समाज औरतों को आजादी और बराबरी से जीने का हक देता है.

एंटीनाटालिज्म कोई फैशन नहीं है. यह औरतों की आजादी का सब से क्रांतिकारी रास्ता है. औरत के गर्भ पर अधिकार दूसरों का क्यों? औरत न कहना सीख ले तो न धर्म, न समाज, न परिवार और न ही परंपराएं उसे गर्भधारण करने पर मजबूर कर सकती हैं. जब हर औरत यह फैसला अपने विवेक से लेगी तब ही सही माने में समानता आएगी. औरत को मां बनने की जरूरत नहीं बल्कि आजादी, सम्मान और बराबरी से जीने की जरूरत है.

नई पीढ़ी एंटीनाटालिज्म के फायदे को समझने लगी है

दुनियाभर में नई पीढ़ी में बच्चे पैदा न करने का ट्रैंड तेजी से बढ़ रहा है. यही कारण है कि 1960 में दुनिया की टोटल फर्टिलिटी रेट 5 बच्चे प्रति महिला थी, अब घट कर 2024 में 2.2 रह गई है और आगे भी गिरने का अनुमान है. कई देशों में यह रेट 2 से नीचे चला गया है. संयुक्त राष्ट्र और प्यूव रिसर्च के आंकड़ों को देखें तो भारत और चीन जैसे बड़े देशों में भी यह गिरावट जारी है और दुनिया की टोटल फर्टिलिटी रेट में आई यह गिरावट औरतों की शिक्षा और नौकरी में भागीदारी के कारण आई है.

भारत की बात करें तो 2021 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार टीआरएफ यानी राष्ट्रीय टोटल फर्टिलिटी रेट 2 पर पहुंच गया था और यूएनएफपीए की 2025 की रिपोर्ट में यह 1.9 तक गिर गया है. केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में टीआरएफ की यह गिरावट तेज है तो बिहार-यूपी में टीआरएफ अभी ऊंची ही है.

मदरहुड हौस्पिटल्स और नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी के 2025 के सर्वे चौंकाने वाले हैं. 23 से 30 साल की 18 प्रतिशत लड़कियां चाइल्डफ्री जीवन चाहती हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के सर्वे में भारत के 38 प्रतिशत लोगों ने इकोनौमिकल फ्रीडम के बाद ही बच्चा पैदा करने की बात की. 21 प्रतिशत युवाओं ने परिवार बनाने के लिए सुरक्षित नौकरी की जरूरत पर जोर दिया. 22 फीसदी युवाओं को परिवार बनाने से पहले घर बनाना है और 22 फीसदी युवा बच्चों की देखभाल के प्रति श्योर नहीं हैं, इसलिए वे बच्चा नहीं चाहते.

क्या यह महिलाओं की आजादी के लिए जरूरी है

महिलाओं के एम्पावरमैंट का रास्ता शिक्षा से शुरू होता है. आज हर लड़की स्कूल जा रही है. कालेज तक पहुंचने वाली लड़कियों की तादाद भी बढ़ी है. पिछले 10 सालों में वर्कफोर्स में लड़कियों की संख्या दोगुनी हुई है. जौब, कैरियर और फ्यूचर को स्टेबल करने की प्लानिंग आज की औरतों की प्राथमिकताएं बन गई हैं. इसलिए आज की औरतें शादी और बच्चे पैदा करने की सोच से ऊपर उठ रही हैं. यही कारण है कि ज्यादातर सशक्त महिलाएं देरी से शादी कर रही हैं, कम बच्चे चाहती हैं,

2 बच्चों के बीच जन्म अंतराल बढ़ा रही हैं, अनचाहे गर्भ से बच रही हैं. औरतों की यह बदलती सोच पितृसत्ता के खिलाफ एक क्रांति की शुरुआत है.

पैट्रियार्की ने औरतों पर मातृत्व का बोझ डाल कर उसे गुलाम बनाए रखा. अब परिस्थितियां बदल रही हैं. मां बनना अब औरतों के कैरियर और सैल्फ डैवलपमैंट में बाधा बन रहा है. चाइल्डफ्री रहने का चुनाव इस बाधा से मुक्ति देता है. यही कारण है कि औरतें अब पैट्रियार्कल सोच को ठुकरा रही हैं और आजाद जीवन चुन रही हैं. रिपोर्ट्स बताती हैं कि चाइल्डफ्री औरतें ज्यादा खुश रहती हैं क्योंकि उन्हें अनपेड केयर वर्क का बो?ा नहीं उठाना पड़ता.

भारत में मिडिल क्लास की औरतें अब खुद को प्राथमिकता दे रही हैं जिस से उन की प्रोडक्टिविटी बढ़ी है. वैसे तो, हर महिला के फैसले का सम्मान होना चाहिए चाहे वह मां बने या चाइल्डफ्री जीवन जिए. यही असली सशक्तीकरण है.

सैलिब्रिटी जिन्होंने एंटीनाटालिज्म को अपनाया

भारत में एंटीनेटालिस्ट की विचारधारा को फौलो करने वाली कई मशहूर सैलिब्रिटीज हैं. इन में ज्यादातर लोग चाइल्डफ्री बायचौइस हैं, यानी ये वे लोग हैं जिन्होंने जानबू?ा

कर बच्चे पैदा नहीं किए. एंटीनाटालिस्ट फिलौसफी को ओपनली प्रमोट करने वाले बौलीवुड स्टार जौन अब्राहम ने कई बार कहा है कि वे बच्चे नहीं चाहते. जौन अब्राहम और उन की पत्नी प्रिया रुंचल एनवायरनमैंट कौंशियस हैं, इसलिए चाइल्डफ्री जीवन जी रहे हैं.

अभिनेत्री विद्या बालन भी एंटीनाटालिस्ट हैं. वे बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं. मीडिया में प्रैग्नैंसी की अफवाहों पर उन्होंने क्लियर किया कि मदरहुड उन के लिए जरूरी नहीं है. अभय देओल ने हाल ही में एक इंटरव्यू में खुल कर कहा कि वे बच्चे नहीं चाहते. शबाना आजमी और जावेद अख्तर दोनों ने बच्चे पैदा नहीं किए और चाइल्डफ्री जीवन को ओपनली सपोर्ट करते हैं. शबाना कहती हैं कि उन के लिए फ्रैंडशिप और कैरियर ज्यादा महत्त्वपूर्ण थे, इसलिए उन्होंने बच्चे पैदा करना जरूरी नहीं सम?ा.

तब्बू ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि बच्चे पैदा न करना मरजी की बात है. रेखा, दिलीप कुमार, सायरा बानो और अरुणा ईरानी भी जिंदगीभर चाइल्डफ्री रहे. वैसे, बौलीवुड में ज्यादातर लोग जो बच्चा पैदा नहीं करना चाहते वे पर्सनल चौइस की बात करते हैं.

पितृसत्ता के खिलाफ एक क्रांति है एंटी नाटालिज्म

पितृसत्ता असल में धर्म के सहारे थोपी गई ऐसी जंगली व्यवस्था है जो हजारों साल से पुरुषों को औरतों पर हुकूमत करने की छूट देती है. डैमोक्रेसी के बावजूद यह आज भी अपनी पूरी ताकत से कायम है क्योंकि पैट्रियार्की की नींव ही प्रजनन पर टिकी है. लड़के पैदा करो, वंश आगे बढ़ाओ और संपत्ति का हकदार बेटा पैदा करो. पितृसत्ता के ये सारे काम औरतों के गर्भ से तय होते हैं. बदले में औरतों को क्या मिलता है? उन्हें सिर्फ एक भूमिका दी गई है मां बनो, दर्द सहो, बच्चे को जन्म दो और फिर उस बच्चे को भी उसी दर्द की परंपरा में ?ांक दो.

गर्भावस्था, प्रसव का दर्द, स्तनपान, घरेलू गुलामी, कैरियर का बलिदान और मानसिक स्वास्थ्य का बरबाद होना यह सब पैट्रियार्की की डिजाइन है. सब से मजे की बात तो यह है कि औरतों का यह शोषण प्रकृति और मातृत्व की पवित्रता के नाम पर किया जाता है. धर्म ने पिंडदान की व्यवस्था कर के पुत्र पैदा करने की जिम्मेदारी औरतों पर डाल रखी है और आज की पढ़ीलिखी, कामकाजी लड़कियां भी इस से मुक्त नहीं हैं.

पैट्रियार्की के तहत तो औरत की प्रैग्नैंसी से यह दुख दोगुना हो जाता है. लड़कियां पैदा होती हैं तो उन्हें यौनशोषण, प्रजनन और घरेलू गुलामी का बो?ा ढोना पड़ता है. लड़के पैदा होते हैं तो उन पर मर्द बनने का जहर, हिंसा, युद्ध और वर्चस्व का बो?ा लाद दिया जाता है. दोनों ही मामलों में पीड़ा तय है.

आज भी दुनियाभर में औरतें प्रैग्नैंसी को अपना कर्तव्य सम?ा कर खुद को कुर्बान कर रही हैं. पश्चिम के विकसित समाजों में जहां आधी आबादी कैरियर वुमन ही होती है वहां भी औरतें मां बनने के बाद वेतनगैप, प्रमोशनगैप और डिप्रैशन का शिकार होती हैं. पैट्रियार्की में बच्चा पैदा किए बिना औरत अधूरी रहती है. औरत का गर्भ पैट्रियार्की को जिंदा रखने की मशीन होता है. वहीं एंटीनाटालिज्म पैट्रियार्की की इस मशीन को ही बंद कर देता है.

जब लाखोंकरोड़ों मर्द और औरतें प्रजनन से इनकार कर देंगे तो पैट्रियार्की की सब से बड़ी ताकत यानी वंश खत्म हो जाएगा. बिना नए सैनिकों के सेना कैसे चलेगी? बिना नए श्रमिकों के पूंजीवाद कैसे चलेगा? बिना नए बेटों के वंश कैसे चलेगा? तो क्या इस से मानवता खत्म नहीं हो जाएगी?

पितृसत्ता के खिलाफ मीटू, एबौर्शन राइट्स, डोमैस्टिक लेबर स्ट्राइक और मेरा जिस्म मेरी मरजी जैसे आंदोलन अधूरे रह गए क्योंकि ये गर्भ को चुनौती नहीं दे पाए.

अगर मानवता का मतलब सिर्फ पीड़ा और औरतों की गुलामी है तो बेहतर है कि यह चेन रिऐक्शन रुक जाए. सही माने में मानवता की बात तो यह होगी कि किसी को भी उस की मरजी के खिलाफ ऐसे नर्क में न लाया जाए जहां उसे शांति और सम्मान से जीने की गारंटी न हो और हर कदम पर बलात्कार, भ्रष्टाचार, युद्ध, हिंसा, शोषण और अत्याचार का दंश झेलना पड़े.

 

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