बदलते समय के साथ नए जमाने की युवतियां आर्थिक तौर पर मजबूत हो रही हैं. वे बिंदास बाहर भी निकलती हैं और अपने पास बटुए की ताकत भी रख रही हैं. बेटेबेटी की पढ़ाईलिखाई, रहनसहन और शादीब्याह में मांबाप का खर्च लगभग बराबर ही लगता है. ऐसे में घर की आर्थिक जिम्मेदारियां लेने में बेटियां पीछे क्यों रहें? ए क अहम व दिलचस्प फैसले मेंसुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी को गृहिणी को आर्थिक रूप से पारिभाषित करते हुए कहा है कि महिलाओं का घरेलू कार्यों में समर्पित समय और प्रयास पुरुषों की तुलना में ज्यादा होता है. गृहिणी भोजन बनाती है, किराना और जरूरी सामान खरीदती है, ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाएं खेतों में बुआई, कटाई, फसलों की रोपाई और मवेशियों की देखभाल भी करती हैं. उन के काम को कम महत्त्वपूर्ण नहीं आंका जा सकता.

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