भारत अपने 69वें गणतंत्र की सालगिरह का जश्न मना रहा है और 10 आसियान देशों को आमंत्रित कर जंबूद्वीपे भरत खंडे की बात की जा रही है लेकिन वहीं, देश में अलगअलग जातियों की ताकत और अहंकार सिर चढ़ कर बोल रहा है और हर गली में दसियों गुट बनवाए जा रहे हैं. जातीय सेनाएं अपनीअपनी अस्मिता की हुंकार भर रही हैं. सरकारें, राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन भी छोटीबड़ी जातियों के साथ खड़े हैं. जातियां अपनी बात को जातीय अस्मिता से जोड़ने में कामयाब दिखाई दे रही हैं. ताकत के बल पर लोकतंत्र पर धर्मतंत्र हावी हो रहा है.

‘पद्मावत’ फिल्म को ले कर राजपूत समुदाय के विरोध डरावने हालात की ओर इशारा कर रहे हैं. यह झूठे, खोखले जातीय अहंकार के बल पर पुरानी परंपराएं फिर थोपने की कोशिश है. फिल्म को रोकने के लिए जिस तरह से विरोध और उपद्रव प्रायोजित किया गया, उस से देश को जातीय ताकत के पुनर्जन्म का एहसास हुआ है.

राजपूत संगठनों के विरोध के बीच फिल्म ‘पद्मावत’ करीब 7 हजार सिनेमाघरों में रिलीज हुई. पर 8 राज्यों में उग्र प्रदर्शन, तोड़फोड़, आगजनी और चक्काजाम हुए. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, जम्मूकश्मीर, उत्तर प्रदेश में उपद्रव किए गए. हरियाणा के गुरुग्राम में उपद्रवी भीड़ ने तो एक स्कूली बस ही फूंक दी.

फिल्म पर पाबंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के 2 बार आए आदेशों के बावजूद ‘पद्मावत’ राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और गोवा में रिलीज नहीं हुई. सिनेमाघर मालिकों के संगठन मल्टीप्लैक्स एसोसिएशन औफ इंडिया ने तोड़फोड़ के डर से इन राज्यों में फिल्म नहीं दिखाने का ऐलान किया था.

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