लेखन साबित करता है कि गुलामी के दौर यानी अंगरेजों की हुकूमत के समय में भी मीडिया आज से ज्यादा स्वतंत्र था. आज का शासन जालिम है. उस की दोषपूर्ण नीतियों के खिलाफ कोई कुछ बोल या लिख दे, तो उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता है जबकि प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में शासन पद्धति की कड़ी आलोचना करते हुए किसानों के पक्ष में खूब लिखा. एक नजर मुंशी प्रेमचंद की लेखनी पर. किसान अनाज उगाता है. उस अनाज को पूरा देश खाता है. इंडिया कितना भी डिजिटल हो जाए, रोटी डाउनलोड नहीं की जा सकती. अगर देश का किसान किसी मुसीबत में पड़ेगा तो देश के रहने वाले भी मुसीबत में पड़ेंगे.

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