लेखन साबित करता है कि गुलामी के दौर यानी अंगरेजों की हुकूमत के समय में भी मीडिया आज से ज्यादा स्वतंत्र था. आज का शासन जालिम है. उस की दोषपूर्ण नीतियों के खिलाफ कोई कुछ बोल या लिख दे, तो उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता है जबकि प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में शासन पद्धति की कड़ी आलोचना करते हुए किसानों के पक्ष में खूब लिखा. एक नजर मुंशी प्रेमचंद की लेखनी पर. किसान अनाज उगाता है. उस अनाज को पूरा देश खाता है. इंडिया कितना भी डिजिटल हो जाए, रोटी डाउनलोड नहीं की जा सकती. अगर देश का किसान किसी मुसीबत में पड़ेगा तो देश के रहने वाले भी मुसीबत में पड़ेंगे.

अभी भी अनाज किसान के पास सस्ता ही मिलता है. वह व्यापारी के पास जा कर महंगा हो जाता है. 15 रुपए किलो बिकने वाले गेहूं से तैयार आटा जब कंपनी बेचती है तो 40 रुपए किलो कीमत का हो जाता है. कृषि कानूनों की आड़ में खेती का निजीकरण होगा, तो अनाज उगाने से ले कर बेचने तक का काम निजी कंपनियों के हाथों में होगा. और फिर महंगाई पर किसी का नियंत्रण नहीं रह जाएगा. लोग कृषि कानूनों की जिस लड़ाई को किसानों की सम?ा रहे हैं, वह उन की अपनी लड़ाई भी है. आज किसानों के पक्ष में न उपभोक्ता खड़े हैं और न ही मीडिया. आज से 80-90 साल पहले कहानीकार प्रेमचंद ने अपनी हर कहानी व उपन्यास में किसानों के शोषण पर जमींदार व शासन व्यवस्था की चोट का जिक्र किया था.

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