Undertrial Prisoners: यह बात स्पष्ट है कि जेलों में ज्यादातर विचाराधीन कैदी एससी, एसटी और मुसलिम समाज के हैं और आबादी के प्रतिशत से भी ज्यादा हैं. आर्थिक पिछड़ेपन की वजह से ये कैदी अच्छे वकील नहीं रख पाते और सालों जेलों में बिना सजा मिले पड़े रहते हैं. ऐसे कैदियों की सुध हाईकोर्ट कभीकभार लेती रहती है. दिल्ली हाईकोर्ट ने एकतिहाई समय उस सजा की काट चुके जिस के आरोप उन पर लगे हैं उन कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया है.

धोखाधड़ी के एक मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया. कोर्ट में आरोपी ने तर्क दिया कि उस के अपराध में अधिकतम सजा 7 साल है लेकिन वह 7 साल की अधिकतम सजा का एकतिहाई समय जेल में बिता चुका है जबकि कोर्ट में उस के मामले की चार्जशीट फाइल होने के बाद भी सुनवाई शुरू नहीं हुई. यह याचिका दायर करने के लिए इस कैदी को वकील मिल गया वरना तो अधिकांश मामलों में यह भी नहीं मिलता है.

दिल्ली हाईकोर्ट जस्टिस गिरीश कठपालिया ने 13 अप्रैल, 2026 को एक महत्त्वपूर्ण फैसले में दिल्ली के सभी जिला अदालतों और जेल प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन करने का आदेश दिया है. इस आदेश के तहत पहली बार अपराध करने वाले विचाराधीन कैदियों को जमानत पर रिहा करने की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाएगी. ऐसे कैदी जिन का मुकदमा किसी भी कोर्ट में चल रहा है लेकिन अभी उन्हें कोर्ट से सजा नहीं मिली है और उन्होंने अपने जुर्म की अधिकतम सजा का एकतिहाई समय जेल में काट लिया है तो उन्हें जमानत मिलनी चाहिए.

यह फैसला बीएनएसएस यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 479 पर आधारित है जो पुरानी सीआरपीसी की धारा 436 ए से ज्यादा नर्म है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले ही जेल अधीक्षकों को निर्देश दिया था कि वे जेल में अपनी सजा का एकतिहाई समय पूरी करने वाले कैदियों की जमानत याचिकाएं तुरंत अदालत में भेजें.

भारतीय जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या कुल कैदियों का लगभग 78 प्रतिशत है. ये लोग दोषी साबित होने से पहले ही लंबे समय तक जेल में बंद हैं. यह न सिर्फ न्याय व्यवस्था की खामी है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन भी है. Undertrial Prisoners

 

 

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