गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थाएं यानी एनजीओ देश में लाखों की संख्या में मौजूद हैं. आम आदमी की धारणा यह है कि एनजीओ बहुत रुपया कमा रहे हैं. इसी के चलते एनजीओ को बनाने व स्थापित करने के लिए अंधीदौड़ शुरू हो गई है. स्वयंसेवी संस्थाएं बहुत अच्छा काम कर रही हैं, लेकिन इन संस्थाओं को मूर्ख बनाने वाली कई छोटीबड़ी संस्थाएं भी इन दिनों बाजार में उतर चुकी हैं.

एनजीओ को सहयोग देने के नाम से ये अपने कार्यालय राज्य की राजधानी से ले कर राष्ट्र की राजधानी में खोल कर बैठे हैं. इन में सलाह देने का काम किया जाता है जिस की खासी फीस वसूली जाती है. जब सलाह के बाद एनजीओ प्रमुख उन से पट जाते हैं तो इन के कार्यालय संचालक प्रोजैक्ट, कौन्सैप्ट नोट (अवधारणा पत्र) आदि बनाने के नाम से भोलेभाले एनजीओ को लूटते हैं.

ये प्रश्न पूछते हैं कि प्रोजैक्ट कितने का बनाना है? उस पर ये अपना 3 फीसदी चार्ज वसूलते हैं. जाहिर है लालच में एनजीओ संचालक अधिक का प्रोजैक्ट बनवाता है. उस प्रोजैक्ट पर आप को काम मिलेगा या नहीं, इस की कोई गारंटी वे नहीं लेते हैं.

आप के हजारों रुपए 10 से 20 पृष्ठों के कागज पर प्रोजैक्ट बनाने के वसूल किए जाते हैं, जबकि अधिकतर वह चोरी से गूगल से डाउनलोड कर के बना कर रखे होते हैं. आप से आंकड़े पूछ कर भरने का वे काम करते हैं. आंकड़े, कार्य, क्षेत्र जहां कार्य किया जाना है जैसी महत्त्वपूर्ण जानिकारियां वे आप से ही पूछ कर भरते हैं.

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इस के अतिरिक्त कुछ ऐसे कार्यालय भी मिल जाएंगे जो गारंटी के साथ आप को काम देने की बात कहेंगे और सरकारी तंत्र में अपनी घुसपैठ के बड़े रोचक किस्से बताएंगे और अपनी बातों से प्रभावित करेंगे. आप के प्रभावित होने पर वे 5 फीसदी से 10 फीसदी टोकन मनी ले लेंगे और आप से प्रोजैक्ट की मांग करेंगे. ये लाखोंकरोड़ों के प्रोजैक्ट ऐसे दिलवाने का आश्वासन देंगे जैसे नेता वादे करते हैं.

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