ज्ञान का युग कहलाने वाले इस दौर में मध्यवर्ग परिवारों में हर कोई अपने बच्चों को ऊंची शिक्षा दिलाना चाहता है. इस के लिए वह अपने बच्चों को देश के सब से बेहतर शिक्षा संस्थान में ही नहीं, विदेश में भी भेजने की इच्छा रखता है लेकिन उच्च शिक्षा पाना मध्यवर्ग परिवारों के सदस्यों के लिए बड़ा संकट बनता जा रहा है. शिक्षा के बाजार में ऊंची डिगरियां खरीदना इस वर्ग के लिए मुश्किल हो रहा है क्योंकि शिक्षा बहुत ही महंगी हो गई है. शिक्षा पाने के बाद न तो नौकरी की गारंटी है और न ही व्यवसाय की सफलता की, इसलिए यह आर्थिक संकट और भारी पड़ रहा है.

ग्लोबलाइजेशन के मद्देनजर करीब2 दशकों से उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ है. उदारीकरण के दौर में उच्च शिक्षा के प्रति मध्यवर्गीय परिवारों में न केवल उत्सुकता जागी, ये आगे बढे़. आर्थिक तौर पर सामर्थ्य न होते हुए भी उधार पाने में पीछे न रहे. अधिकांश परिवारों में पढ़ाईलिखाई कर्ज पर चल रही है. इस के लिए मांबाप बैंकों से एजुकेशन लोन, व्यक्तिगत लोन ले रहे हैं या अपनी कंपनी अथवा विभाग से कर्ज ले कर लाड़ले या लाड़ली को पढ़ा रहे हैं. कई तो अपनी जमीनजायदाद बेच कर या गिरवी रख कर बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं. 40-50 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक कमाने वाला अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना चाहता है, परिवार में चाहे एक कमाने वाला हो या मियांबीवी दोनों.

इस दौर में उच्च शिक्षा के निजीकरण का ट्रैंड इसलिए विकसित हुआ क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी. विश्व में नौलेज सोसायटी क्रिएट करने की जरूरत महसूस हुई लेकिन इस से दक्ष, शिक्षित वर्कर नहीं, केवल नौलेज वर्कर तैयार हो रहा है.

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