इंजीनियरिंग की जिस डिगरी को हासिल करना कभी नौकरी की गारंटी और पारिवारिक प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी, आज वह डिगरी छात्रों और अभिभावकों के लिए एक ऐसा बोझ बनती जा रही है जिसे न तो केवल घर पर रख सकते हैं और न ही फेंक सकते हैं. ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए इतना ही काफी है कि शिक्षा हमेशा से ही एक व्यवसाय रही है. फर्क इतना भर आया है कि बदलते वक्त के साथसाथ आश्रमों व गुरुकुलों की जगह चमचमाते कालेज और पढ़ाने वाले दाढ़ीधारी गुरुओं के स्थान पर टाईसूट वाले प्रोफैसर दिखने लगे हैं यानी बदलाव शिक्षा प्रणाली के ढांचे में हुआ है, उस का मूलभाव ज्यों का त्यों ही है.

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