EVM Controversy: भारतीय लोकतंत्र अब अपनी जटिलताओं से बाहर निकल रहा है. आने वाले समय में यह इतना सरल हो जाएगा कि देश में सैकड़ों पार्टियों, नेताओं, विचारधाराओं और कार्यकर्ताओं की अब कोई ज़रूरत ही नहीं बचेगी. एक ही पार्टी होगी, वही राष्ट्र होगी, वही सरकार होगी, वही नैतिकता तय करेगी और वही देशभक्ति का सर्टिफिकेट भी बांटेगी. बाकी सब, बस, वोटर रह जाएंगे.
इस नए लोकतंत्र में पार्टी का कैडर भी अलग होगा. ब्लौक लैवल पर गलीगली घूमते, भाषण देते, सड़कों पर उतरे उद्दंड कार्यकर्त्ता वोट की जद्दोजेहद करते नजर नहीं आएंगे. कैडर का यह पुराना तरीका ओल्डफैशन हो जाएगा. नए भारत के नए कैडर का नया नाम होगा ईसी. चुनाव कराने वाली इस संस्था का खर्च जनता के टैक्स से चलेगा लेकिन जनता से उस का रिश्ता खत्म होता जाएगा. चुनाव आयोग पर उन ऊंचे लोगों और ऊंची जातियों के नैटवर्क का कब्जा होगा जो हमेशा से सत्ता के साथ रहे हैं. लोकतंत्र का चौकीदार ही सत्ता का दरबारी बन जाएगा.
फिर चुनाव भी कितने आसान हो जाएंगे. बड़ीबड़ी ईवीएम मशीनों का झंझट खत्म. न दर्जनों पार्टियों के निशान, न बहस, न विचार और न कोई विकल्प. मशीन में बस 2 ही बटन होंगे. पहला बटन सत्ताधारी पार्टी का उम्मीदवार और दूसरा बटन जेल. 2014 से पहले चुनाव आयोग अंपायर था. अब 12वां खिलाड़ी बन कर भाजपा की तरफ से बैटिंग करता है. चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में सीजेआई को हटा कर जो कानून बनाया वह इसी नए भारत के नए कैडर सिस्टम की नींव थी.
धीरेधीरे संसद बहस का मंच नहीं, बल्कि ताली बजाने का स्टूडियो बन जाएगी. न्यूज़ चैनल पत्रकारिता नहीं, सरकारी भजनमंडली बन जाएंगे. एंकर सवाल नहीं पूछेंगे बल्कि हर रात जनता को बताएंगे कि हमारा देश दुनिया में सब से महान है और जो असहमत है वह या तो देशद्रोही है या विदेशी एजेंट. सब से दिलचस्प बात यह होगी कि इस पूरी प्रक्रिया को लोकतंत्र की जीत बताया जाएगा. लोकतंत्र फिर भी जिंदा ही रहेगा. संविधान की तसवीरें लगेंगी, डा. अंबेडकर और महात्मा गांधी के नाम के नारे भी लगेंगे, चुनाव भी होंगे लेकिन चुनाव का अर्थ बदल जाएगा. तब भी एनसीईआरटी की किताबों में पढ़ाया जाएगा कि भारत दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र है.
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