Bulldozer Politics: बुलडोजर अब केवल एक मशीन नहीं, बल्कि शासन की राजनीतिक पहचान बन चुका है. बुलडोजर यानी जो सरकार के खिलाफ विरोध का स्वर उठाए, जो अपने अधिकारों की मांग करे, जो न्याय चाहे, जो शिक्षा व रोजगार पर  सवाल पूछे, उसे कुचल दो. भारतीय जनता पार्टी की बुलडोजरी व्यवस्था ने संविधान के मूल सिद्धांतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े कर दिए ह

84 वर्षीय जेसुइट पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी को 2020 में भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया गया था. पार्किंसन रोग से पीडि़त होने के बावजूद उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा गया. जमानत की उन की याचिकाएं लगातार खारिज होती रहीं. आखिरकार जुलाई 2021 में मुंबई के एक अस्पताल में उपचार के दौरान उन का निधन हो गया. उन के समर्थकों, संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने इसे ‘संस्थागत विफलता’ और पर्याप्त चिकित्सा सुविधा न मिलने का मामला बताया जबकि सरकार और जांच एजेंसियों ने इन आरोपों से साफ इनकार कर दिया. यह आम आदमी के हकों को छीनने का एक उदाहरण मात्र है.

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं से जीवित रहता है जो नागरिकों को न्याय, समानता और संवैधानिक सुरक्षा का भरोसा देती हैं. जब न्यायालयों की जगह प्रशासनिक आदेश लेने लगें, जब आरोप ही सजा में बदल जाएं, जब बुलडोजर अदालतों से पहले फैसला सुनाने लगे और जब महत्त्वपूर्ण सुबूत रहस्यमय परिस्थितियों में नष्ट होने लगें, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश कानून के शासन से चल रहा है या जनता पर सत्ता की मनमरजी हावी है?

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