आम लोगों के लिए एक पुरानी कहावत है कि पुलिस की दोस्ती भली न दुश्मनी. लेकिन इस के उलट पुलिस के लिए भी एक कहावत है कि पुलिस के लिए नेता की दोस्ती भली न दुश्मनी.

फरवरी 2020 में मुंबई पुलिस के आयुक्त बने आईपीएस परमबीर सिंह पर यह कहावत एकदम सटीक बैठती है. क्योंकि जिन नेताओं से दोस्ती कर के उन्होंने बड़ेबड़े कारनामों को अंजाम दे कर सुपरकौप बनने की शोहरत हासिल की थी. यूं कहें तो गलत न होगा कि परमबीर सिंह को महाराष्ट्र पुलिस का नायक कहा जाता था. लेकिन नेताओं की दोस्ती के कारण परमबीर सिंह पुलिस कमिश्नर बनने के कुछ समय बाद ही नायक से अचानक खलनायक बन गए.

परमबीर सिंह को उन के पद से हटा दिया गया और अचानक ऐसा विवाद शुरू हुआ कि मुंबई पुलिस के इस मुखिया को गिरफ्तार करने के लिए देश की सब से बड़ी एजेंसियां छापेमारी करने लगीं. जान बचाने के लिए उन्हें इधरउधर छिपना पड़ा और उन्हें भगोड़ा घोषित करने तक की नौबत आ गई.

वो तो गनीमत है कि देश में अभी लोगों को इंसाफ के लिए अदालतों पर भरोसा है. परमबीर सिंह को भी उसी अदालत की शरण में जाना पड़ा और कई महीनों की लुकाछिपी के बाद उन्हें न सिर्फ गिरफ्तारी से राहत मिल गई बल्कि उन के ऊपर लगा भगोड़े का ठप्पा भी हटा लिया गया.

लेकिन यह समझना काफी दिलचस्प होगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि मराठा प्रदेश की पुलिस का नायक कहा जाने वाला अफसर रातोंरात खलनायक बन गया? दरअसल, इस की कहानी जानने के लिए इस से पहले एक अहम घटनाक्रम की तह में जाना होगा.

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