देश में मौजूदा हालात बताते हैं कि सरकारें जनहितैषी कभी नहीं बन सकतीं. सरकारें गरीबों के बारे में कभी नहीं सोच सकतीं. सरकारें तो बनी ही जनता पर शासन करने को हैं. जनता को सिर्फ वोटबैंक सम झने की जिद इन्हें उस की लाशों से खेलने की इजाजत देती है.

‘‘पिछले साल की कई गलतियों को भुला दिया जाए तो माना जा सकता है कि कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 महामारी एक आपदा थी लेकिन इस बार यह आपदा नहीं, बल्कि सरकारों का एक सिस्टमेटिक फैलिएर है. मेरी मां दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में थी. वह वहां 5 दिनों तक जू झती रही. अस्पताल में किसी ने कोई केयर नहीं की. उस की मौत कल (20 अप्रैल)  रात को 3 बजे हुई. उस से पहले पूरे दिन अस्पताल में मेरी मिसेज 8वीं मंजिल से यहां से वहां भागती रही कि मांजी का बीपी चैक कर लो,

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