Pakistan Human Rights: 29 अक्टूबर 2026 को रावलपिंडी की अडियाला अदालत के जज ताहिर अब्बास सिपरा ने मानवाधिकार वकील ईमान ज़ैनब मज़ारी और उनके पति हादी अली चट्टा को 10-10 साल की सजा सुना दी. हैरानी की बात है कि पाकिस्तान में इंसानियत के लिए काम करने वाले पति पत्नी को दस साल की सजा मिलती है और वहीं जिहाद के नाम पर हजारों निर्दोष लोगों के हत्यारे को इस्लाम का गाजी बताकर शह दी जाती है. क्या यह न्याय के नाम पर इंसानियत का कत्ल नहीं है?

ईमान ज़ैनब मज़ारी और उनके पति हादी अली चट्टा पर आरोप यह था कि 25 अक्टूबर 2024 को इंग्लैंड क्रिकेट टीम के दौरे के दौरान उन्होंने इस्लामाबाद के जीरो पॉइंट पर सुरक्षा के लिए लगे बैरियर हटा दिए थे और पुलिस का काम रोका था. इस जुर्म के लिए आतंकवाद निरोधक अधिनियम के तहत 10 साल, धारा 353 के तहत 2 साल और धारा 186 के तहत 1 साल की सजा सुनाई गई जो एक साथ चलेंगी और दोनों पर 1-1 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया गया.

यह कहानी सिर्फ एक बैरियर तोड़ने की नहीं है. यह कहानी उस दंपति की है जो बलूच, पश्तून, गुमशुदा लोगों के परिवारों, पत्रकारों, ईशनिंदा के आरोप में फंसे लोगों के लिए अदालत में खड़े होते थे और इसी काम की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है. जनवरी 2026 में उन्हें सोशल मीडिया पर सेना की आलोचना और बलूच-पश्तून कार्यकर्ताओं के समर्थन वाले पोस्ट के लिए PECA के तहत 17-17 साल की सजा सुना दी गई थी. 17 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने वो सजा रोकी और दोनों को जमानत दे दी लेकिन जेल से बाहर निकलने से पहले ही उसी दिन उन्हें दूसरे केस में फिर गिरफ्तार कर लिया गया. यानी सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी उस सिस्टम के सामने हार गया जो पहले से तय कर चुका था कि इन दोनों को अंदर ही रखना है.

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
USD99USD49
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
 

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD150USD129
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
  • 24 प्रिंट मैगजीन
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...