Fairshare: आज भी जब प्रॉपर्टी के बंटवारे की बात आती है तो बेटी कहती है "मुझे मेरा हक चाहिए. मैं बराबर की हकदार हूँ." वह बिल्कुल सही कहती है. लेकिन उसी समय जब परिवार पर कोई संकट आता है मसलन पिता बीमार हैं, माँ अकेली है, भाई का बिजनेस डूब रहा है, घर में कर्ज है तो वही बेटी कहती है "मैं तो शादीशुदा हूँ. मेरा अब उस घर से क्या लेना देना?"

यही वो दोहरा मापदंड है जिसने हजारों परिवारों को कोर्ट कचहरी में ला खड़ा किया है.

कानून क्या कहता है

2005 से पहले हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटी को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं था. सिर्फ पिता की खुद की कमाई में मांग सकती थी. फिर 9 सितंबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे बदल दिया और कहा - बेटी भी जन्म से ही को-पार्सनर है यानी बेटे के बराबर हिस्सेदार.

2020 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर साफ किया कि चाहे पिता की मृत्यु 2005 से पहले हुई हो फिर भी बेटी का अधिकार रहेगा.

इसका मतलब है कानून ने आप को बेटा बना दिया. लेकिन क्या आपने खुद को बेटा बनाया?

कानून की किताब में एक लाइन और लिखी है जो कोई नहीं पढ़ता - सेक्शन 6 के अनुसार अगर आप संपत्ति में हिस्सा लेते हैं तो आप संपत्ति से जुड़ी देनदारियों में भी हिस्सेदार हैं. अगर पिताजी ने घर पर 30 लाख का लोन ले रखा है तो आप 15 लाख के हिस्से के साथ 15 लाख के कर्ज की भी हिस्सेदार हैं.

कितनी बेटियां यह बात मानने को तैयार हैं ?
नोएडा की रहने वाली प्रीति के पिता ने 2 करोड़ का घर बनाया. बेटा 15 साल से माता-पिता के साथ रह रहा है. माता पिता की सेवा, बिजली का बिल, माँ का ऑपरेशन सब वही कर रहा है. बेटी की शादी 8 साल पहले हुई. साल में दो बार आती है.

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