RSS and Democracy: सबका साथ सबका विकास, अच्छे दिन आएंगे, 2 करोड़ रोजगार हर साल दिए जायँगे, काला धन वापस आएगा, महंगाई कम होगी और किसान की आय दोगुनी होगी. इस तरह के तमाम वादे किये गये थे जो आज तक पूरे नहीं हुए. काला धन और नकली नोट खत्म करने के नाम पर 2016 में जल्दबाजी में नोट बंदी कर दी गई. देश की जनता को महीनों तक बैकों की लाइनों में खड़ा कर दिया गया. असल में नोटबंदी का फैसला यूपी चुनाव के मद्देनजर लिया गया था.

बाद में आरबीआई डेटा ने बताया की 99.3 फीसदी रुपया वापस आ गया जिससे टेरर फंडिंग, नकली नोट वाली बात झूठी साबित हुई लेकिन तब तक तो बीजेपी का नेरेटिव अपना काम कर चुका था. इससे एमएसएमई और छोटे बिजनेस सेक्टर को सबसे ज्यादा झटका लगा. बेरोजगारी बेतहाशा रुप से बढ़ी. आत्महत्याएं बढ़ी.

एक देश एक टैक्स के नाम पर जीएसटी लागू कर दिया गया. व्यापारियों को फाइलिंग में दिक्कत शुरू हुई, विरोध हुआ लेकिन सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा. नतीजा यह हुआ की शुरुआती 2 साल जीडीपी ग्रोथ सिर्फ धीमी ही नहीं रही बल्कि नीचे गिर गई. NSSO 2017-18 रिपोर्ट लीक हुई जिसमें बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे ज्यादा 6.1 फीसदी के खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी थी. सरकार ने इस पर ध्यान देने की बजाये उस रिपोर्ट को ही खारिज कर दिया.

स्किल इंडिया के नाम पर भी जनता बेवकूफ बनी, ट्रेनिंग हुई लेकिन सर्टिफाइड लोगों को नौकरी ही नहीं मिली. डिग्री वाले ग्रेजुएट नौकरी के लिए भटकते रहे, उन्हें पकौड़ा बेचने की सलाह दी गई. मन की बात, सेल्फी विद बेटी, स्वच्छ भारत, योग दिवस ये सब इवेंटबाजी ही साबित हुईं. 2019 पुलवामा अटैक को राष्ट्रवादी सरकार ने चुनाव से जोड़ा और इसे वोट बटोरने का जरिया बना दिया.

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