Women's Freedom: तकनीक ने औरतों को भी अपनी बात कहने, दुनिया देखने, अपनी पहचान बनाने और आत्मनिर्भर होने के नए रास्ते दिए हैं. लेकिन इसी तकनीक को लेकर धर्म के ठेकेदारों की चिंता भी बढ़ गई है. दिलचस्प बात यह है कि जब औरतों के अपनी पसंद से जिंदगी जीने की बात आती है तो सबसे पहले सवाल औरतों के चरित्र और संस्कारों पर उठने लगते हैं. तकनीक को कटघरे में खड़ा करना आसान है लेकिन क्या समाज कभी उन नियमों पर भी सवाल उठाएगा जिनके तहत औरतों की आजादी को आज तक शक की नजरों से देखा जाता है?

मौलाना कारी इसहाक गोरा को औरतों के मोबाइल फोन पर लगे रहने की चिंता है. उन्होंने कहा कि औरतें मोबाइल फोन पर घंटों लगी रहती हैं. अपनी मां, बहनों और दोस्तों से बातें करती हैं इससे घर का माहौल और रिश्ते खराब होते हैं. प्रेमानंद महाराज ने कहा कि मोबाइल की वजह से युवाओं के रिश्तों और वफादारी पर असर पड़ रहा है. वहीं बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने लड़कियों के सोशल मीडिया पर रील बनाने को लेकर कहा था कि जब तक हमारे देश की बेटियां अपने अस्तित्व को नहीं समझेंगी और रील पर, मोबाइल पर मुजरा बंद नहीं करेंगी तब तक भारतीय संस्कृति का बचना बहुत मुश्किल है.

दरअसल, हमारे समाज में औरतों की आजादी को लेकर एक पुरानी बेचैनी रही है. पहले घर से बाहर निकलने पर सवाल उठते थे, फिर नौकरी करने पर, उसके बाद अपनी पसंद के कपड़े पहनने पर और अब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं. माध्यम बदलते रहे हैं लेकिन सवाल करने का तरीका वही है. औरत अगर घर में रहे तो उसे आदर्श माना जाता है, बाहर निकले तो उसकी सुरक्षा और चरित्र पर चर्चा होने लगती है, अपनी तस्वीर साझा करे तो उसे संस्कृति पर खतरा बताया जाता है और अपनी पसंद से जीवनसाथी चुने तो परिवार की इज्जत का सवाल खड़ा कर दिया जाता है. इस तरह औरतों की हर नई आजादी को किसी न किसी मोरल डिजास्टर से जोड़ देना एक पुरानी सामाजिक आदत है.

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