Dharmendra Pradhan: AISHE यानी ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन के आंकड़े चौँकाने वाले हैं. 2011 से 12 के बीच यूनिवर्सिटीज में कुल एडमिशन 2 करोड़ 97 लाख था. यह हर साल बढ़ता गया और 2021 से 22 के बीच तक यह आंकड़ा 4 करोड़ 33 लाख तक पहुंच गया. यानी 10 साल में 1.36 करोड़ की बढ़ोतरी हुई लेकिन यह ट्रेंड 2023 में जाकर रुक गया. 2022 से 23 के दौरान नामांकन घटकर 4.27 करोड़ रह गया. यानी एक साल में 6 लाख छात्र कम हुए. 2023-24 के शुरुआती डेटा भी यही दिखा रहे हैं की ग्रोथ रुक गई है.
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल 2021 से शुरू हुआ. कॉलेजों तक पहुँचने वाले स्टूडेंट्स की संख्या में गिरावट की बड़ी वजह यही धर्मेंद्र प्रधान ही रहे क्योंकि इन्होंने सरकारी कॉलेजों में फीस 40 प्रतिशत तक बढ़ा दिए. साथ में कोचिंग, हॉस्टल का खर्च भी बढ़ा दिया. इस बढ़ोतरी का खामियाजा सबसे ज्यादा मिडिल क्लास और गरीबों ने भुकता और वे यूनिवर्सिटीज तक नहीं पहुंच पाए.
धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री बनने के बाद पेपर लीक रूटीन बन गया जिससे क्षात्रों का भरोसा टूटा और यूनिवर्सिटीज में एडमिशन का ग्राफ नीचे गिरा. 2024 में 24 लाख नीट छात्र सड़क पर थे लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ. जब सिस्टम पर भरोसा नहीं तो दाखिला क्यों लें? इस उदासीनता की वजह से भी स्टूडेंट्स यूनिवर्सिटीज से दूर हुए. डिग्री के बाद भी नौकरी की कोई गारंटी नहीं. NSSO डेटा कहता है ग्रेजुएट बेरोजगारी 13 फीसदी से ऊपर है. यूनिवर्सिटीज से दूरी का यह भी बड़ा कारण रहा.
आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें
डिजिटल
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
- 24 प्रिंट मैगजीन





