सरिता, बीस साल पहले, जुलाई (प्रथम) 2006
Hindi Stories: शोभा दीदी की चालबाजियों को अच्छी तरह समझती थी मैं. छोटी बहन थी मैं, बचपन से उन की चालाकी, दोगलेपन का शिकार बनती आई थी लेकिन अब उन की बहू चारू को उन के ‘‘कितना दिखावा करती है न वह, एक बात भी मन से नहीं करती. आखिर कोई कितनी बनावट कर सकता है. कोई तो सीमा होनी चाहिए. बिना गहराई के कोई भी भाव प्रभावहीन सा लगता है. पता नहीं, लोग इतना अभिनय कैसे कर लेते हैं.’’
आंखें फाड़फाड़ कर मैं उस का चेहरा देखती रह गई. शोभा के मुंह से ऐसी बातें कितनी विचित्र और बेतुकी सी लग रही हैं, मैं सोचने लगी. जिस औरत ने पूरी उम्र दिखावा किया, अभिनय किया, किसी भी भाव में गहराई नहीं दर्शा पाई, उसी को आज गहराई दरकार क्योंकर हुई? यह वही शोभा है जो बिना स्वार्थ के किसी को नमस्कार तक नहीं करती थी.
‘‘देखो न, अभी उस दिन सोमेश मेरे लिए शौल लाए तो वह इतनी तारीफ करने लगी कि क्या बताऊं. पापा इतनी सुंदर शाल लाए, पापा की पसंद कितनी कमाल की है. पापा यह, पापा वह,’’ शोभा अपनी बहू चारू के बारे में कह रही थी.
सोमेश खुश हुए और कहने लगे कि शोभा, तुम यह शाल चारू को ही दे दो. मैं ने कहा कि इस में देनेलेने वाली क्या बात है. मिलबांट कर पहन लेंगी. लेकिन सोमेश माने ही नहीं, कहने लगे, दे दो.
‘‘मेरा मन देने को नहीं था लेकिन सोमेश के बारबार कहने पर मैं उसे देने गई तो चारू कहने लगी, ‘मम्मी, मु?ो नहीं चाहिए, यह शेड मु?ा पर थोड़े न जंचेगा, आप पर ज्यादा जंचेगा.’
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